297.
अेक आंख में किसी खोलै किसी मींच
अेक आंख होने पर कौन–सी खोले और कौन–सी बंद रखे।
अेक ही संतान हो तो किससे प्रेम और किससे द्वेष रखे?
298.
अेक आंख को कांई मीचणो कांई उघड़नो?
अेक आंख का क्या मींचना क्या खोलना?
1ध्4ऊपरवाली कहावत देखो1ध्2
299.
अेक काचर रो बीज सौ मण दूध बिगाडै़
अेक काचर का बीज सौ मन दूध बिगाड़ देता है।
1ध्411ध्2 अेक ही नीच बहुत बिगाड़ देता है।
1ध्421ध्2 छोटी–सी चीजसे बहुत हानि हो सकती है।
व्दम पसस ूममक उंते ं ूीवसम चवज वि चवजजंहमण्
300.
अेक घड़ी री नकटाई, दिन भर री बादशाही
अेक घड़ी की नकटाई, दिन भर की बादशाही।
थोड़ी–सी निर्लज्जता से बहुत समय के लिअे आराम हो जाता है।
301.
अेक घर तो डाकण ही टालै
अेक घर तो डाकिनी भी टालती है।
1ध्411ध्2 नीच–से–नीच व्यक्तिके भी कोई अपना होता है जिसको वह हानि
नहीं पहुंचाता।
1ध्421ध्2 नीच–से–नीच भी सबका नाश नहीं करता।
302.
अेक चंदरमा नव लख तारा, अेक सती नै नग्गर सारा
1ध्411ध्2 अेक चंद्रमा अेक ओर हैं और नौ लाख तारे अेक ओर है।
इसी प्रकार अेक सती अेक ओर है और सारा नगर अेक ओर है।
1ध्4अर्थात् दोनों बराबर है1ध्2
चंद्रमा और सती की महिमा।
1ध्421ध्2 नौ लाख तारों में अेक ही चंद्रमा होता है और सारे नगर में अेक
ही सती मिलती है।
अनेेकों में कोई अेक ही महात्मा या प्रतापी होता है।
303.
अेक तवैरी रोटी, कांई छोटी कांई मोटी
अेक ही तवे की रोटियों में क्या तो छोटी और क्या मोटी 1ध्4सब
एक–सी होती है।1ध्2
1ध्411ध्2 अेक ही पदार्थ के भि–भि भाग सब अेक जैसे होते हैं।
1ध्421ध्2 अेक ही कुल या समूह के लोग बराबर होते है।
1ध्431ध्2 अेक मां की संतान अेक–से स्वभाव वाली होती है।
1ध्441ध्2 समान घरों के सब लोग मेरे लिअे बराबर हैं।
1ध्451ध्2 जब कोई अेक ही कुल के विभि लोगों या अेक ही पदार्थ के
विभि भागों में अेक की निंदा और दूसरे को प्रशंसा करे तब कही
जाती है।
304.
अेक दिन पढ’र किसो पंडित हु ज्यासी
अेक दिन पढ़कर कौन–सा पंडित हो जायगा।
1ध्411ध्2 केवल अंक दिन पढ़कर ही पंडित नहीं बना जाता उसके लिए
लम्बे समय तक अभ्यास की आवश्यकता होती है।
1ध्421ध्2 अेक दिन नहीं भी पढ़ोगे तो कोई हानि नहीं होगी; अेक दिन यह
काम नहीं भी करोगे तो कुछ बिगड़ेगा नहीं।
305.
अेक दिन पावणो, दूजै दिन आणखावणो
अेक दिन पाहुना, दूसरे दिन अनखावना 1ध्4लगता है1ध्2 पाहुना अेकाध दिन
ही अच्छा लगता है, अधिक समय तक रहे तो बुरा मालूम होने लगता
है। किसी का अतिथि अधिक दिन नहीं रहना चाहिअे।
मि. । ब्वदेजंदज हनमेज पे दमअमत ूमसबवउमण्
306.
अेक दिन पियो र अेक दिन तिसो,
अेक दिन पानी पिलाता हूं, अेक दिन प्यासा रहता है फिर बताओ
विवाह का दिन कौनसा नियम करूं 1ध्4किस दिन विवाह करूं1ध्2
1ध्411ध्2 जिसको काम से अवकाश नहीं मिलता उसका कथन।
1ध्421ध्2 जो अवकाश न मिलने का बहाना करता है उसके लिये।
307.
अेक नकारो सौ दुख हरै
अेक इनकार जो दु:ख दूर करता है।
अेक बार इनकार कर देने से सब ंट मिट जाते हैं, फिर लोग तंग
नहीं करते। जो संकोचवश निति उत्तर नहीं देता उसे लोग बारबार
सताते हैं।
308.
अेक नन्नो सौ दुख हरै
ऊपरवाली कहावत देखो.
309.
अेक नारी ब्रचारी
अेक पत्नीव्रत ब्रचर्य–पालन के समान ही है।
310.
अेक पंथ दो काज
1ध्411ध्2 अेक काम को करते समय दूसरा काम भी साथ ही बन जाना।
1ध्421ध्2 अेक उपाय से दो काम बनना।
मि.–1ध्411ध्2 ज्व ापसस जूव इपतके ूपजी वदम ेजवदमण्
1ध्421ध्2 ज्व बंजबी जूव चपहमवदे ूपजी वदम इमंदण्
इसका निकास इस दोहे से है:–
चलो सखी वहां जाइये, जहां वसे ब्रजराज।
गोरस बेचत हर मिले, एक पंथ दो काज।।
311.
अेक बंदरिया रूस ज्याय तो किसो बंदरावल खाली हो जाय
अेक बंदरिया रूठ जाय तो कौनसा वृंदावन खाली हो जाता है।
अेक व्यक्ति साथ न दे तो कौनसा काम नहीं बनता?
312.
अेक बार कथा सुणी ग्यान आयो सरड़, बारबार कथा सुणै, कान है क
दरड़?
अेक बार कथा सुनने से ही ज्ञान टपट आ जाता है।
बारबार कथा सुने और भी ज्ञान न आवे तो सुनने वाले के कान कान
है या खंदक?
ज्ञान आता है तो अेक बार सुनने से ही आ जाता है।
कोई शिक्षा हृदय में बैठती है तो अेक बार सुनकर ही बैठ जाती है
बारबार कहने–सुनने से क्या लाभ?
313.
अेक मण अकल, सौ मन इलम
अेक मन बुद्धि सौ मन विद्या 1ध्4के बराबर है1ध्2।
विद्या की अपेक्षा बुद्धि बड़ी है।
314.
अेक मसखरी सौ गाल
1ध्411ध्2 अेक मसखरी सौ गालियों के बराबर है।
1ध्421ध्2 अेक मसखरी करने वाले को सौ गालियां खानी पड़ती है।
315.
अेक माछली सारो तलाव गिंदो करै
अेक गंदी मछली सारा तालाब गंदा करती है।
1ध्411ध्2 अेक नीच सबका बिगाड़ करता है।
1ध्421ध्2 अेक नीच की संगति सबको बिगाड़ देती है।
1ध्431ध्2 घर का या साथ का अेक भी आदमी बदनाम हो तो सबको
बदनामी होती है।
316.
अेक म्याण में दो तरवार को खटावैनी
अेक म्यान में दो तलवारे नहीं रह सकती।
अेक ही जगह दोका अधिकार नहीं रह सकता।
317.
अेक रती बिन पाव रती
अेक तरीके बिना मनुष्य पाव रती का 1ध्4कौड़ी का1ध्2 है।
1ध्411ध्2 अेक प्रतिष्ठा बिना मनुष्य किसी काम का नहीं
1ध्421ध्2 अेक प्रतापी अथवा वांछित व्यक्ति के अभाव में सब घर
शोभा–हीन लगता है।
318.
अेकरी दवा दो
1ध्4देखो नीचे कहावत नं. 3221ध्2
319.
अेक रै पाप सूं नाव डूबै
अेक के पाप से नाव डूबती है।
अेक दुष्ट सब किया–कराया नाश कर देता है।
320.
अेकरो इलाज दो
321.
अेकरो दारू दो
अेक की दवा दो।
1ध्4देखो नीचे कहावत न.ं 3221ध्2
322.
अेक रो इलाज दो, दो रो इलाज च्यार
अेक का इलाज दो, दो का इलाज चार।
कोई व्यक्ति कितना ही मजबूत क्यों न हो अकेला दो की बराबरी नहीं
कर सकता और इस प्रकार दो व्यक्ति चार की बराबरी नहीं कर सकते।
323.
अेक वार जोगी, दो वार भोगी, तीन वार रोगी।
शौच को जाता है।
324.
अेक बिरती महावैर
अेक पेशे वालों में परस्पर बड़ा विरोध होता है।
मि.– बामण कुत्ता वाणिया जात देख गुर्राय।
325.
अेक सूंठ रै गांठिया सूं पंसारी को हुईजै नी
अेक सूंठ के टुकड़े से पंसारी नहीं बना जा सकता।
थोड़े से गुण से बड़ा नहीं हुआ जा सकता।
326.
अेक सूं दो भला
अेक से दो अच्छे
1ध्411ध्2 अेक आदमी की अपेक्षा दो आदमी काम को अच्छी तरह कर
सकते है।
1ध्421ध्2 यात्रा में साथ होना अच्छा है।
327.
अेक सूं नहीं दोनूं आंख्या सूं देखणो
अेक से नहीं दोनो आंखों से देखना चाहिअे।
समान वत्र्ताव रखना चाहिअे।
328.
अेक हाथ सूं ताली को बाजै नी
अेक हाथ से ताली नहीं बजती।
1ध्411ध्2 कोई काम अकेले नहीं होता।
1ध्421ध्2 लड़ाई–गड़ा अेक ओर से नहीं होता।
1ध्431ध्2 अेक ओर से अच्छा व्यवहार किये जाने पर ही दूसरी ओर से
अच्छा व्यवहार किया जा सकता है।
अेक तरफा कोई बात नहीं बनती।
329.
अेकै घर में दो मता, कुशल कांय कूं होय?
330.
अेकै घर में सात मता, कुशल कांय सूं होय?
अेक घर में अनेक मत तो कुशल कैसे हो?
घर के सब लोग अेक मत से न चलें तो घर नहीं चल सकता।
331.
अेथ बैठा ओथ मारै
यहां बैठे वहां मारते हैं।
1ध्411ध्2 अत्यन्त धूत्र्त के लिअे।
1ध्421ध्2 अत्यन्त भोले के लिअे 1ध्4परिहास में1ध्2।
कहानी– अेक राजा बड़े भोले थे, किसी शत्रु से वैर लेना था, मुसाहबों
ने कहा आप सामने जाकर युद्ध करेंगे तो मारे जायेगें, तब
फरमाया अेक अैसा भाला बनवाओ जिससे यहां बैठे ही वहां
मारे।
332.
अे माँ! माँ! माखी; कै बेटा उड़ाय दे; माँ! माँ! दोय है–
बेटा मां से कहता है कि अरी मां–मां मक्खी आ बैठी। मां कहती है
कि मक्खी आ बैठी तो उड़ा दे। बेटा फिर कहता है– मां–मां, ये तो
दो हैं– में कैसे उड़ाऊँ?
आलसी के लिअे।