1135.
दमड़ां रो लोभी वातां सूं को रीैनी
धन का लोभी कोरी बातों से नहीं रीता वह तो धन मिलने से ही
रीता है।
1136.
दमड़ी री हांड़ी ही वजार लेव़णी
दमड़ी की हांडी भी बजाकर लेनी चाहिये
साधारण–से साधारण वस्तु भी खूब परीक्षा के बाद लेनी चाहिये
1137.
दसरी लकड़ी अेकरो भारो
दस आदमियों के अेक–अेक लकड़ी से अेक आदमी का पूरा बो
तय्यार हो जाता है।
दस आदमी थोड़ा–थोड़ा सहायता देेवें, एक आदमी का काम बन जाता
है।
1138.
दस्त लाग अर सराय में डेरा
दस्त लगते हैं और सराय में डेरे।
1139.
दाई रांड टको लेगी, कूंडो फोड़गी
1140.
दाई सुं पेट थोड़ो ही छानों रेवै
दाई से पेट थोड़े ही छिपता है।
जानकार से भेद नहीं छिप सकता।
1141.
दाख पकै जद काग के, होत कंठ में रोग
जब दाख पकती है तो कौवे के कंठ में रोग उत्प हो जाता है
1ध्4जिससे वह दाख खाने का आनन्द नहीं उठा सकता1ध्2
अनुकूल अवसर पर लाभ न उठाया जा सके तब
भाग्यहीन के लिअे।
पूरा दोहा यों है:–
भागहीण कूं ना मिलै, भली व़सत को जोग।
दाख पकै तब होत है, कंठ काग के रोग।।
1142.
दाड़–रस काड़–रस छूटै कोनी
कामुकता और स्वादिष्ट भोजन की चाट छूटती नहीं।
1143.
दाणे–पाणी रो सीर है
दाने–पानी का सीर 1ध्4हिस्सा1ध्2 है
घरेतु संबंध है, खाने–पीने का संबंध है।
1144.
दाता दे भंडारी रो पेट दूखै
दाता देता है पर भंडारी का पेट दुखता है।
जब मालिक देने की आज्ञा दे दे पर देने वाले कर्मचारी को दुख हो।
1145.
दाता सूं सूम भलो टके ऊतर देय
दाता से कंजूस अच्छा जो जल्दी उत्तर तो दे देता है।
हां–दूंगा, हां–दूंगा–इस प्रकार आशा में रखने वाले दाता से कंजूस अच्छा
जो तुरंत ‘ना’ कर देता है कि क्योंकि अैसा दाता के पास बारबार जाने
का कष्ट उठाना पड़ता है और कंजूस अेक बार में ही मामला तै कर
देता है।
आशा में रखकर कष्ट देने वाले व्यक्ति से इनकार कर देने वाला
अच्छा।
1146.
दाळ–भात भेळा, कोकला किनारे
दाल भात मिले हुअे और कोकले अलग
घर के लोग परस्पर लड़ते हैं तो भी आखिर मिल जाते हैं पर कोई
बाहरी व्यक्ति लड़ाई के समय उनमें से किसी का पक्ष लेकर लड़ता है
तो बाकी लोगों के साथ उसका बैर हमेशा के लिअे बंध जाता है।
मि.–थे बिहुं साजन रळ मिलो हूं विच दुक्ख सहेस
1147.
दाळ–भात रोटी और व़ात खोटी
दाल भात और रोटी इतनी ही बातें सत्य हैं बाकी सब खोटी
जीवन–निर्वाह के साधनोंकी बात ही सबसे बढ़कर है।
1148.
दाळ भात लंबा जीकारा अै बाई परताप तुम्हारा
दाल–भात खाने को मिलता है और सब लोग जी–जी करके पुकारते हैं
यह सब, हे बाई, तुम्हारा ही प्रताप है।
बेटी के संबंध से लाभ पहुंचने पर व्यंग।
1149.
दांत–काटी रोटी है
दांतों से कटी हुई रोटी 1ध्4का संबंध1ध्2 है 1ध्4अेक–दूसरे को दांत कटी रोटी
खाते हैं1ध्2
गहरी घनिष्टता है।
1150.
दांतण व़ेच्यां दळदर को जावैनी
दांतुन बेचने से दरिद्र नहीं जाता।
तुच्छ कार्य करने से काम पार नहीं पड़ता।
1151.
दांत हा जद चिणा कोनी चिणा है जद दाेंत कोनी
दांत थे तब 1ध्4खाने को1ध्2 चने नहीं थे और अब चने हैं तो 1ध्4खाने को1ध्2
दांत नहीं
अभाग्य पर
कोई–न–कोई कमी रह जाय तब
1152.
दांत है जठे चिणा कोनी, चिणा है जठे दांत कोनी
दांत है वहां चने नहीं, चने हैं वहां दांत नहीं।
कोई–न–कोई कमी रहे तब
धन है वहां भोगने वाला नहीं, भोगने वाला है वहां धन नहीं।
1153.
दांतां री बांधी हाथां सूं को खुलैनी
दांतों की बांधी हुई हांथों से नहीं खुलती।
किसी सयाने चतुर व्यक्ति की प्रशंसा में ऐसा कहा जाता है कि वह
किसी वस्तु को दांतों से बांध दे तो दूसरे उसको हाथों से भी नहीं
खोल सकते हैं।
1154.
दांतां रो पीस्योड़ो नहीं खावणो, घटी रो पीस्योड़ो खावणों
दांतों का पीसा हुआ नहीं खाना चाहिअे, ची का पीसा हुआ खाना
चाहिअे।
लोक या समाज जिसके विरुद्ध हो अैसा कार्य नहीं करना चाहिअे।
1155.
दिन जातां किती व़ार लागै
दिन बीतते कितनी देर लगती है।
दिन बीतते देर नहीं लगती।
मि.– सुबह होती है शाम होती है।
याें ही उम्र तमाम होती है।
1156.
दिन दूणो रात चोगणो
दिन दूना, रात चौगुना
खूब बढ़ना।
1157.
दिन फिरै जद चतराई चूल्हे में जाय परी
जब दिन फिरते हैं 1ध्4अर्थात् बुरे दिन आते हैं1ध्2 तब चतुराई चूल्हे में चली
जाती है।
बुरे दिन आने पर मनुष्य चतुराई भूल जाता है।
मि.–अंसभवं हेममृगस्य जन्म तथापि रामो लुलुभे मृगाय।
प्राय: समापविपतित्तकाले धियोपि पुंसां मलिनीभवन्ति।।
1158.
दिन–भर रांड–निपूती करे
दिन–भर रांड़ और निपूती करती है 1ध्4किसी को रांड़ और किसी को
निपूती कहकर गालियां देती है1ध्2
दिन–भर गालियां देती है। दिन–भर हाय–हाय करती है।
दिन–भर पराई निंदा या चर्चा करते रहने पर।
1159.
दिनंूगे रो गम्योड़ो सिंा पाछो आ ज्याय तो गम्योड़ो को व़ाजैनी
सुबह का भूला शामको लौट आवे तो भूला नहीं कहलाता।
जब कोई व्यक्ति गलती करके जल्दी ही उसे सुधार लेता है तो वह बुरा
नहीं कहलाता।
1160.
दियां–लियां डूम राजी हुवै
देने–लेने से तो डूम 1ध्4अेक याचक जाति1ध्2 राजी होते हैं।
1ध्4सज्जन तो केवल सम्मान चाहते है1ध्2
1161.
दियाळी रा छाज कूटण ने आडा आव़ै
दिवाली के छाज कूटने के काम आते हैं
जब किसी से अनुचित या व्यर्थ में काम करवाया जाय तब।
1162.
दियाळी रा दीया दीठा, काचर बोर मतीरा मीठा
दिवाली के दिये दिखाई दिये और काचर, बेर और मतीरे मीठे हुअे
दिवाली बीतने पर काचर बेर और मतीरे मीठे हो जाते है।
1163.
दियाड़ी अकल किता दिन काम आवै
दी हुई अक्ल कितने दिन काम आ सकती है।
बुद्धि अपनी हो तभी काम चल सकता है।
मि.–अकल शरीरां ऊपजे, दिया आवे डांभ
1164.
दियो–लियो आडो आवै
दिया–दिया काम आता है।
दान ही मनुष्य का सहायक होता है।
1165.
दिल साफ कसूर माफ
दिल साफ हो तो सब कुसूर माफ है।
चित्त शुद्धि ही सबसे महत्त्वपूर्ण है।
1166.
दिल्ली फकीरां जुगती 1ध्4जोगी1ध्2 रहगी
दिल्ली फकीरां जुगती 1ध्4योग्य1ध्2 रहेगी।
जब किसी वैभवशाली का महान वैभव नष्ट हो जाय तब।
1167.
दिल्ली फकीरां जोगी हमें हुई है
दिल्ली फकीरां के योग्य अब हुई है।
अमुक व्यक्ति का वैभव अब नष्ट हुआ है।
1168.
दिल्ली रह’र भाड़ ही भूंजी
दिल्ली में रहकर भाड़ ही ोंकी।
अच्छे स्थान में या अच्छे व्यक्ति के पास रहकर भी कोई लाभ न
उठाना।
1169.
दोड़ मिी कुत्तो आयो
बिल्ली, दौड़, कुत्ता आया
बच्चों का अेक खेल
1170.
दियेरे हेठे इंधारो हुया करै
दिये के तले अंधेरा हुआ करता है।
मि.–दीया तले अंधेरा
1171.
दीयो दाट व़हू खाट
दिया जला कि बहू पलंग पर
1ध्411ध्2 सन्ध्या समय जो जाने वाले के लिअे
1ध्421ध्2 आलसी या दरिद्र के लिअे जो सन्ध्या को ही सो जाय।
1172.
दीसती तो गिलारी कर ज्याय वि़च्छू रो गटको
देखने में तो छिपकली पर खा जाय बिच्छू को
देखने में सीधा किन्तु वास्तव में दुष्ट।
1173.
दुनिया में डोढ अकल हुवै, आखी में आप आधी में दूजा
दुनिया में डेढ़ अक्ल होती है जिसमें अेक अपने में और आधी बाकी
सब में मनुष्य अपने आप को दूसरे सब लोागों से अधिक बुद्धिशाली
समता है।
1174.
दुपटी देखअर पग पसारो
दुपी देख कर पांव फैलाओ
अपनी हैसियत या साामथ्र्य के अनुसार काम करो।
मि.–तेते पांव पसारिये जेती लांबी सौर
1175.
दुव़धा में दोनूं गया माया मिली न राम
दुविधा में दोनाें गये माया मिली न राम
जो आदमी यह सोचता है कि यह काम करूं या वह। वह दोनों ही
नहीं कर पाता। इसलिअे अनितिता को छोेड़कर दृढ़ निय करके
तदनुसार तुरंत कार्य आरम्भकर देना चाहिअे।
मि.– संशयात्मा विनश्यती
1176.
दूखै जके रे पीड़ हुवै
जिसके दुखता है उसीके पीड़ा होती है।
किसी की पीड़ा का अनुभव दूसरा नहीं कर सकता।
मि.–बां क्या जानै प्रसूत की पीड़
बां जिणनरी पीड़ सार कांई जाणै
घायल री गत घायल जाणै जे कोई घायल होय
जाके पांव न फटी बिवाई सो काम जानै पीर पराई
बिन आपुन पाय बिवाय गये कोउ पीर पराइ न जानत है
पर, वी, मिले विछुरेकी विथा मिलिकै बिछरै सोई जानतु है
1177.
दूखै पेट कूटै माथो
दुखता है पेट, कूटता है माथे को
असंगत काम करना।
1178.
दूती गायरी लात सैवणी पड़ै
दुधार गाय की लात सहनी पड़ती है।
जिससे कुछ स्वार्थ सिद्ध होता है उसके बुरे वत्र्ताव को भी सहना पड़ता
है।
मि.–लात खाय पुचकारिये, होइ दुधारु धेनु
1179.
दूध तो मायका ओर दूध कायका
दूध तो वास्तव में माता का है दूसरा दूध किस कामका?
माता के दूध के बराबर कोई दूध नहीं।
1180.
दूध व़ेचो भावैं पूत व़ेचाो
दूध बेचो चाहे पूत बेचो
दूध का बेचना पुत्र के बेचने के बराबर है 1ध्4भारतवर्ष में पहले दूध के
बदले दाम लेना बड़ा अनुचित कर्म समा जाता था1ध्2।
विशेष –यह कहावत विशेषतया जाटों के लिअे प्रसिद्ध है।
1181.
दूध–रो–दूध, पाणी रो पाणी
दूध का दूध, पानी का पानी
बिलकुल ठीक न्याय।
1182.
दूधरो बल्योड़ो छाछ ने फूंक दे–दे’र पीवै
दूध का जला छाछ को फंूक–फंूक कर पीता है।
अेक बार धोखा खाने पर मनुष्य छोटी–सी बात पर भी सतर्क रहता है।
–वह सहसा विश्वास नहीं करता।
मि.–पिसुन छल्यो नर सुजनसों, करत विसास न चूक।
जैसे दाध्यो दूधको, पीवत छाछहि फूंक।।
1183.
दूधां न्हावो, पूतां फलो
दूधों नहावों, पूतों फलो
सौभाग्यशाली और सन्तानशाली होवो। आशीर्वाद।
1184.
दूबळां ने दोखा घणा, का चींचड़ का पांव
दुबलों के अनेक आफतें लगी रहती हैं या तो चींचड़ तंग करते हैं या
खुजली की बीमारी हो जाती है।
दुबलों को रोग आदि कोई–न–कोई आफत सदा घेरे रहती है।
1185.
दूबळो देख अड़नो नहीं, मातो देख डरणो नहीं
कृश शरीर वाले से अड़ना नहीं और मोटे ताजे से डरना नहीं चाहिए।
आगे कहावत नं. 402 भाग 2 में देखिये.
1186.
दूबळो जेठ देवरां बरोबर
दुबला जेठ देवरों के बराबर
1187.
दूररा ढोल सुवावणा लागै
दूरके ढोल सुहावने लगते हैं
दूरकी बातें अच्छी लगती है पास जाने पर उनकी असलियत खुल जाती
है।
1188.
दूसरे री तिस पीवै जको गधो हुवै
जो दूसरे की प्यास पीता है वह गधा होता है
कोई आदमी प्यास लगने पर पानी मंगवावे और उसे दूसरा पीले तो यह
कार्य अनुचित और अशिष्टतापूर्ण है।
1189.
देखणो जिसो व़रतणो
जेसा देखो वैसा वत्र्ताव करो
देशकालानुसार काम करना चाहिअे।
1190.
देखणो सो भूलणो नहीं
जो देखो उसे मत भूलो
संसार के दृश्यों को देखना चाहिअे और देखकर याद रखना चाहिअे।
1191.
देखती आंख्या माखी को गिटीजै नी
आंखों देखते मक्खी नहीं निगली जाती
जान बूकर बुरा काम नहीं किया जा सकता।
सामने बुरा कार्य करने नहीं दिया जा सकता।
1192.
देखा–देखी चाल चलै ज्यूं भेडां का टोळा
दूसरों की देखादेखी चाल चलता है जैसे भेड़ों का टोला हो
जो बिना सोचे विचारे दूसरों की देखादेखी कार्य करे उसके लिअे।
1193.
देखा–देखी सामयो जोग, छीजी काया व़ाध्यो रोग
देखादेखी साधा जोग, छीजी काया बाढो रोग
1ध्411ध्2 जो दूसरों को देखकर बिना सोचे विचारे काम करता है उसे हानि
उठानी पड़ती है
1ध्421ध्2 योगसाधना करनी हो तो गुरु से योग–साधन सीखना चाहिअे। बिना
गुरु से सीखे केवल दूसरे की देखादेखी योग–साधना आरंभ नहीं कर देना
चाहिअे।
1194.
देखी थारी काळपी बावनपुरा उजाड़
देख ली तेरी कालपी जिसमें बावनों मुहल्ले उजाड़ पड़े हैं
कोरा नाम पर तत्व कुछ नहीं।
1195.
देख्यो देस बंगाला दांत लाल मूं काळा
देख लिया बंगाल का देश जहां सबके दांत तो लाल और मुंह काले हैं
बंगालियों के लिअे, जो पान बहुत खाते हैं और काले रंग के होते है।
1196.
देरे पांडा, आसीस । हूं कांई देऊँ म्हारी आंतरां देवै है।
अरे पांडे, आशीष दे
मैं क्या दूं, मेरी अंतडि़यां देती है।
1197.
देणा न लेणा मगन रहणा
देना न लेना, मग्न रहना
जिसको न तो किसी को देना हो न किसी से लेना हो वह सदा सुखी
रहता है।
1198.
देणो लेेणो गांडू रो काम, पा–मारू गावो
देना लेना गांडूं का काम, तुम तो पा–मारू 1ध्4अेक गीत1ध्2 गाओ।
जब कोई आशा लगाये हुअे को कुछ दे नहीं, केवल यह कहे कि
मौज करो तब।
1199.
देणो भलो न बाप रो, बेटी भली न अेक
पैंडो भलो न कोस रो साहब राखे टेक
ऋण बाप का भी अच्छा नहीं और बेटी अेक भी हो तो भी अच्छी
नहीं। पैदल मुसाफिर कोस की भी अच्छी नहीं, ईश्वर लज्जा रखे।
1200.
दे रांड बळीतो, घर जाय रीतो
अरी रांड़, तू ोंकती जा ओर घर खाली होता जाय
जो घर की स्थिति का विचार किये बिना अंधाधुंध खर्च करे।
1201.
देव जिसा पुजारी
जैसे देवता वैसे पुजारी
जैसे को तैसा मिल जाय तब
अेक जैसे व्यक्तियों का सम्मेलन
1202.
देवणो मरणे बराबर है
देना मरने के बराबर है
देना बड़ा कठिन है।
1203.
देवता जिसी पूजा
जैसे देवता वैसी पूजा
उचित व्यवहार करना।
1204.
देवता व़ासना रा भूखा है
देवता वासना और भावना के भूखे हैं
देवता हृदय की अच्छी वासना से तृप्त होते हैं, बाहरी चीजों से नहीं।
1205.
देवे जद बेटा देवै नहीं तो बेटां ही खोस लेवै
देते हैं तब तो बेटे दे देते हैं नहीं तो बेटियों को भी छीन लेते हैं
1ध्411ध्2 देवताओं के लिअे
1ध्421ध्2 अव्यवस्थित–चित्त वालों के लिअे जो राजी होते हैं तब तो खूब
देते हैं और नाराज होते हैं तो साधारण सुविधाओं को भी छीन लेते है।
मि.– क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा रुष्टा तुष्टा क्षणे क्षणे
अव्यवस्थित चित्तानाम् प्रसादोपि भयंकर।
1206.
देस चाकरी परदेस भीख
देश में नौकरी, परदेश में भीख
परदेश में कोई जान–पहचान का नहीं होता अत: भीख मांगने में भी
लोक लज्जा नहीं होती।
1207.
देस चोरी, परदेस भी
जब निर्वाह का कोई साधन न रहे तो देश में चोरी करे और परदेस में
भीख मांगे–देश में लोक–लज्जा के कारण भीख नहीं मांगी जा सकती।
1208.
देस जिसो भेस
जैसा देश वैसा भेष
जिस देश में रहें वहां के नियमों के मुताबिक चलना चाहिअे।
1209.
देसी गधी पूरबी, चाल
देश में विदेश की चालढाल को अपनाने वाले के लिअे
जो दूसरे देश की चालढाल को अपनावे उसके लिअे।
1210.
देसी गधी विलायती बोली
1ध्4ऊपरवाली कहावत देखिये1ध्2
1211.
देह में न लता लूटैला कळकत्ता
देहपर लता 1ध्4कपड़ा1ध्2 नहीं और कलकत्ते को लूटेंगे
1ध्411ध्2 बिना सामथ्र्य के काम करना
1ध्421ध्2 बिना पूंजी के व्यापार करना
1ध्431ध्2 मारवाड़ी व्यापारियों के लिअे जो फटी हालत में कलकत्ता आदि में
आते हैं और लखपती बन जाते है।
1212.
दो आंगळ रो लिलाड़ जके में फेर दो सळ
केवल दो अंगुल का 1ध्4यानी बहुत छोटा1ध्2 ललाट और उसमें भी दो सल
साधारण वस्तु और उसमें भी बहुत–से दोष।
1213.
दो घर डूबता अेक ही डूब्यो
1ध्4नीचे कहावत नं. 1214 देखिये1ध्2
1214.
दो घरां रो पावणो भूखो फिरै
दो घरों का पाहुणा भूखा फिरता है
साझे का काम बुरा होता है।
मि.– सात मामां रो भाणजो भूखो सुवै
1215.
दो डूबता अेक ही डूब्यो
दो डूबते अेक ही डूबा
जब अयोग्य पति को अयोग्य पत्नी मिल जाय।
1216.
दो दिन पावणो तीजे दिन अणखावणो
दो दिन पाहुना, तीसरे दिन अनखामना
पाहुना दो दिन तक तो अच्छा लगता है और उसका अच्छा सत्कार होता
है पर अधिक रहे तो बुरा लगने लगता है।
किसी के भी यहां ज्यादा दिन महमान बनकर नहीं रहना चाहिअे।
1217.
दोनां कानी मोत है
दोनों ओर मौत है
काम करते हैं तो हानि है न करें तो लाचारी है।
मि.–ईने कूवो उने खाड
1218.
दोनां हाथां में लाडू है
दोनों हाथें में लू है
1ध्411ध्2 दोनेां प्रकार से लाभ है
1ध्421ध्2 खूब लाभ है।
1219.
दोनां हाथां सूं ताळी व़ाजै
दोनों हाथों से ताली बजती है
दोनों के मिलकर करने से काम बनता है
दोनों पक्ष मिलते हैं तभी काम होता है।
1220.
दोनूं गमाई रे जोगिया मुदरा औ आदेश
हे योगी, दोनों खो दिये–मुद्रा भी और आदेश भी धर्म भी खोया, लाभ
भी नहीं हुआ।
1221.
दोनूं ढूंगा अेके ढाळ, जै–गोपाळ जी जै–गोपाळ
दोनों नितंब अेक ही ढाल के, जय–गोपाल जय–गोपाल दोनों बिलकुल
अेक–से हैं।
मि.– जैसे मनुवां आप हैं वैसे उनके मीत।
1222.
दोनूं मिल भेला हुआ आसो ने रिड़मल्ल
आसो रिड़मल्ल दोनों लिकर इके हो गये।
1223.
दोनू हाथ रळायां धुपै
दोनों हाथ मिलाने पर धुलते हैं।
दोनों मिलकर काम करें तभी काम बन सकता है।
अेकता से कार्य सिद्धि होती है।
1224.
दो दो ओर चोपड़ी
दो दो 1ध्4रोटी1ध्2 और वे भी चुपड़ी हुई 1ध्4फिर क्या चाहिअे1ध्2।
लाभ में लाभ
1225.
दो माटी रा ही भूंडा
दो मी के भी बुरे।
अेक से दो हमेशा अच्छे।
1226.
दो मामां रो भाणजो भूखो रैवै
दो मामों का भानजा भूखा रहता है।
1ध्4देखा अूपरवाली कहावत नं. 12131ध्2
1227.
दोयां औख्यां सूं देखणों जोईजै
दोनों आंखों से देखना चाहिअे।
पक्षपात छोड़कर न्याय करना चाहिए।
दोनों को समान समकर न्याय करना चाहिए।
1228.
दो व़वांरो व़र चूलो फूंकै
दो यिों का पति चूल्हा फूंकता है।
दो विवाह करने की निन्दा।
1229.
दो लड़ै जठे अेक पड़ै
जहां दो लड़ते हैं वहां अेक पड़ता ही है।
दो की लड़ाई में अेक की हार होती ही है।
1230.
दो लड़ै जद तीजो ले पड़ै
दो लड़ते हैं तब तीसरा ले पड़ता है।
दो की लड़ाई में तीसरे को लाभ होता है।
विशेष–इस पर दो बिल्लियों और बन्दर की कहानी प्रसिद्ध है।
1231.
दगा न किसका सगा
दगा किसी का आत्मीय नहीं।
दगेबाज किसी के साथ दगा करने से नहीं चूकता।
दगा करने का नतीजा हमेशा बुरा ही होता है।
1232.
दड़ूको क्यों हो? सूरज रा सांड हां।
पोटा क्यों करो हो? गऊरा जाया हां।
दहाडते क्यों हो?
सूरज के सांड़ हैं इसलिअे
तो गोबर क्यों करते हो?
गाय के जाये हैं इसलिअे।
जो अपने मतलब के अनुसार कभी दिलेर और कभी गरीब बन जाय।
1233.
दबसी सो हारसी, यही मियां की फ़ारसी
दबेगा तो हारेगा, यही मियां की फारसी 1ध्4विद्या1ध्2 है
कभी दबना नहीं चाहिअे।
मि.– पढो बेटा फारसी तले पड़े सो हारसी।