1063.
ढकणी में पाणी ले’र डूबज्या
ढकनी में पानी लेकर डूब जा।
किसी कुकृत्यों पर शर्म दिलाने के लिये ऐसा कहा जाता है।
मि.–चुल्लू भर पानी में डूब जा
1064.
ढबां खेती ढबां न्याव
ढबां हुवै बूढे रो व्यांव
ढब से खेती होती है ढब से न्याय होता है और ढब ही से बूढ़े का
भी विवाह हो जाता है।
सब काम ढंग से करने से होते हैं।
सब काम मेल जोल के जरिये होते हैं।
1065.
ढबां खेती पखां न्याव
ढब से खेती और पक्ष से न्याय मिलता है।
ढंग के साथ करने से खेती में सफलता मिलती है। हाकिम पक्ष का
हो या सिफारिस हो तब न्याय मिलता है।
1066.
ढबां री खेती है
ढब की खेती है।
ढंग के साथ करने से ही खेती होती है नहीं तो मेहनत व्यर्थ जाती है।
1067.
ढेढणी कांई बोलै जमी मांयलो चरू बोलै है
ढेढनी बिचारी क्या बोलती है नीचे जमीन में 1ध्4धनसे भरा1ध्2 जो वत्र्तन
गड़ा है वह बोलता है।
धन होने पर छोटा भी बोलने लगता है। इसपर एक कहानी है–
एक ढेढनी किसी प्रतिष्ठित धनिक के घरके दरवाज ेके पास खड़ी
होकर कहा करती थी ‘माई–बाप, आपकी बेटी का विवाह मेरे बेटे के
साथ कर दीजिये’। उस धनिक ने देखा इसकी ऐसी बेजा बात करने की
हिम्मत कैसे हुई! क्या इसके पास मेरे से अधिक धन है? सो तो
दिखता नहीं। फिर? यह अवश्य धनकी गर्मी ही है जो इससे ऐसा
कहलवाती है। यह सोचकर एक दिन उसने ढेढनी के पैरों तले की भूमि
को खुदवाना शुरू किया तो उसे अपार गड़ा हुआ धन मिला। धनिक ने
कहा मेरा सोचना सही था, बिना धन की गर्मी के ऐसे वचन वह बोल
नहीं सकती थी।
1068.
ढेढने सुर्ग में बिसांई कोनी
ढेढ़ को स्वर्गमें भी विश्राम नहीं 1ध्4उसे वहां भी बेगार करनी पड़ती है1ध्2
जब किसी को–विशेषत: निर्बल को लोग बराबर सताया करते हैं तब
कही जाती है।
1069.
ढेढणी ने सुरग में ही बेगार त्यार
ढेढ़नी को स्वर्ग में भी बेगार तय्यार।
ढेढ जाति से बेगार बहुत ली जाती है।
ज्व ूींज चसंबम बंद जीम वग हवए ूीमतम ीम उनेज दवज चसवनहीण्
1070.
ढेढ रे पलो लगावो भावैं बाथे पड़ो
ढेढ़ के पल्ला छुवाओ चाहे गले लगो
दोनों बराबर हैं क्योंकि दोनों से छूत लगती है। पल्ला छुआना गले
लगने के बराबर है।
बुरे काम को थोड़ा करो चाहे अधिक करो बराबर है।
1071.
ढेढ रे साथे धाप’र जीमो भावै आंगली भरभर चाखो
ढेढ़ के साथ पेट भर खाओ चाहे अंगल भर–भर चक्खो
1072.
ढेढां री दुरासीस सूं गायां थोड़ी ही मरै
ढेढ़ों की दुराशीष से गायें कहां मरती है?
गायें मरने से ढेढ़ों को चमड़ा मिलता है जिससे वे अपना निर्वाह करते
हैं।
इसलिए वे गायों का मरना चाह सकते है।
1073.
ढैया–ढैया घर बतावै
ढ़हे 1ध्4गिरे1ध्2 मकान बतलाना।
निराशाजनक बातें करना।
1074.
ढोल में पोल
ढोल में पोल रहती है
बड़े आदमियों की बातें पी–ठोस नहीं हुआ करती।