65.आयो अलाय, दी चलाय
उधर से आया, इधर दे दिया।
66.आयी बहू आयो काम, गयी बहू गयो काम
बहू आई तो काम भी आया, बहू गई तो काम भी गया।
आदमी के आने–जाने के साथ काम बढ़ता–घटता है।
67.आयी मोज फकीर की दिया ँूपड़ा फँूक
1ध्41ध्2 फकीरों के लिअे, जो सांसारिक वस्तुओं से मोह नहीं रखते।
1ध्41ध्2 मोजी आदमी के लिअे, जो मौज में चाहे–सो कर बैठता है।
68. आयी ही छाछ नै, बण बैठी घर री धणियाणी
आयी थी छाछ को, और बन बैठी घर की मालकिन।
अनधिकार चेष्टा करना।
69.आ अे बाई अबां, आप–आपरै ढबा–
आ अे बाई अबां, अपने अपने ढबवालों को।
अपने अपने ढबवालों को देना; पक्षपात करना।
70.आ अे लूँकी लोबरियो, थारी खीर ठरै है ठोबरियो
71.आक में आंबो नीपज्यो
आक में आम पैदा हुआ।
1ध्41ध्2 नीचकुल में अच्छा पुरुष पैदा हुआ।
1ध्41ध्2 दुष्ट के सज्जन पुत्र जनमा।
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 असंभव बात हुई।
72. आकरे देवने सै–कोई नमै
क्रूर देवता को सब–कोई नमस्कार करते हैं।
बलवान से सभी डरते है।
मि.– 1ध्41ध्2 टेढ़ जानि संका सबकाहू। वक्र चंद्रमहिं ग्रसै न राहू।
1ध्41ध्2 वांका रहज्यो, बालमा, बांकां आदर होय।
बांका वन का लाकड़ा, काट न सक्कै कोय।।
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 बसै बुराई जासु तन, ताही को सनमान।
भलो–भलो कहि छांडि़ये, खोटे ग्रह जपदान।।
73.आकरो कीड़ी आकसूं राजी
आक का कीड़ा आक से राजी रहता है।
प्रत्येक मनुष्य अपनी ही परिस्थिति को पसंद करता है।
74.आखड़ां चेतो हुव़ै
ठोकर खाने पर चेत होता है।
हानि उठाने पर आदमी सावधान होता है।
मि.–ठेकले बुद्धि पाय। 1ध्4बंगला1ध्2
75.आखड़्या जिसा पड़्या कोनी
ठोकर खायी वैसे 1ध्4उतने जोर से1ध्2 गिरे नही ं1ध्4अथरत् वैसी चोट नहीं
आई1ध्2
1ध्41ध्2 जैसी संभावना थी वैसी हानि नहीं हुई।
1ध्41ध्2 जैसी संभावना थी वैसी बात नहीं हुई।
76.आखर जात अहीर
आखिर तो अहीर की जाति है।
1ध्41ध्2 आखिर तो मूर्ख ही रहा।
1ध्41ध्2 आखिर तो नीच ही है।
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 श्रीकृष्ण के लिअे1ध्4जो अहीरों में पले थे1ध्2 भक्तों का
प्रेम–पूर्ण ताना।
यथा–
1ध्4क1ध्2 पहली केस खिंचाविया, पछे वधायो चीर।
आयो लाज गमायकर, आखर जात अहीर।
साख न थंरे, आंख लाज नहिं, नहिं जाणो पर–पीर।
वरज रही, वरज्यो नहिं मानों, आखर जात अहीर।
77.आगलै भौ रा बदला है
पिछले जन्म के बदले 1ध्4बदला लेनेवाले1ध्2 हैं।
1ध्41ध्2 जब कोई सताता है तब कहा जाता है।
1ध्41ध्2 जब संतान होकर, या सुयोग्य होकर माता–पिता के पहले मर जाती
है तब कहा जाता है।
78.आगलै भौरा बदला किसा छूटै है?
पिछले जन्म के बदले कौन से छूटते हैं?
पूर्व–जन्म में दूसरों को दु:ख दिया है तो उसका बदला चुकाना ही
पड़ता है।
1ध्4ऊपरकी कहावत देखो1ध्2
79.आगै–आगै, गोरख जागे
भविष्य की चिन्ता छोड़ वर्तमान की चिन्ता करो, आगे गुरु गोरखनाथजी
समर्थ हैं।
80.आगै अेक घड़ी री ही को दीसै नी
आगे एक घड़ी की भी नहीं दिखायी देती।
भविष्य में, घड़ी भर बाद भी, क्या होगा सो अज्ञात है; भविष्य का
कुछ पता नहीं, घड़ी भर बाद क्या होगा इसका भी पता नहीं।
81.आगै कूवो, लारै खाड
आगे कुंवा, पीछे 1ध्4खंदक1ध्2
दोनों ओर संकट।
82.आगै धंधा, पीछै धंधा,
धंधै पर सिंवरै, ऊ साहब का बंदा।
आगे भी काम, पीछे भी काम, इतना काम होने पर भी जो परमात्मा
को याद करता है वही परमात्मा का सेवक है।
दुनिया में कामकाज तो लगा ही रहता है; कामकाज में फँसे रहने पर
भी जो परमात्मा को नहीं भूलता उसी का जीवन सफल है।
83.आगै सूँ पीछा भला, नाम भला लैटूरा
आगे वाले से पहलेवाला अच्छा, लैटूरा नाम ही अच्छा।
84.आघा दियां पाछा आवै
दूर हटाने पर वापिस लोट आते है 1ध्4धन संपति1ध्2।
अत्यंत संपत्तिशाली के लिअे।
85.आघा पधारो कूंकूंरा पगलिया 1ध्4करो1ध्2
अपने कुंकुम–चर्चित चरणों को दूर हटाओ।
आपका शुभागमन न होना ही अच्छा है 1ध्4व्यंगोक्ति1ध्2
86.आघा रह्याँ सूँ हेत वधै–
दूर रहनेे से प्रेम बढ़ता है।
1ध्41ध्2 विरह में प्रेम बढ़ता है।
मि.– विरह प्रेम–बूंटा रचै दिन–दिन वधै सवाय।
1ध्41ध्2 पास रहने से प्रेम नहीं रहता, अति–परिचयादवज्ञा भवति–इस
कहावतके अनुसार।
87.आघो दियो पाछो पड़ै
आगे बढ़ाया हुआ 1ध्4पैर1ध्2 भी पीछे हटता है।
जो व्यक्ति कायरता के कारण कोई काम करन ेसे हिचकता है उसके
लिअे।
88.आछा फूल महेश चढै
अच्छे फूल महादेवजी पर चढ़ते हैं।
भली वस्तुअें भलों को दी जाती है।
89.आछै जीणां सूँ घोड़ो आछो को गिणीजैनी
अच्छी जीन से घोड़ा अच्छा नहीं गिना जाता।
वाह्य वेश अच्छा होने पर भी निगुणी गुणवान नहीं समा जा सकता।
90.आज मेरी मंगणी, कल मेरा व्यांव़
टूट गयी टंगरी, रह गया व्यांव़
‘आज मेरी मंगनी है, कल मेरा विवाह होगा’ इस प्रकार सोचते–सोचते
टांग टूट गयी और विवाह धरा रह गया।
मनुष्य सोचता है कुछ, होता है कुछ, भविष्यका कुछ पता नहीं।
मि.– डंद च्तवचवेमेए हवक कपेचवेमे
कबीर पगड़ा दूरि है, जिनके बिचि है रात
का जावै, का होइगा ऊगंवते परभात
रात्रिर् गमिष्यति, भविष्यति सुप्रभातंं,
भास्वानुदेष्यति, हसिष्यति पंकजश्री:।
इत्थं विचारयति कोष–गते द्विरेफे,
हा! हंत!! हंत!!! नलिनीं गज उज्जहार!
91.आज हमाँ तो काल तमाँ
आज हमको तो कल तुमको 1ध्4काम पड़ेगा1ध्2।
संसार में अेक–दूसरे से काम पड़ता ही रहता है।
92.आटै की भींत अटारी को मरव़ो1ध्4?1ध्2
आटे की भींत और अटारी का मरना।
आटे की भींत अच्छी नहीं, अटारी से गिर कर मरना अच्छा नहीं।
93.आटै में लूण खटावै जितो कूड़ खटावै
आटे में नमक चलता है उतना झूट।
थोड़ा–सा झूठ चल सकता है पर अधिक नहीं।
94.आठ पूरबिया, नव चूल्हा
आठ पुरबिये ब्राण और नौ चोके।
जब आपस में एक मत न हो।
जब सबका मत अलग–अलग हो।
मि.–नौ कनौजिये तेरह चौके।
95.आडो आवै जको ही सीरी
जो आड़ दे 1ध्4काम पड़ने पर सहायता करे1ध्2 वही साथी, कष्ट पड़ने पर
जो साथ दे वही वास्तव में साथी होता है
96.आणदीरी नाणदीर भाणीबाई नांव
आनंदी की नाणदी 1ध्4नंनद की बेटी1ध्2 और भाणीबाई नाम 1ध्4बेटी या बहन
की लड़की ननिहाल में, भाणी 1ध्43ध्4भानजी1ध्2 कहलाती है। उसकी मामी
उसे भाणी बाई कहती है1ध्2 बहुत दूर की रिश्तेदारी के लिअे।
97.आतमा सो परमात्मा है।
आत्मा परमात्मा है।
प्रत्येक आत्मा में परमात्मा है। प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का अंश है।
जैसा हमें सुख–दुख होता है वैसा ही दूसरों को होता है।
98.आ तो सासू आगली बहू
यह तो सास के आगे वाली 1ध्4जिसकी सास जीवित है1ध्2 बहू है।
1ध्4सास के जीवित रहते घर में बहू को अधिकार नहीं होता1ध्2।
वह व्यक्ति जो दूसरे के अधीन हो अेवं जिसका अधिकार न हो!
99.आदमी जोईजै रूंवाळो, लुगाई जोईजै सूंवाळी
आदमी शरीर में रोमवाला होना चाहिये और ी रोमों से हीन।
100.आदमीरा भाग पत्तै नीचै है
आदमी के भाग पत्ते के नीचे हैं।
जैसे पता हिलता है वैसे ही मनुष्य का भाग्य परिवर्तित होता रहता है।
101.आदमी व़ाड़ में मूतता ही आया है
आदमी बाड़ में मूतते ही आये हैं 1ध्4बाड़3ध्4ड़बेरी आदि के कांटों की
चहारदीवारी1ध्2
1ध्41ध्2 यह काम होता ही आया है, कहां तक रोकेगे?
1ध्41ध्2 पुरुष व्यभिचारी होते ही है।
102.आदरा अधूरा रहै, हर करै सो होय
आदर–पूर्वक हाथ में लिये हुअे काम अधूरे ही रह जाते हैं, भगवान्
करते हैं वहीं होता है।
आदमी जसे करना चाहता है वह नहीं होता, भगवान् करते हैं वही
होता है।
1ध्4देखो ऊपर कहावत नं. 901ध्2
103.आदमी है क घनचक्कर
आदमी है या घनचक्कर।
नटखट या मूर्ख के लिअे।
104.आधी रोटी घर री भली
आधी रोटी घर की अच्छी।
1ध्41ध्2 पराधीन रहकर पेट भरने की अपेक्षा स्वाधीन रहकर किसी तरह
गुजारा करना अच्छा है।
1ध्41ध्2 परदेश में जाने से खूब पेट भरे तो वहां के कष्टों को देखते हुअे
उसकी अपेक्षा अपने देश में रहकर साधारण गुजारा कर लेना अच्छा
है।
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 दूसरे घर पेट भरता हो तो भी घर का आधा भोजन अच्छा
क्योंकि दूसरे के यहां अपमान होगा।
मि.– मिले खुश्क रोटी जो आजाद रहकर,
तो वह खौफ व जिल्लत के हलुवे से बेहतर।
105.आधै माहे कामल बांहे
आधा माघ बीत जाने पर कंबल हाथों पर आ जाती है।
आधे माघ के बीतने पर जाड़ा कम होने लगता है।
106.आधै में लूंकी आधे में पूंछ
आधे में लोमड़ी और आधे में उसकी पूंछ।
107.आधैरा गुळ, आधैरा चोंचला
108.आप–आप की तान में गध्धा भी मस्तान
अपनी तान में गधा भी मस्त रहता है।
अपनी मौज में क्या बड़े और क्या छोटे सभी मस्त रहते है।
109.आप–आप रा सीर–संस्कार है
अपने–अपने पूर्व संस्कार और हिस्सा है।
अपने–अपने भाग्य के अनुसार सुख–दुख मिलते है।
110.आप–आप री करणी रे कांठै
अपनी–अपनी करनी के निकट हैं।
अपने–अपने कमोंर् के अनुसार फल भोगते है।
111.आप–आप री खैंचो’र ओढो
अपनी–अपनी 1ध्4चादर1ध्2 खैंचो और ओढो।
1ध्41ध्2 अपना–अपना फिक्र करो।
1ध्41ध्2 अपना–अपना काम देखो।
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 अपनी–अपनी करनी का फल भोगो।
112.आप–आप री रोटी रै नीचे सै खीरा देव़ै
अपनी–अपनी रोटीके नीचे सभी कोयले 1ध्4जलते अंगारे1ध्2 देते हैं।
सब बपने स्वार्थ का ध्यान रखते हैं।
सब अपनी रोजी बनाये रखने का यत्न करते है।
113.आप–आप रै घरै सै ठाकर
अपने–अपने घर सभी ठाकुर।
अपने घर में प्रत्येक व्यक्ति राजा के समान होता है।
114.आप–आप रै थानै–मुकानै भला
अपने–अपने स्थान और मुकाम में ही भले।
1ध्41ध्2 अपने स्थान पर सभी अच्छे लगते हैं।
1ध्41ध्2 इतने दुष्ट हैं कि इनका अपने ही स्थान में रहना अच्छा 1ध्4बाहर
निकलना अच्छा नहीं1ध्2
115.आप–आप रै भागरो सै खावै
अपने–अपने भाग्य का सब खाते हैं।
1ध्41ध्2 जिसके भाग्य में जितना लिखा है उतना वह भोगता है।
1ध्41ध्2 सब अपने नसीब का खाते हैं, कोई किसी को नहीं खिलाता।
116.आप–आप रो जी सगलांनै प्यारो है
अपना–अपना जीव सबको प्यारा है।
अपनी रक्षा का फिक्र सभी को है।
117.आप कमाया कामड़ा, किणनै दीजै दोष?
अपने कमाये हुअे काम हैं 1ध्4अपने किये कामों का फल है1ध्2, अब
किसको दोष दें?
जब अपने किये कमोंर् का फल भोगना पड़ता है तब कहा जाता है।
118.आपकी सो लापसी, परायी सो कुसकी
अपनी लपसी और पराई कुसकी 1ध्4लपसी उमदा भोजन और कुसकी
निष्ठुर भोजन1ध्2 होती है।
अपनी खराब चीज भी अच्छी लगती है और दूसरे की अच्छी चीज भी
खराब।
119.आप ठग्यां सुख ऊपजै, और ठग्यां दुख होय
स्वयं ठगाये जाने पर सुख होता है और दूसरे को ठगाने से दु:ख होता
है।
दूसरा हमें ठग लेता है तो हमें संतोष होता है कि हमने कोई बुरा
काम नहीं किया इससे आत्मा को शान्ति मिलती है; हम दूसरे को ठग
लेते हैं तो हमारी ही आत्मा हमें धिक्कारती है जिससे हमें दु:ख होता
है।
120.आप डुबंता बामणा ले डूबै जजमान
ब्राण स्वयं तो डूबता ही है साथ ही जजमान को भी ले डूबता है।
1ध्41ध्2 मूर्ख पुरोहित के लिअ े1ध्4पुरोहित सदा ब्राण ही होता है1ध्2।
1ध्41ध्2 आजकल के ब्राणों पर व्यंग!
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 जो व्यक्ति अपने साथ अपने से संबंध रखने वाले दूसरों
की भी हानि कर बैठे उसके लिअे।
121.आप न जाव़ै सास रै ओरा नै सिख देय
स्वयं तो ससुराल जाती नहीं, दूसरों को जाने की शिक्षा देती है।
जो दूसरों को उपदेश दे पर स्वयं व्यवहार न करे।
मि.– पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे 1ध्4तुलसी1ध्2
122.आप भला तो जग भला
1ध्41ध्2 भलेको सब भले दीखते हैं।
1ध्41ध्2 भलेके साथ सब भलाई करते हैं।
मि.–ळववक उपदकए हववक पिदकण्
123.आप मरतां बाप किणनै याद आवै?
आप मर रहें हो तो बाप किसे याद आता हैं?
स्वयं भी विपत्ति में पड़े हों तो दूसरों पर किसी का ध्यान नहीं जाता;
पहले अपने–आपको बचाने की फिक्र होती है।
124.आप मरां जग परलै
आप मरने पर जगत का प्रलय हो जाता है। मनुष्य मर गया तो उसके
लिअे संसार मर गया, बाद में संसार जीवित भी रहे तो उसे क्या
लाभ?
मि.– 1ध्41ध्2 ।चतमे उमपसम कमसनहमण्
1ध्41ध्2 जान है तो जहान है।
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 जी से जहान है।
125.आप मरां बिना सुर्ग कुण जाय?
आप मरे बिना स्वर्ग कौन जावे?
बिना स्वयं काम किये, काम पूरा नहीं होता।
126.आप मियां मंगता, बार खड़ा दरव़ेस
मियां स्वयं मंगते हैं और दरवाजे पर फकीर खड़ा है।
1ध्41ध्2 धन–हीन दानी के लिअे।
1ध्41ध्2 स्वयं धनहीन हों और दूसरा सहायता मांगने आवे तब।
127.आप मिलै सो दूध बराबर, मांग मिलै सो पाणी
जो स्वयं 1ध्4बिना मांगे1ध्2 मिले वह दूध के समान है और जो मांगने से
मिले वह पानी के समान है।
मांगने की निंदा।
128.आपरी खा’र परायी तक्कै, जाय हड़मान बाबैरे’ धक्कै
जो आदमी अपनी रोटी खाकर परायी को भी लेना चाहता है वह
हनुमानजी के धक्के चढ़ता है।
जो अपना हिस्सा पाने के बाद भीर दूसरे की रोटी छीनना चाहता है
उसका नाश होता है।
बाबैरे़– बजरंगबलीरे
129.आप री गरज गधै नेै बाप कुवावै
अपनी गरज गधे को बाप कहलवाती है।
आपकी गरज गधै नै बाप वणावै।
अपनी गरज से गधेको बाप बनाना पड़ता है।
1ध्41ध्2 अपना काम लिकालने के लिअे नीच आदमी की भी खुशामद
करनी पड़ती है।
1ध्41ध्2 स्वार्थसिद्धिके लिअे बुरा काम भी करना पड़ता है।
130.आप री गलीमें कुत्तो ही सेर
अपनी गलीमें कुत्ता भी शेर।
अपने स्थानपर तुच्छ व्यक्ति भी बलवान होता है।
131.आप री जांघ उघाड़ाँ आपनै ही लाज
अपनी जांघ उघाड़ने से अपने आपको ही लाज लगती है।
अपने निकटस्थ संबंधियों की बुराई प्रकट करने से स्वयं ही लज्जित
होना पड़ता है 1ध्4जब पुत्र आदि बुरा काम कर बैठते हैं तब बाप आदि
का कथन1ध्2।
मि.– अपनी टांगें उघाडि़ये, आप ही लाजों मरिये।
132.आप री डांडी रै लसर को पहली दैव़ै–
अपनी डंडी के टका पहले देते हैं, 1ध्4डंडी–तराजू की डंडी1ध्2
अपना मतलब पहले बनाते हैं, अपने मतलब का सबसे अधिक ध्यान
रखते हैं।
133.आपरी नरमाई पैलै नै खाव़ै
अपनी नम्रता सामने वाले को खा जाती है।
नमाई से सामने वाला व्यक्ति भी पिघल जाता है।
नम्रता के व्यवहार की प्रशंसा।
134.आप री नींद सूवै़, आप री नींद जागै
अपनी नींद सोता है अपनी नींद जागता है 1ध्4इच्छानुसार सोता है और
उठता है, किसी की पखलदारी नहीं1ध्2।
स्वाधीन व्यक्ति के लिअे।
135.आपरी मां नै डाकण कुण कैव।?
अपनी मां को डाइन कौन कहे?
अपनी बुराई को कोई प्रकट नहीं करता।
अपने को कोई बुरा नहीं बताता।
136.आप री मारी हलाल
अपनी मारी हुई 1ध्4मुर्गी1ध्2 हलाल।
अपना ही किया काम ठीक समना;
अपना किया काम बुरा हो तो भी ठीक समना।
137.आपरी लाज आप रै हाथ में
अपनी लाज अपने हाथ में।
अपनी लज्जा की रक्षा बनुष्य स्वयं कर सकता है।
138.आपरी साथल उघाड़ाँ आप ही लाज मरै
अपनी जांघ उघाड़ने से आप ही लाज मरता है।
1ध्4देखो ऊपर कहावत न.ं ण्ण्ण्1ध्2
139.आप रै घर में जो हीज धोलो जवांरो नीकळो
अपने घरमें यही सफेद जंवारा निकला।
अपने कुटंुब में यही प्रतापी 1ध्4या भाग्यवाला1ध्2 हुआ।
140.आप रै रूप रो’र परायै धन रो पार नहीं
अपने रूप का और पराये धनका पार नहीं 1ध्4दीख पड़ता1ध्2।
सबको अपना रूप सबसे ज्यादा दीख पड़ता है और इसी प्रकार दूसरे
का धन सबसे ज्यादा दीख पड़ता है।
सभी अपने को सबसे सुन्दर और दूसरों को सबसे धनवान समते हैं।
141.आप रो कायदो आपरै हाथ
अपनी प्रतिष्ठा अपने हाथ।
1ध्41ध्2 अपनी प्रतिष्ठा रक्षा करना मनुष्यके ही हाथ की बात है 1ध्4अच्छे
काम करेगा तो प्रतिष्ठा रहेगी, बुरे काम करेगा तो नष्ट हो जायगी1ध्2।
1ध्41ध्2 नीच आदमी से गड़ा करने वाले के प्रति।
142.आप रो पेट कुत्तो ही भर लेवै
अपना पेट तो कुत्ता भी भर लेता है।
केवल पेट भर लेना कोई बड़ी बात नहीं; मनुष्य जीवन तभी सार्थक है
जब परोपकार किया जाय या कोई महान कार्य किया जाय।
मि.–भर लेते हैं पेट जिन्हे प्रभु दी है काया।
पुरुष सिंह है वही भरे जो पेट पराया।।
143.आपरो माजनो आपरै हाथ
अपनी शोभा या प्रतिष्ठा अपने हाथ।
1ध्4देखो ऊपर कहावत नं. 1ध्2
144.आप व्यासजी वैंगण खावै, औरां नै परमोध बतावै
व्यासजी स्वयं बैंगन खाते हैं पर दूसरों को प्रबोध देते हैं 1ध्4कि नहीं
खाना चाहिये1ध्2
जो दूसरों को उपदेश दे पर स्वयं उस पर न चले उसके लिअे।
मिलाओ– 1ध्41ध्2 खुदरा फजीहत दीगरा नसीहत
1ध्41ध्2 पर उपदेश कुसल बहुतेरे जे आचरहिं ते नर न
घनरेे 1ध्4तुलसी1ध्2
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 परोपदेशे पंडित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम्।
धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचितु महात्मन:।।
145.आप समान बल नहीं, मेघ समान जल नहीं
अपने समान बल नहीं, मेघ के जल के समान जल नहीं।
स्वावलंबन की प्रशंसा; सबसे बड़ा बल वही जो अपने में हो क्योंकि
वख्त पड़ने पर वही काम देता है इसी प्रकार वर्षा का जल सर्वोत्तम
होता है।
146.आपसूं करै जकै रै बाप सूं टळनो नहीं
जो अपने साथ दुष्टता करे उसके बाप के साथ भी 1ध्4दुष्टता करने से1ध्2
नहीं चूकना।
कोई अपनी बुराई करे तो उसका पूरा जबाब देना चाहिये थप्पड़
का बदला जूते से देना चाहिये।
मि.– 1ध्41ध्2 शठे शाठं समाचरेत्
शठं प्रति शठं कुर्यात्
147.आब–आब कर मर गया सिरहाणै रख्या पांणाी
‘आब–आब’ करते हुये मर गये यद्यपि पानी सरहाने के पास ही रखा
था।
कहानी– एक मियांजी काबुल जाकर फारसी सीख आये तो घर में भी
फारसी का व्यवहार करने लगे एकबार वे बीमार पड़े और पानी
पीने की इच्छा हुई, लगे ‘आब–आब’ चिल्लाने परन्तु घरवाले
उनकी बोली नहीं सम सके। प्यास के मारे मियां की
प्राणवायु उड़ गई।
1ध्41ध्2 फारसी बोलने वालों पर व्यंग
1ध्41ध्2 जो घर में भी बाहरी भाषा का प्रयोग करते हैं 1ध्4जैसे आजकल के
शिक्षित1ध्2 उनके लिअे।
148.आभै पटकी’र जमी ाली
आकाश ने गिरायी और जमीन ने झेली।
बहुत ही निर्धन और दुर्दशाग्रस्त व्यक्ति के लिये जिसको कोई नहीं
पूछता।
149.आभै सूं पड़ा’र धरती ाल्या कोनी
आकाश से गिरे और धरती झेली नहीं।
घोर संकट में पड़ना।
अतो भ्रष्टस्ततो भ्रष्ट:
1ध्4देखों ऊपर कहावत नं. 1ध्2
150.आभो इतो–सोक दीसै
आकाश इतना–सा 1ध्4बहुत छोटा1ध्2 दिखाई देता है।
151.आभो टोप–सी–सो निजर आवै
आकाश नरेटी जितना दिखाई पड़ता है।
152.आभो रातो मेह मातो
आकाश लाल हो तो मेह खूब होगा।
153.आम खावण सूं काम कै रूंख गिणन सूं?
आम खाने से काम या पेड़ गिनने से?
154.आम खावणा क रूंख गिणना?
आम खाने या रूंख गिनने?
व्यर्थ की बातों में मगजपच्ची न करके सीधे अपना मतलब पूरा करना,
या जो चीज सामने आवे उससे लाभ उठाना चाहिए।
155.आम फलै नीचो चलै, अेरंड फलै इतराय
आम फलता है तो नीचे की ओर झुकता है, एंरड फलता है तो
इतराता है 1ध्4फैलता है1ध्2
156.आम फलै नीचो तुळै अेरंड अकासां जाय
आम फलता है तो नीचे झुकता है, ऐरंड आकाश की ओर जाता है।
बड़ा आदमी संपत्ति या प्रभुता पाकर नम्र होता है और तुच्छ व्यक्ति
इतराने लगता है।
मि.– 1ध्411ध्2 उदधि रहे मरजाद में बहै उमडि़ नद–नीर।
1ध्421ध्2 ज्ीम ूपेम उंद पद विपिबम पे ीनउइसमए रंबा पद वपिबम पे विमिदेपअमण्
157.आया था हर भजण कूं, ओटण लग्या कपास
भगवान का भजन करने को आये थे पर कपास ओटने लगे।
जो काम करना था उसे छोड़कर दूसरा काम करने लगे।।
158.आयोड़ो मोसर नहीं चूकणो
आया हुआ अवसर नहीं चूकना चाहिये।
मि.– समणहार सूजाण नर औसर चूकै नहीं।
औसररों औसाण रहै घणा दिन, राजिया।।
159.आराम घड़ी रो ही चोखो
आराम घड़ी भरका हो तो भी अच्छा
सुख थोड़ा तो भी अच्छा ही है।
160.आये मनमनाका, थारै खीर ठरी है नाका;
नहिं आऊँ अे रंडी, थारै बेटे बाली गंडी।
अरी बिल्ली, आजा; तेरे लिये खीर खूब ठंडी हो गयी है 1ध्4बिल्ली उत्तर
देती है कि1ध्2 अरी रंडी, मैं नहीं आऊँगी, तेरे बेटेने मेरी गांड जला दी।
इसपर एक कहानी:–
एक आदमी ने विदेश जाते समय अपनी ीसे कहा–‘मेरी अंधी
बूढ़ी माता की खूब टहल–चाकरी करना और कोई कष्ट मत होने देना।
आदेशानुसार रोज बुढि़या के लिये थाली में खीर परोसकर रखी जाती
थी परन्तु बिल्ली उसे चटकर जाया करती थी। कुछ समय के बाद जब
वह आदमी वापिस आया और माता से मिलने गया तो माता ने रोकर
बिल्ली वाली बात कही। सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया और वह जलती
हुई लकड़ी लेकर छिप रहा! ज्योही बिल्ली ने थालीमें मुहँ मारा कि
उसने धीरे से जलती हुई लकड़ी पूंछ के पास लगा दी। दूसरे दिन
बुढि़या ने बिल्ली को प्यार से पुकारा। बिल्ली ने उपरोक्त उत्तर दिया।
161.आ रे म्हारा घररा धणी, जा थोड़ी जूँवां घणी
आ, मेरे घर के मालिक, जिसके जटा 1ध्4बाल1ध्2 तो थोड़ी है पर उसमें
जुअें बहुत हैं 1ध्4किसी ी का पति के प्रति कथत्त1ध्2
मैले–कुचेले रहने वाले फूहड़ पुरुष के लिअे।
162.आरे म्हारा घररा धणी, मारी थोड़ी घींसी घणी
आ, मेरे घर के मालिक, तूने मारा तो थोड़ा पर घींसा बहुत बहुत
1ध्4अधमरा करके फिर घींस–घींसकर मारडाला बहुत कष्ट से प्राण लिअे1ध्2
घृणित काम करने वाले फूहड़ पुरुष के लिये।
163.आ रे म्हारा सप्पनपाट, हूं तनै चाटूं तूं मने चाट
अे मेरे सपनपाट, आ मैं तुझे चाटूं और तू मुझे चाट।
अत्यन्त गरीबी, अत्यन्ताभाव।
164.आरे रांडा, राड़ करां, निकमा बैठा कांई करां?
अरे रांड के बेटे, आ, निकम्में बैठे क्या करें, और कुछ नहीं होता है
तो लड़ाई ही करें।
निकम्मे को कोई काम चाहिअे; और काम नहीं होता है तो लड़ाई
गड़े की ही सूती है।
मि.– म्उचजल उंदेश् उपदक पे कमअपसे ूवतोीवचमण्
165.आला सूका भेळा ही बळै
गीले और सूके 1ध्4काठ1ध्2 साथ ही जलते हैं।
1ध्41ध्2 सबके साथ अेक–सा व्यवहार होता हैं।
1ध्41ध्2 सबको स्थान मिलता है।
166.आलियां दिव़ािळयां मा–बाप
.................................................
.................................................
167.आंवतांरा भाई, जांवतारा जंवाई
आते हुओं के भाई, जाते हुआ के जमाई
जो प्रेम के साथ हमारे यहां आते हैं उनके हम भाई के समान प्रेमी
और सहायक हैं पर जो अभिमान के साथ हमारे यहां से चले जाते है
उनके हम जमाई हैं।
जो प्रेम करें उनके सेवक हैं और जो अभिमान रखें उनको नीचा
दिखानेवाले है।
मि.– 1ध्41ध्2 चाह करैं जिनके चाकर, नहिं जिनके ठाकर सेवक गुणी
जनके चाकर चतुर के कबिन के चित्त हित्त मित्त गुण गानी के।
सीधन से सीधे महा बांके हम बांकन सौं हरिचंद नकद दमाद
अभिमानी के।
1ध्41ध्2 हिलमिल जाने तासों मिलके जनावे हेत,
हितको न जाने ताकी हितु न पहचानिये।
होय मगरूर तापै दूनी मगरूरी कीजै
सीधो हो चले तो सीश आपहु झुकाइये।
168.आव़ बलद, मनै मार
आ, बैल, मुझे मारै
जानबू कर आपत्ति को बुलाना।
169.आव़ै न जाव़ै हूं लाडै री भूव़ा
आता है न जाता है, 1ध्4कहती है कि1ध्2 मैं दूल्हे की फूफी।
जबर्दस्ती पंच बनना।
170.आव़ो तो घर है, जावों मारग है
आते हो तो घर है, जाते हो यह मार्ग रहा।
प्रेम पूर्वक आते हो तो घर तुम्हारा ही है और अभिमान करके जाते हो
खुशी से जाओ 1ध्4हमें कोई परवाह नहीं1ध्2।
प्रेमी का सत्कार करना चाहिअे, अभिमानी की पर्वाह नहीं करनी चाहिअे।
171.आव़ो भाई जीया, अबै घोटा’र पीया
भाई जीया, आओ अब घोटना और पीना।
अब अपना खर्च करो और खाओ–पियो।
कहानी–जिया नामक अेक भंगेड़ी था। वह अपने अेक पड़ोसी को अपने
पास से खर्च करके मांग पिलाने लगा। कुछ दिनों में पड़ोसी को भंग
का व्यसन अच्छी तरह लग गया। उसके बाद अेक दिन सदा की
तरह वह जिये के यहां भांग पीने को पहुंचा और आवाज दी–आवो
भाई जीया। जिये ने दूसरे ही उत्तर दिया– अब स्वयं घोटो और पियो।
172.आव़ो भाई भूरा, लेखा पूरा
हिसाब–किताब साफ है, अब न लेना है न देना।
जब हिसाब–किताब साफ हो जाय तब कहा जाता है।
जब लाभ नुकसान बराबर हो तब कहा जाता है।
173.आवो वरण अठारह
अठारहों वर्णोे के लोग चले आओ
जहां ऊंच नीच सभी घुसे चले जाते हैं, जहां कोई व्यवस्था नहीं होती,
वहां के लिये।
174.आसा अमर है
आशा कभी नहीं मरती; आशा सदा बनी ही रहती है।
175.आसा ही आसा में मिनख जीवै
आशा ही आशा में मनुष्य जीता है
1ध्41ध्2 मनुष्य को आशा सदा ही लगी रहती है।
1ध्41ध्2 मनुष्य का जीवन आशा के ही आधारपर है।
176.आसोजां रा तावड़ा जोगी हूग्या जाट
आसोज की धूप से जाट भी जोगी हो गये 1ध्4जैसे योगी अग्नि तापते हैं
वैसे ही जाट लोग, जो ज्यादातर किसान होते हैं, आसोज की तेज धूप
में खेतों में खड़े रहते हैं1ध्2।
आसोज की धूप बहुत तेज होती है।
177.आसोजां रा तावड़ा जोगी हुयग्या जाट
वामण हुयग्या वाणिया वाण्या हुग्या भाट
आसोज की धूपसे जाट जोगी हो गये, ब्राण बनिये हो गये और बनिये
भाट हो गये।
178.आहार मारै का भार मारै
1ध्4या तो1ध्2 भोजन मारता है या भार मारता है
1ध्41ध्2 भोजन अच्छा न मिलने से या भार उठाने से मनुष्य दुर्बल होता है।
1ध्41ध्2 आहार न मिलने से या भारी चीज के नीचे दबनेसे मौत होती है।
179.अहारे व्योहारे लज्जा न कारे
आहार और व्यवहार में लज्जा नहीं करना चाहिये।
180.आँख–कान में च्यार आँगळरो आंतरौ है
आंख और कान के बीच में चार अंगुल का फर्क है
कान से सुनी बात की अपेक्षा आंख से देखी बात विश्वास के योग्य
होती है।
बिना देखे केवल सुनकर, विश्वास नहीं करना चाहिअे, सुनी और देखी
में बहुत फर्क होता है।
181.आंख फूटी, पीड़ मिटी
1ध्41ध्2 हानि हुई पर कष्ट गया।
1ध्41ध्2 अच्छी वस्तु कष्टदायक हो तो उसका जाना ही अच्छा।
182.आंखमें पड़्यो तुस, ओ ही लाधो मिस
आंख में भुस का टुकड़ा गिरा तो यही बहाना मिल गया।
काम के समय साधारण सा बहाना मिल जाय तो उसी को लेकर
टालमटोल करना।
183.आंखर परमाण तो फूलो पड़ै ही कोनी
आंख के प्रमाण फूला नहीं पड़ता।
बिलकुल मनचाही बात नहीं होती।
184.आंख्यां देखी परसराम कदे न ूठी होय
परसराम कहता है कि आंखों देखी बात कभी झूठ नहीं होतो।
185.आंख्यां देखै न कुत्तो भांके
न आंंखों से देखे न कुत्ता भोंके
186.आंख्या मीच’र इंधारो करै जकैरो कोई कांई करै?
आंखे मूंदकर जो अंधेरा कर लेता है उसका कोई क्या 1ध्4उपाय1ध्2 करे?
जो जानबू कर बात को टाले उसका कोई उपाय नहीं हो सकता।
187.आंख्या मींची’र इंधारो हुयो
आंखे मूंदी और अंधेरा हुआ
1ध्41ध्2 देखरेख हटी कि काम चौपट हुआ
1ध्41ध्2 मरने के बाद कुछ नहीं।
1ध्4ण्ण्ण्1ध्2 मरने के बाद काम बिगड़ गया।
188.आंख्यां को आंधो, नांव़ नैणसुख
आंखों का अन्धा और नाम नयनसुख 1ध्4जिसको आंखाें का सुख हो1ध्2।
जब नाम के अनुसार गुण न हो।
189.आंगळी पकड़तां पूचो पकड़ै
अंगुली पकड़ते पहुंचा पकड़ता है,
थोड़ा–सा सहारा मिलते ही गले पड़ जाता है
थोड़ा–सा सिलसिला जमते ही पूरा काम बना लेता है
190.आंगळी पकड़’र पूंचो पकड़नो
उंगली पकड़कर फिर पहुंचा पकड़ना चाहिअे।
धीरे–धीरे काम का सिलसिला जमाना चाहिअे;
किसी से मतलब निकालना हो तो उसे धीरे–धीरे वश में करना चाहिअे।
191.आंटी–टूंटी गवांरी रोटी
आंटी–टेढ़ी रोटी है पर गेहूं की है
192.आंधोें में काणां राव
अंधों में काना ही राजा
गुणहीन मनुष्यों में थोड़े से गुणवाला ही बड़ा समा जाता है।
193.आंधांरी माख्यां राम ही उडावै
अन्धों की मक्खियां राम ही उड़ाते हैं
नि:सहाय व्यक्ति की सहायता भगवान ही करते हैं।
194.आंधी ना देखै पितरां रा मूंढा
अन्धी पितरों का मुंह नहीं देख पाती।
अैसी जगह ले जाना जहां अपना कोई परिचित न हो।
195.आंधी पछै मेह आवै
आंधी के पीछे वर्षा आती है।
1ध्41ध्2 आंधी के साथ वर्षा आती है।
1ध्41ध्2 कन्या के बाद पुत्र होता है।
196.आंधी रांड मेहां री पाली रैवै
आंधी रांड वर्षा की बरजी रहती है 1ध्4राजस्थान में आंधियां बड़े जोर से
चलती हैं और घंटों चलती रहती है; पीछे मेह प्राय: आता है और मेह
के आने पर ही वे दबती हैं1ध्2
1ध्411ध्2 प्रकृति–निरीक्षण का अनुभव
1ध्421ध्2 दुष्ट व्यक्ति सभी की बात नहीं सुनते, जो उनसे जबर्दस्त होता है
उसी के बरजने पर बुरे काम से विरत होते है।
197.आंधी साथै मेह आया ही करै
आंधी के साथ मेह आया ही करता है
1ध्4ऊपर कहावत नं. 195 देखो1ध्2
198.आंधी पीसै कुत्ता खाय
अन्धी पीसती है और कुत्ते खाते हैं
1ध्411ध्2 जहां अन्धाधुन्धी चलती हो, जहां अन्धेरखाता हो
1ध्421ध्2 जब कोई व्यक्ति अपने लाभ या उपार्जित धन या सम्पत्ति की ठीक
ठीक व्यवस्था न करे और दूसरे लोग उसको उड़ावें।
199.आंधै ने आंधो नहीं कै’णो
अन्धे को अन्धा नहीं कहना 1ध्4सूरदास कहना1ध्2
अन्धा कहनेसे उसे दूना कष्ट होता है।
200.आंधी में मोर चलै ज्यंू कियां चालै है
आंधी में मोर चलता है वैसे कैसे चलता है।
.............
201.आंधै आगे रोवै, नैण गमावै
अन्धे के आगे रोता है वह अपनी ही आंखों की हानि करता है।
1ध्4अन्धा आंसुओं को देख तो सकता नहीं फिर रोने से कैसे पिघलेगा1ध्2।
1ध्411ध्2 जो सुने नहीं उससे आजिजी करना।
1ध्421ध्2 जो समझे नहीं उसको अपना गुण दिखाना।
मि.–1ध्411ध्2 अन्धे के आगे रोवै, अपने दीदे खोवे
1ध्421ध्2 ल्म उंल बतल लवनत मलमे वनज मतम लम उमसज जीम ीमंतज वि ं ूीममज इंततवूण्
202.आंधै आगै रोवो, भलां ही नैण गमावो
अन्धे के आगे रोवो चाहे आंखें गंवावो
1ध्4ऊपरवाली कहावत देखो1ध्2
203.आंधै नै कांई जोईजै? दो आंख्यां
अन्धे को क्या चाहिअे? दो आंखें
परमवांछित वस्तु की प्राप्ति पर।
204.आंधै रो तन्दूरो रामदेवजी बजावै
अन्धे का तंदूरा रामदेवजी बजाते हैं।
निस्सहाय की सहायता भगवान करते हैं।
नोट– रामदेवजी अेक सिद्ध पुरुष हो गये हैं। वे अवतार की भांति पूजे
जाते हैं
205.आंधो जाणै आंधै री बलाय जाणै
अन्धा जाने, अन्धे की बला जाने
..........
206.आंधो नंतै, दोय जिमावै
जो अन्धे को न्यौता देता है उसे दो को भोजन कराना पड़ता है 1ध्4अेक
अन्धे को, दूसरे जो अन्धे को लेकर आता है उसको1ध्2।
व्यर्थ की परेशानी मोल लेने वाले पर।
207.आंधो वांटै सीरणी घर–घर रां नै देय
अन्धा सीरनी1ध्4देवता का प्रसाद1ध्2 बांटता है तो घर के आदमियों को ही
देता है।
स्वार्थी के लिये, जो सब चीजें अपने ही आदमियों को दे।
208.आं’री उडायोड़ी चिड़ां रूंखा पर ही को बैठै नी
इनकी उडायी हुई चिडि़यां पेड़ों पर ही नहीं बैठती, 1ध्4आकाश में ही
उड़ती रहती है, या उनमें पेड़ों पर बैठने की सामथ्र्य नहीं क्योंकि
असली नहीं होती1ध्2इनकी बड़ी बड़ी बातें कभी पूरी नहीं होती, ये कोरी
बड़ी–बड़ी बातें बनाते हैं उन्हें पूरी नहीं करते, अत: इनके कथन का
भरोसा मत करो।