च
819.
चट मेरी मंगणी, पट मेरा व्यांव़
चट मेरी मंगनी और पट मेरा विवाह 1ध्4मंगनी के होते ही विवाह कर
लेना1ध्2 जो काम तुरत–फुरत हो उस पर।
820.
चढणो जितो ही उतरणो
जितना चढ़ना उतना ही उतरना
सुख भोगा उतना दुख भी भोगना पड़ता है
821.
चढसी सो पड़सी
चढेगा सो पड़ेगा
उति के बाद अवनति होती है
822.
चढी पर चढाव, सिर दूख ना पांव
पी हुई पर फिर से पीने से शरीर स्वस्थ रहता है। भंगेडि़यों की
उक्ति।
823.
चढी हांडी नै ठोकर नहीं मारणी
चूल्हे पर चढ़ी हांडी के ठोकर नहीं मारना चाहिए।
चालू धन्धे को व्यर्थ ही नहीं छोड़ देना चाहिए
824.
चढ़ै दरबार, जाय घरबा
जो दरबार अर्थात कचहरी चढ़ता है उसका घर नाश हो जाता है
मुकद्दमें बाजी की निंदा
825.
चतर ने इसारो घणो
चतुर को इशारा काफी है
मि.– भले आदमी को एक बात भले घोडे़ को एक चाबुक
ज्व जीम ूपेमए ं ूवतक उंल ैनिपिबम
826.
चतर री च्यार घड़ी मूरख रो जमारो
चतुर की चार घड़ी मूर्ख का सब जीवन
चतुर थोड़े समय ही में जिस काम को कर सकता है मूरख उसको
उम्र भर नहीं कर सकाता।
827.
चतर रो एक पोर मूरख री सारी रात
चतुर का एक पहर मूर्ख की सारी रात
1ध्4देखो अूपरवाली कहावत1ध्2
828.
चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय
कंजूस के लिए जो शरीर जाने पर भी पैसा नहीं खर्च करता
829.
चमार री जोरू टूटी जूती
चमार की ी होकर टूटी जूती पहने!
साधन सम्प व्यक्ति के त्रुटि पर व्यंग
830.
चरग्या सूर कुटीज्या पाडा
चर गये सुअर पिटे पाड़े
किसी के अपराध का कोअी दंड भोगे।
831.
चरै फिरै जकेरो कांई मरै
जो चरता फिरता है उसका क्या मरै
जो फिरता है और खाता है वह नहीं मरता।
खाने–पीने और घूमने वाले की तन्दुरुस्ती हमेशा ठीक रहती है।
832.
चलती रो नांव गाडी
चलती का नाम गाड़ी है
1ध्411ध्2 दुनिया की उलटी रीत पर क्यों गाडी या गाड़ी का शाब्दिक अर्थ
गाड़ी हुई होता है न कि चलती हुई
1ध्421ध्2 जो काम दे वही वस्तु ठीक हैं। गाड़ी भी यदि पड़ी रहे चलती
न रहे तो काहे की गाड़ी।
833.
चला’र करम में भाठो लेवै
अपने आप माथे पर पत्थर लेता है
स्वयं आफत में पड़ता है।
834.
चाकर ने ठाकर घणा
चाकर को मालिक बहुत
अच्छे नौकर को रखने वाले बहुत
अच्छा काम करने वाले को सब रखने को तय्यार हो जाते है।
835.
चाटूं तो खारो लागै उखणूं तो भारां मरूं
चाटूं तो खारा लगे सिर पर उठाऊं तो बो मरूं
जिससे कुछ भी लालच न हो उसके प्रति।
836.
चाम प्यारो नहीं दाम प्यारो है
शरीर प्यारा नहीं धन प्यारा है
मनुष्य को कोई नहीं पूछते धन को पूछते हैं।
धनकी बड़ाई।
837.
चाम रो कांई प्यारो काम प्यारो है
शरीर का क्या प्यारा, काम प्यारा है
काम नहीं करने वाला आदमी किसी को प्यारा नहीं लगता चाहे वह
कितना ही निकट संबंधी हो
838.
चाय करै जकेरा चाकर नहीं जकेरा ठाकर
जो चाहे उसके चाकर जो नहीं चाहे उसके मालिक
चाह करने वाले के चाकर अर्थात् आज्ञानुवर्ती होकर रहना चाहिए इसके
विपरीत नहीं चाहने वाले प्रति ऐसा व्यवहार रखना चाहिए जैसे मालिक
नौकर के साथ रखता है।
839.
चारू कदे न हारू
चरने वाला कभी नहीं हारेगा।
पेट भर लेने वाला कभी नहीं थकेगा।
840.
चालणो रस्तैसर हुवो भलांईघेर ही 1ध्4पठान्तर–फेर ही1ध्2
चलना रास्ते से ही चाहे दूर ही पड़े
सदा रास्ते पर चलना चाहिए।
मि.– चालणो रस्तैसर हुव़ो भला ही फेर ही।
बैठणो छंया में हुव़ो भलां ही जैर ही।
जीमणो मांरै हाथ रो हुव़ो भलां ही बैर ही।
रैव़णो भायां में हुव़ो भलां ही बैर ही।
धीणो भैंस रो हुवो भलां ही सेर हो।
छंयां मौकै री हुव़ो भलां ही कैर ही।
841.
चालणी सुई ने हंसै
चलनी सुई को हंसती है
जिसमें खुद में अनेक छिद्र हैं वह एक छिद्रवाली को हंसती है। अपने
अनेक दोष होने पर भी जो दूसरे के एकाध दोष की हंसी उड़ाता है
उसके लिए।
842.
चालती रो नांव गाडी
चलती का नाम गाड़ी
काम का चलता रहना ही अच्छा होता है,
843.
चालती सुलखणी डाकती कूवा
पहलां थी एक अबै दो हूवा
जब एक दुष्ट को दूसरा दुष्ट साथी मिल जाता है तब ऐसा कहा
जाता है
844.
चाल म्हारी डामकी डमाक डम
किसी का ींटीया किसका तम
बच्चों को राजी करने की एक कहानी।
845.
च्यार टका म्हारी गांठी हूं हार करूं कन कांठी
मेरी गांठ में चार टके हैं, उनसे मैं हार लूं या कंठी
थोड़ी पूंजी पर अधिक मनसूबे वाले के प्रति
846.
चिड़पिड़े सुव़ाग बिचे रंडापौ चोखो
वर–वधू में परस्पर पटती न हो तो ऐसे सुहाग की अपेक्षा वैधव्य
अच्छा
847.
चिड़यां, मेट लावो
848.
चिडां सूं खेत छाना कोनी
चिडि़यां से खेत छिपे नहीं हैं
849.
चिणा जठे दांत कोनी
जहां खाने को चने हैं वहां दांत नहीं
अनुकूल साधन नहीं मिलने पर
850.
चिणा है जद दांत कोंनी दांत हा जद चिणा कोनी
जब चने हैं तब दांत नहीं जब दांत थे तब चने नहीं थे
1ध्4देखो उपर वाली कहावत का अर्थ1ध्2
851.
चित में न कोई पुट में
न तो चित ही है और पुट ही
852.
चिठी ऊँदरा लेग्या
खत चूहे ले गये
बड़ी उमर वाले दुखी तथा अवांछित व्यक्ति के प्रति
853.
चुगल को चूकैनी और सगळा चूकै है
एक चुगलखोर कभी नहीं चूकता और सब चूक जाते हैं
854.
चूंच दी जको चुगो ही देसी
जिसने चाेंच दी है वह चुग्गा भी देगा
परमात्मा ने बनाया है तो वह पालन भी करेगा
ळवक दमअमत ेमदके उवनजीे इनज ीम ेमदके उमंजण्
855.
चूतियां रा माल मसखरा खाय
चूतियाें के माल मशखरे खाते हैं
बेवकूफ के धन पर मसखरे मौज उड़ाते हैं।
856.
चूल्हेरी लकड़ी चूल्हे में बळै
चूल्हे की लकड़ी चूल्हे में चलती है
857.
चूहे रा जाया बिल ही खोदसी
चूहे का जाया बिल ही खोदेगा
वंश का स्वभाव नहीं जाता
858.
चैत चिड़पिड़ो सावण निरमळो
चैत में यदि वर्षा चिड़ पिड़ लगादे तो श्रावण में आकाश निर्मल रहता
है।
859.
चोटी करै चमचम विद्या आवै घमघम
गुरु के यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों की उक्ति
860.
चोदू री सीरी माताजी ही कोनी
भोंद की 1ध्4निर्बल या डरपोक1ध्2 सहायक माताजी 1ध्4देवी1ध्2 भी नहीं।
डरपोक की कोई कहां तक सहायता करे?
डरपोक की कोई सहायता नहीं करता।
861.
चोधरी बैठो है, तो तूं गुड़ाय दे
कोई मिलने वाला आया और बोला चौधरीजी, बैठे हैं। चौधरीजी उत्तर
देते हैं कि हां बैठा हूं तो, तू आकर गिरा दे।
जो गड़ा मोल लेने को तैयार बैठा हो उसके लिए।
862.
चोपड़ी’र दो दो
चुपड़ी हुई रोटी और फिर दो दो?
इससे बढ़कर क्या चाहिए?
863.
चोपडे घड़े छांट को लागै नी
चुपड़े घड़े पर बूंद नहीं ठहरती
मूर्ख को दिया हुआ उपदेश व्यर्थ जाता है।
864.
चोबेजी गया छब्बेजी हुवण ने दुबे हो’र आया
चौबेजी गये छब्बेजी होने पर दुबे होकर आये
लाभ की आशा से काम किया पर हानि हुई।
865.
चोर कने पंडोखली ही कोनी
चोर के पास पंडोखली अर्थात् गांठ बांधने के लिअे कपड़ा भी नहीं है
साधनहीन के प्रति।
866.
चोर चोर कठेई जावो चांद तो ऊपर–रो ऊपर
चोर चोरी करके कहीं जाय, चांद तो ऊपर–का–ऊपर
867.
चोर चोर मासिया भाई
सब चोर मौसेरे भाई हैं
एक दुष्ट पेश्ेावाले या एक ही दुष्ट स्वभाववाले व्यक्ति परस्पर मिले
रहते हैं।
868.
चोर चोरी करै घर आ’र तो साच बोलै
चोर चोरी करता है पर घर आकर तो सच बोलता है।
घर वालों से बुरी अथवा हानिप्रद बात छिपानेपर
869.
चोर चोरी सूं गयो तो कांई हेराफेरी सूं ही गयो
चोर चोरी करने से गया तो क्या हेराफेरी करने से गया।
जब कोई व्यक्ति सत्संगति आदि किसी कारण से अपने दुव्र्यसन को
छोड़ दे पर स्वभाववश कुछ–न–कुछ चेष्टा करके उसके अनुकूल किया
करे तब कही जाती है।
870.
चोर ने कह–चोरी कर, कुत्ते ने कह–भुस, साह ने कह–जाग।
चोर को कहता है चोरी कर, कुत्ते को कहता है भोंक, और मालिक
को कहता है कि जाग।
सबसे मिला रहना और आपस में भड़काना।
871.
चोर ने चोर पकड़ै
चोर को चोर ही पकड़ता है
ैमज ं जीपमि जव बंजबी ं जीपमणि्
872.
चोर बादसाही माल खावै
चोर बादशाह के माल खाते हैं
बादशाह को भी नहीं छोड़ते दूसरों को क्या छोड़ें।
873.
चोर रा पग काचा
चोर के पैर कच्चे
चोर डरपोक होता है वह ठहरता नहीं
अपराधी सदा डरता है।
874.
चोर रा पग चोर ओलखै
चोर के पैर चोर ही पहचानता है
875.
चोर री गत चोर जाणै
चोर की गति को चोर ही जानता है
876.
चोर री दाड़ी में तिणखलो
चोर की दाढ़ीमें तिनका
जब किसी मनुष्य में कोई अवगुण हो और कोई अपरिचित मनुष्य भी
उस अवगुण की समालोचना उसके सामने करे तो वह उसे अपने ही
ऊपर समकर बिगड़ता है। ऐसे अवसर पर यह कहावत कही जाती
है।
877.
चोर री मां घड़े में मूंढो घाल’र रोवै
चोर की मां घड़े में मुंह डालकर रोती है
1ध्4छिपकर रोती है नहीं तो प्रकट होने का डर रहता है1ध्2
878.
चोर री माने हीज मारणी जोईजै
चोर की मां को मारना चाहिए 1ध्4जिससे चोर का जन्म ही न हो1ध्2
बुराई के मूल कारण को ही नष्ट करना चाहिए।
879.
चोर रे मन में चानणो बसै
चोर के मन में उजाला रहता है।
चोर के मन में हमेशा यह खटका बना रहता है कि रोशनी होने पर
कोई मुझे पकड़ न लेवे। सशंकित चित वाले के प्रति।
880.
चोर रो पकड़ै जार रो पकड़ै ूठे आदमी रो कांई पकड़ै
चोर की चोरी जार की जारी पकड़ी जा सकती है परन्तु झूठे मनुष्य
के झूठ का पता लगाना बड़ा कठिन होता है।
881.
चोर रो भाई घंटी चोर
दुर्गणी का साथी भी दुगुर्णी ही होता है।
882.
चोरी जारी रो मैणो है मजूरी रो मैणो कोनी
चोरी जारी के लिए ताना दिया जा सकता है मजदूरी के लिए नहीं।
मजदूरी करना बुरा नहीं है।
883.
चोरी में मोरी हुगी
चोरी में मोरी हो गई
जब छिपाकर रखी हुई वस्तु को दूसरा उड़ा ले जावे।
884.
च्यार चोर चोरासी बाण्या कांई करै बापड़ा एकला वाण्या
चार चोर थे और चौरासी बनिये थे फिर भी चोर बनिये को लूट ले
गये।
बेचारे अकेले बनिये क्या करें।
बनियों की जातिगत भीरुता पर व्यंग।
885.
च्यार जणंा री बग्घी ऊपर जासी
मरने पर चार मनुष्यों के कंधे पर सीढ़ी में बंधकर ही जाना पड़ता है
886.
च्यार दिनां री चानणी फेर अंधारी
चार दिनों की चांदनी फिर अन्धेरी रात
वैभव या सुख थोड़े दिनों का होता है फिर विपत्ति आती है।