620 गअु–संतन के कारणे हर व़रसावै मेह
गायों और सन्तों के लिअे भगवान मेह बरसाते हैं
गायों और सत्पुरुषों के भाग्य में वर्षा होती हैं।

621 गढ–किला तो वांका ही भला
गढ़ और किले तो बांके ही भले

622 गढां रे गढ पावणा
गढाें के गढ़ ही पाहुने होते हैं
बड़ों के पाहुने बड़े ही होते हैं
बड़ों का संबंध बड़ों से ही होता है।

623 गढां रे गढ ही पावण हुवै
अूपरवाली कहावत देखिये

624 गधां रे किसा सींग हुवै?
गधों के कोअी सींग थोड़े ही होते हैं
मूर्खों की कोअी खास पहचान नहीं होती

625 गधे ने मारां सूं घोड़ो को हुवैनी
गधे को मारने से वह घोड़ा नहीं हो सकता
मूर्ख मारने से नहीं सुधर सकता।

626 गधे ने लाख साबण सूं धोवो घोड़ो को हुवैनी
गधे को चाहे लाख बार साबुन से धोओ वह घोड़ा नहीं बन सकता।
मूर्ख सुधारने से सुधर नहीं सकता–बुद्धिमान नहीं बन सकता
प्रकृति का सुधार कितना ही प्रयत्न क्यों न करो नहीं हो सकता

627 गधेरी लात सूं गधो को मरैनी
गधे की लात से गधा नहीं मर सकता।
समान शक्तिवाले से हानि नहीं पहंुच सकती।

628 गधो अूकरड़ी में लुटै
गधा कूड़े के ढेर पर लोटता है
नीचेवाली कहावत देखिये

629 गधो अूकरड़ी पर लुटण सूं राजी
गधा घूरे पर लेटने से राजी होता है
मलीन व्यक्ति मलीन वस्तु पाने से प्रस होता है

630 गधो गधे री लात सूं को मरैनी
अूपर 627 न.ं कहावत देखिये

631 गधो जाणै सावण सदा ही सुरंगो रहसी
गधा समता है कि सावन सदा ही हराभरा रहेगा
मूर्ख समता है कि अच्छी अवस्था सदैव बनी रहेगी।

632 गधो धोयांसूं घोड़ोको हुवैनी
गधा धोने से घोड़ा नहीं बन सकता
अूपर नं. 626 की कहावत देखिये

633 गधो मिसरी सार कांअी जाणै
गधा मिश्री क्या होती है यह क्या जाने?
मूर्ख या अज्ञानी अच्छी वस्तु की कदर नहीं कर सकता।

634 गम्योड़ी खेती कमायोड़ी चाकरी बराबर
बिगड़ी हुयी खेती और सुधरी हुई नौकरी दोनों बराबर हैं
नौकरी कितनी ही अच्छी तरह क्यों न की जाय लाभकारिणी नहीं
होती।

635 गयी तिथ बामण ही को व़ांचैनी
बीती हुयी तिथि को ब्राण नहीं बांचता
बीती हुयी बात को याद नहीं करना चाहिये।
मिलावो– 1 बीती ताहि विसार दे आगेकी सुध लेय
2 स्मज इल हवदमे इम इल हवदमेण्

636 गयी भूख ने हेला पाड़ै
गयी हुयी भूख को आवाज देकर बुलाता है।
गयी हुयी आफत को सिर पर लेना।

637 गयी तो ही गळो करावण ने, कांच माथे पड़ी
गयी तो थी गला ठीक कराने को, कांच सिर पर पड़ी।
जिस आफत को दूर करनेका यत्न करे वह तो दूर हो नहीं अुलटे
अेक दूसरी आफत और सिरपर आ पड़े।
मि.–गयी पूतको खो आयी खसम
चौबेजी गये छब्बे होने को दुबे होकर आये

638 गयी व़ातां ने घोड़ा ही को नावड़ै नी
गयी बातों को घोड़े भी नहीं पहुंच सकते।
बीती बात लौटायी नहीं जा सकती।

639 गरज गधे ने बाप कैवावै
गरज गधे को भी बाप पुकरवाती है गरज के कारण गधे को भी
बाप कह पकुारना पड़ता है।
गर्ज के कारण बुरा काम भी करना पड़ता है।

640 गरजणा व़ादल व़रसणा नहीं, भुसणा कुत्ता खाणा नहीं
गरजने वाले बादल बरसने वाले नहीं होते और भोंकने वाले कुत्ते खाने
वाले नहीं होते।
जो कवाद करता है वह काम करके नहीं दिखाता।
देखो कहावत नं. 648

641 गरज दिवानी हुवै
गरज दीवानी होती है।
गरजमन्द आदमी दीवाने की तरह काम करता है।

642 गरजमन्द मारीजै
गरज वाला मारा जाता है।
गरज वाले को लाचार होकर सब सहना पड़ता है।

643 गरज मिटी गूजरी नटी
गरज मिटी और गूजरी ने ​िअनकार किया।
गरज निकल जानेपर कोअी कुछ नहीं देता।
मि.–गरज–दिवाणी गूजरी आयी अब घर कूद
सावण छाछ न घालती जेठ परोसै दूध।

644 गरज व़ड़ी
गरज सबसे बड़ी है।
गरज के कारण मनुष्य सब कुछ करने को तय्यार हो जाता है।

645 गरज व़वाळी,
अूपर कहावत नं. 631 देखिये

646 गरजरा मारा गधे ने बाप कैवै
गरज का मारा गधे को बाप कहकर पुकारता है।
अूपरवाली कहावत नं. 639 देखिये

647 गरज सरी’र व़ैद व़ैरी
गरज पूरी हुयी और वैद्य जिसकी अबतक खुशामद की जाती थी
बैरी बन गया।
काम निकल जाने के बाद कोअी नहीं पूछता।

648 गरजै सो व़रसै नहीं व़रसै घोर अंधार
जो बादल गरजता है वह बरसता नहीं, जो घोर काला होता है और
चुपचाप आता है वह बरसता है।
जो बहुत बातें बनाता है वह कुछ नहीं करता, जो गंभीर होकर चुप
रहता है वह सब कुछ कर गुजरता है।

649 गरीब की खाय जड़ां मूळ सूं जाय
जो गरीब का खा जाता है वह जड़मूल से नष्ट हो जाता है।
जो गरीब का धन मारता है या गरीब को सताता है अुसका नाश हो
जाता है।

650 गरीब रो बेली परमेसर
गरीब का सहायक परमेर है।
मि.–नहीं बेली रो राम बेली।

651 गरीबां रा भगवान है
गरीबों के रक्षक भगवान है।

652 गरीब री हाय खोटी
गरीब की हाय बुरी

653 गरीब री जोरू सगळांरी भाभी
गरीब की जोरू सबकी भौजी सब मजाक करते हैं
गरीब का कोअी आदर नहीं करता।

654 गरीब माथे दोय मूणती व़ती लादै
गरीब जानवर पर दो बोरे ज्यादा लादते हैं।
गरीब को सभी सताते हैं।
मि.–।सस संल सवंक वद जीम ूपससपदह ीवतेमण्

655 गळी रा गिंडक ही को बूैनी
गली का कुत्ता भी बात नहीं पूछता।
कोअी भी पर्वाह नहीं करता।

656 गळे में हरदम सिगड़ी जगती ही रैवैं
गले में हरदम सिगड़ी जलती ही रहती है।
जो व्यक्ति हर समय क्रोध में भरा रहे।

657 गवर रूससी तो आपरो सुवाग लेसी
गौरी रूठेगी तो अपना दिया हुआ सुहाग ले लेगी और अधिक क्या
करेगी।
कोअी रूठे तो जो अधिक से अधिक यह होगा कि जो कुछ हमारे
लिये कर सकता सो नहीं करेगा।

658 गवर रूस सी तो आपरो सुवाग लेसी, भाग तो को लेवैनी
अूपरवाळी कहावत देखिये

659 गवां भेळा घुण पीसीजै
गेहुओं के साथ घुन भी पिस जाते है।
अपराधी के साथ रहने से निरपराध भी दण्ड पा जाते है।

660 गहणा धायां रा सिणगार है भूखांरा आधार है
गहने अच्छी अवस्था वालों अर्थात् धनियों के ाृंार हैं और भूखों के
सहारे है।
अच्छी अवस्था हो तो गहने पहनने से शोभा बढ़ती है और यदि
अवस्था बिगड़ गयी तो अुनको बेचकर निर्वाह किया जा सकता है।

661 गहुं आया वाल खेत व़णाओ ताल

662 गहुं खेत में बेटो पेट में
गेहंू खेत में बेटा पेट में।
​िअनकी आशा नहीं रखनी चाहिअे।

663 गहुं’र गोयला तो भेळा ही नीपजै
गेहूं और–तो साथ ही पैदा होते हैं।
अच्छे बुरे सब एक साथ होते है।

664 गाजर री पूंगी वाजी जिते वाजी पछै तोड़ खायी
गाजर की पूंगी बाजी तब तक बजायी फिर तोड़कर खाली।
अैसी वस्तु जो काम दे और बिगड़ जाने पर भी काम आ सके।
मि.–आम के आम गुठली के दाम।

665 गाड़ी कने बळद आया रहसी
गाड़ी के पास बैल आये रहेंगे अवश्य आयंगे

666 गाड़ी तो चीलों ही व़ैव़ै
गाड़ी तो चीलों पर ही चलती है।

667 गाड़ी देख’र लाडी रा पग सूजै
गाड़ी को देखकर लाड़ी के पैर सूज जाते हैं अब तक तो पैदल
चलती आ रही थी अब गाड़ी देख ली तो कहती है कि मेरे पैर
फूल गये हैं, मैं पैदल नहीं चल सकती।

668 गाड़ी नीचे कुत्तो वैवै जको जाणै गाडी म्हारे ही पाण चालै
गाड़ी के नीचे कुत्ता चलता है जो समता है कि गाड़ी मेरे ही शक्ति
से चल रही है।

669 गाड़ी भर धान री मूठी भर वानगी
गाड़ी भर धान की मुी भर बानगी।
थोड़ा नमूना ही वस्तु का ज्ञान करा देता है।
मि.–सौ मण धान की, एक मुी बानगी

670 गाड़ी में छाजले रो कांअी भार
गाड़ी में छाज का क्या भार।

671 गाढवाळे में रहसी जको राजाजी रा घोड़ा पासी
जो गाढ़वाले में रहेगा वह तो राजाजी के घोड़ों को पिळावेगा ही
अुसे पिलाना ही पड़ेगा।

672 गादड़ मारी पालथी मेहां व़ूठा हालसी
गीदड़ ने पालथी लगा ली अब तो मेह बरसने पर ही वह हिलेगा।
जब कोअी आदमी जमकर बैठ जाय और चलना न चाहे
तब कोअी काम करने का हठ पकड़ ले।

673 गादड़े री मौत आवै जरां गांव कानी भाजै
गीदड़ की मौत आती है तब वह गांव की ओर भागता है जहां वह
कुत्तों का शिकार बनता है।
जब होनहार खराब होती है तो अुलटी बुद्धि आती है और स्वयं
अनिष्ट की ओर अग्रसर होता है।

674 गाय गयी गळांवड़ो लेगी
गाय गयी और साथमें गलांवडा भी ले गयी।

675 गाय घास सूं भायेला कर तो खावै कांअी?
गाय घास से दोस्ती करे तो खाय क्या?

676 गाय दू’र गधां ने पावै
गाय को दुहकर गधों को पिलाता है।

677 गाय में न बळध में
न गाय में न बैल में।
निकम्मा आदमी।

678 गाय रे भैंस कांअी लागै?
गाय के भैंस क्या लगे?
जब परस्पर कोअी रिश्ता न हो।

679 गायां अूछरगी पोटा लारे छोडगी
गायें अुछर गयीं गोबर पीछे छोड गयीं।

680 गायां तो धण्यां री है गुवा​िळये रे हाथमें तो गेडियो है
गायें तो अपने मालिकों की है ग्वाले चरानेवाले के पास अपनी तो
केवल लकुटिया है।
जो कुछ संपत्ति दिखायी देती है सब दूसरों की है अपनी तो रखवाली
हैं।

681 गायां बायां बामणां भागा ही भळा
गायों, यिों और ब्राणों के आगे भागना ही अच्छा ​िअनसे हार मान
लेना अच्छा क्योंकि ​िअनपर विजय पाना भी कलंक का विषय है।

682 गाल थाप रो कितोक आंतरो
गाल और तमाचे में कितना अन्तर।

683 गाळां सूं किसा गूमड़ा हुवै
गालियों से कौनसे गुमड़े होते हैं।
गाली को चुपचाप सुन लेने में कौनसी हानि है?

684 गाव़णो को आवै नी गावणेरो भाअी आवै है
गाना नहीं आत, गाने का भाअी आता है।
गाने का भाअी3ध्4रोना।

685 गावणो’र रोवणो कुण को जाणै नी
गाना और रोना कौन नहीं जानता।

686 गांड रै’र सराय में डेरा
दस्त लग रहे हैं और सराय में डेरा करता है।

687 गांड तपै जद सूत कतै
बैठे–बैठे गांड तप जाती है तब कहीं जाकर सूत कतता है।
बड़ी मेहनत से यह काम होता है।

688 गांड बळै है कन सभाव है
गांड जलती है अीर्षा होती है या स्वभाव ही अैसा है।
हमेशा का यही स्वभाव है या अभी कारण विशेष से क्रुद्ध हुअे हो।

689 गांड में कीड़ो है
गांड़ में कीड़ा है।
चंचल आदमी पर जो टिककर बैठ नहीं सकता।

690 गांड में गू ही कोनी कागळां में नोंता देवै
गांड़में गू ही नहीं, कौवों को न्योता देता है।
पास में कुछ नहीं और काम करने को तैयार हो जाना।

691 गांड रो गड़ फळसेरो लहणायत
गांड़ का फोड़ा और दरवाजे पर रहने वाला पड़ोसी लेनदान दोनों
महा दु:खदायी होते है।

692 गांड लगी फटने खैरात लगी बटणे
गांड़ फटने लगी तो खैरात बांटने लगे।
आपत्ति आने पर मनुष्य धर्म–कर्म करता है।

693 गांव करै ज्यूं गैली करै
जैसे गांव के लोग करते हैं वैसे ही बावली करती है।

694 गांव कोटवाळी आप ही सिखाय दे
गांव कोतवाली करना खुद ही सिखा देता है।
जब कोअी गांव का कोतवाल हो जाता है तो कोतवाली का काम
स्वयं सीख जाता है पहले से न जानता हो तो भी।
जब काम करना पड़ता है तो आदमी अपने आप उसका करना सीख
लेता है।
मि.– छमबमेेपजल पे जीम उवजीमत व​ि पदअमदजपवदण्

695 गांव गैलै ने को गिणै नी गैलो गांवने को गिणैनी
गांव बावले को नहीं गिनता, बावला गांव को नहीं गिनता।
तुम हमारी पर्वाह नहीं करते तो हम तुम्हारी पर्वाह नहीं करते।

696 गांव गयो सूतो जागै
दूसरे गांव गया हुआ व्यक्ति सोता है या जागता है ​िअसका कुछ पता
नहीं।
बाहर गया हुआ आदमी क्या करता है, किस अवस्था में है और कब
लौटेगा ​िअस विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता।

697 गांव जठे ढेढवाड़ो
जहां गांव होता है वहां ढेढवाड़ा–चमारों का मुहल्ला–भी होता है
अच्छी वस्तु के साथ बुराअी कुछ–न–कुछ होती ही है।

698 गांव व़सायो व़ाणिये व़सै जद जाणियै
बनिये ने गांव बसाया तो है पर वह बस जाय तभी समो।
1 बनिया कोअी भी काम नहीं कर सकता। वह कोअी काम कर
सकता है ​िअसका निय तभी हो सकता है जब कि वह करके दिखा
दे।
2 अैसे व्यक्ति पर जिससे कोअी काम होने की आशा नहीं।

699 गांव व़स्यो ही कोनी मंगता पहली ही आयग्या।
गांव तो बसा ही नहीं और मंगते पहले ही आ गये।

700 गांवरी गधी ही को बूैनी
गांव की गधी भी नहीं पूछती।

701 गांवरी साख वाड़ भरै
गांव की गवाही बाड़ भरती है बाड़ देखकर पता चल जाता है कि
गांव कैसा है

702 गांवरी साभा व़ाड ही कैवै है नी
गांव की शोभा बाड़ ही बतला रही है न? व्यंग

703 गिंजी माथो गुंथावणने चाली
गंजी माथा गुंथानेको चली।
बिना शक्ति के कार्य करना।

704 गिंजी रै भागरा गड़ा पड़ै
गंजी के भाग से ओले गिरते हैं।
अभागे के लिअे।

705 गिंजेने परमात्मा नख कांयने देवै
गंजे को परमात्मा नख काहे को दे।
बुरा काम करनेवाले को परमात्मा अुसके करने के साधन नहीं देता।

706 गिंडक नारेळ सार कांअी जाणै
कुत्ता क्या जाने कि नारियल कैसा है।

707 गुड़ ठोकै गुलगुला सूं परेज
गुड़ खाता है और गुलगुलों से परहेज करता है।
बनावटी परहेज करनेवाले पर।

708 गुड़ दियां मरै जकेने जहर क्यूं देणो
जो गुड़ देने से मरे अुसे जहर क्यों देना
जब मीठी बातों से काम बने तो कड़े अुपाय काम में क्यों लावे

709 गुड़ घालसो जिसो मीठो हुसी
जितना गुड़ डालोगे अुतना ही मीठा होगा
जितना खर्च करोगे अुतना ही काम अच्छा बनेगा।

710 गुड़ देतां ही छोरी हुवै जरां पछै कांअी करै?
गुड़ देने पर भी लड़की ही पैदा हो तो फिर क्या करे?

711 गुप्तदान महा पुन
1 गुप्तदान से बड़ा पुण्य होता है
2 चुपचाप काम करने से सिद्धि होती है।

712 गुर कीजै जाण, पाणी पीजै छाण
गुरु सम बूकर करना चाहिअे और पानी छानकर पीना चाहिअे।

713 गुर वि़ना किसो ग्यान
गुरु के बिना ज्ञान कैसा
बिना गुरू से शिक्षा लिये सच्चा ज्ञान नहीं मिलता।

714 गुर विन मिलै न ग्यान
गुरू के बिना पूरा और सच्चा ज्ञान नहीं मिलता।

715 गुररा न पीररा
न गुरु के न पीर के
कृतघ्न व्यक्ति पर

716 गुरूजी, चेला भोत हूग्या। कै–बच्चा, भूखों मरेंगे तो आप ही चले
जायंगे।
गुरुजी, चेले बहुत हो गये।
गुरुजी ने अुत्तर दिया कि–जब भूखों मरेंगे तो खुद ही चले जायंगे।

717 गुळ नहीं गुलव़ाणी नहीं गुळ सूं मीठी जीभ नहीं
गुड़ नहीं, गुड़ की मिठाअी भी नहीं सो ठीक पर गुड़ से मीठी
जो जीभ है वह भी नहीं!
भलाअी करना तो दूर रहा, मीठा बोलना भी नहीं!

718 गुळ विना चोथ किसी
गुड़ के बिना चौथ का त्यौहार कैसा

719 गुळ लारे तमाखू बळै
गुड़ के पीछे तमाखू जलती है
संगत का दोष लगता है

720 गुल हुवै जठे माख्यां आयी रैवै
जहां गुड़ होता है वहां मक्खियां आयी रहती है
जहां कुछ मिलने की आशा होती है वहा लोग अवश्य जाते हैं।

721 गू खायां काळ थोडो ही नीकळै
गू के खाने से आकल थोड़े ही बीज जायगा
निंद्य साधन अख्तियार करने से गुजर कहां तक चल सकता है

722 गूदड़ी में किसी लाल को नीपजै नी
गुदड़ी में कौन से लाल नहीं पैदा होते
गरीबों के यहां भी महापुरुष जनमते हैं

723 गू सूं गू थोड़ी ही धुपै
गू से गू थोड़े ही धुल सकता है?
नीचता के बदले नीचता करने से क्या लाभ।

724 गूगरां रा गोठिया खाय पीने अूठिया

725 गूंगली ही फण करै
गूंगली भी फन करती है
अशक्त व्यक्ति सामना करनेको तय्यार हो जाय

726 गूंगेरी फारसी में गूंगो ही समै
गूंगे की फारसी में गूंगा ही सम सकता है।

727 गेडिया रळग्या
लकुटियां लिकर गड़बड़ हो गयीं
गड़बड़ गोटाला हो गया।

728 गैला कुत्ता हिरणां लारे दोड़ै
बावले कुत्ते ‘हिरणोंके पीछे दौड़ते हैं जो अुनकी पकड़ में नहीं आ
सकते
बावलों का–मूर्खों का–विश्वास मत करो

729 गैला–गैला, गांव मती बाळे के भली चितारी
अरे पागल, गांव मत जला देना। कि अच्छी याद दिलायी
दुष्ट या मूर्ख व्यक्ति जिस काम के करने से रोका जाता है अुसीको
करता है।

730 गैलां रे किसा सींग लागै
बावलों के कौनसे सींग लगते हैं

731 गैली सब सूं पैली
बावली सबसे पहले

732 गैले ने गांड दिखायी तो के आ कव़ाडे री कित खायी
बावले को गांड़ दिखायी तो बोला कि यह कुल्हाड़े की मार कहां
खायी
मूर्ख पर।

733 गोअीड़े रे पाप सूं पींपळी बळै
गुहिरे के दोष से पीपल जलता है
दुष्ट के साथ रहने से निरपराध भी मारा जाता है।

734 गोगो गायो गीतां रो छेह आयो
गोगा गाया और गीतों का अन्त आया
गोगा एक गीत का नाम है जो सबसे अन्त में गाया जाता है।

735 गोडा तो पगां ने ही निंवसी
गोड़े–घुटने तो पैरों की ओर झुकेंगे
अपने ही आदमी को सब चाहते हैं।

736 गोधा गोधा अड़बड़ै’र बांठां रो खोगाळ
गोधे–सांड़ आपस में लड़ते है बीच में बांठों का नाश हो जाता है
बड़ों के गड़ो ंमें छोटों को हानि हो जाती है।

737 गोरवें ही गहूं व़ावणाा

738 गोला किसका गुण करै ओगणगारा आप
1 गोला जाति पर
2 सदा बुराअी करने वाले पर

739 गोलां घर भेळ दियो
गोले जिस घर में रहते हैं अुसका नाश हुअे बिना नहीं रहता

740 गोली रांड पराया धोवती फिरै, आपरा धोवती लाजां मरै
गोली रांड़ पराया मैल धोती फिरती है पर अपना धोती हुअी लाजों
मरती है
दुनिया भर का काम करते रहना पर अपना काम न करना।

741 गोह री मौत आवै जरां, ढेढरा खालड़ा खड़बड़ावै
गोह की मौत आती है तब वह चमार के चमड़ों को खड़खड़ाती है
मि.– गादड़े री मौत आवै जद गांव कानी भाजै