742 घघ्घू रे भाठे री लागी
उल्लू के पत्थर की लगी
थेड़े से कष्ट से कूकने वाले व्यक्ति पर व्यंग।
743 घटत–बढ़त री छियां है
घटती बढ़ती की छाया है।
सुख–दुख आते जाते ही रहते हैं।
744 घड़ती–घड़ती वाड़ में वड़गी
बनाती बनाती बाड में चली गई।
निकम्मे व्यक्ति के प्रति।
745 घड़े सरीखी ठीकरी मां सरीखी डीकरी
घड़े जैसी ‘ठकरी मां जैसी कन्या।
संतान माता के माता–पिता के अनुरूप होती है
746 घण जायां कुळ–हाण घण वूठां कणहाण
बहुत पुत्र होने से कुल की हानि होती है बहुत बरसने से अनाज की
खेतीकी अधिक संतान और अधिक वर्षा किसी काम की नहीं।
747 घण जीतै हो लछमणा
संगठनमें महाशक्ति होनेसे विजय प्राप्त होती है।
अधिक संतान और अधिक वर्षा किसी काम की नहीं।
748 घणा ऊँधा ोटा ले’र आयो है
किसी भाग्यशाली पुरुष के प्रति।
749 घणां गोलां कीटड़ी सूनी
बहुत से गुलामों के रहते भी मालिक–ठाकुर के बिना कोटड़ी सुनी
है।
750 घणा घरां रो पावणों भूखां मरै
अनेक घरों का पाहुना भूखा मरता है।
751 घणी गई थोड़ी रही सो भी जावणहार
उम्र के लिए किसी वृद्ध का कथन।
752 घणी खांची टूटै
अधिक खींचने से डोरी टूट जाती है।
753 घणी चतराई चूल्हे में पड़ै
अधिक चतुराई चूल्हे में पड़ती है।
बहुत ज्यादा चतुर बनने वाले पर व्यंग।
754 घणी दायां जापै रो नास करै
बहुत दाइयां जच्चे का नाश करती हैं
मि.–बहुतै जोगी मठ उजाड़
ज्वव उंदल बवतो ेीवपस जीम इजवजी
ज्वव उंदल बववो ेचवपस जीम क्पददमत
755 घणी सराही खीचड़ी दांतां सूं चिप ज्याय
अधिक सराही हुई खिचड़ी दांतों के चिपती है।
अधिक शोभा करने से इतराने वाले पर व्यंग।
756 घणी सैणप में किरकिर पड़ै
अधिक सयानप में धूल पड़ती है।
757 घणो खावै घणो मेद
जो अधिक खाता है उसका मेद अधिक बढ़ता है।
अधिक खाने से चर्बी बढ़ती है बुद्धि नहीं
758 घणो खावै जाको घणो मरै
अधिक भोग भोगने वाले की इच्छा भोग में बनी ही रहती है
759 घणो घी भींता रे लगावणने को हुवैनी
घी अधिक हो तो वह भीतों पर लगाने के लिये नहीं होता।
किसी वस्तु का संग्रह अधिक हो तो उसको लुटाना या व्यर्थ नाश
करना नहीं चाहिए।
760 घणो स्याणो कागलो जको गू में चांच डबोवै
अधिक सयाना कौवा होता है जो गू में चोंच डुबोता है।
अधिक सयाना बनने वाले पर व्यंग।
761 घणो हेत टूटण ने बडी आंख फूटण ने
अधिक प्रेम टूटने के लिए होता है।
जिन में बहुत अधिक प्रेम होता है वह कभी–न–कभी टूट जाता है या
विरोध में परिणत हो जाता है।
थ्तपमदकेीपच जींज सिंउमेए हवमे वनज पद ं सिेंीण्
भ्वज सवअम पे ेववद बवसकण्
762 घणो हेत लड़ाई रो मूल
अधिक प्रेम लड़ाई को जड़ है।
763 घर आयो नाग न पूजिय बांबी पूजण जाय
घर आये नाग को नहीं पूजती बांबी पूजा करने को जाती है।
सहज में अवसर प्राप्त होनेपर लाभ नहीं उठाने वाले के प्रति।
764 घरआळां ने दोरी है जिसी पारकां ने कोनी
घरवालों पर जितनी जिम्मेवारी होती है उतनी परायों पर नहीं होती।
765 घर आंवती लिछमी ने ठोकर नहीं मारणी
घर आती हुई लक्ष्मी को ठोकर नहीं मारना चाहिए।
धन या कोई लाभदायक वस्तु स्वयं मिल रही हो तो ले लेना चाहिए।
766 घर कह मने खोल जोय। व्यांव कह मने मांड जाये
घर कहता है कि मुझे खोलकर तब देख और विवाह कहता है कि
मुझे करके तब देख विचार कि कितना खर्च हुआ
घर बनवाने और विवाह पूरा करने के खर्च का ठीक पता बाद में ही
लग सकता हैं पहले किये हुए अन्दाज से हमेशा अधिक खर्च होता
है।
ठनपसकपदह ंदक उंततलपदह बीपसकतमद ंतम हतमंज ूेंजमतेण्
767 घर–घर माटी रा चूल्हा है
घर–घर मिी के चूल्हे हैं।
सबका यही हाल है।
किसी से बेजा सहायता की आशा नहीं रखनी चाहिअे क्योंकि सबको
पहले अपने कुटुम्ब के निर्वाह की फिकर रहती है।
768 घर काणी पीठ पर है।
घर कानी पीठ पर है।
बहुत दूर स्थान है। बस्ती से अलगस्थान।
769 घर का जोगी जोगिया आण गांव का सिद्ध
घके जोगी जोगिये कहलाते हैं बाहर गांव के जोगी सिद्ध कहे जाते
हैं।
मि.–1 अति परिचयादवज्ञा भवति
थ्ंउपसपंतपजल इतबमके बवदजमउचजण्
770 घर की मुरगी दाळ बरोबर
घर वालों की कद्र नहीं करने पर।
771 घर–घर ढोल की घर–घर तान उसका नाम हिन्दुस्तान।
हिन्दुस्तान के अनैक्य पर।
772 घर जाय घररां सूं मांचो जाय माई सूं
773 घर तो घांचीरो ही बळसी पर सोरा तो ऊंदरा ही को रहैनी
घर तो घांची का भी जल जायगा पर सुख से तो चूहे भी नहीं रहेंगे।
अपकार करने वाले के प्रतिशोध की भावना जागृत हो जाती है।
774 घर दूर घटी भारी
घर अभी दूर है और सिर पर भारी ची है।
काम से जी चुराने वाले के प्रति व्यंग।
आलसी व सुस्ते प्रति व्यंग।
775 घर–फाट्ये ने कारी नहीं
घर फटे को कारी नहींं।
घर में फूट पड़ जाने से उसका नाश हो जाता है।
776 घर फूट्यां घर जाय
घर में कोई फूट जाय तो घर का नाश हो जाता है।
घर की फूट बुरी है।
777 घर बळती को दीसै नी डूँगर बळती दीस ज्याय
घर में जलती आग नहीं दिखाई देती पहाड़ पर जलती आग दिखाई
दी जाती है।
अपने दोष नहीं दिखाई देते पराये दोष दिखाई दे जाते हैं।
778 घर बैठां गंगा आई
घर बैठे गंगा आई।
बिना परिश्रम के लाभ हुआ।
779 घर में ऊँदरा थड़ां करै है
घर में चूहे खेलते हैं।
घर में कुछ भी नहीं है। बिलकुल गरीब है।
780 घर में तो फाका पड़ै मोडा नूंतण जावै
घर में तो फाके पड़ते हैं और फकीरों को न्यौता देने जाता है।
781 घर में तो भूंज्योड़ी भांग ही कोनी
घर में तो भुनी भांग भी नहीं।
पास में कुछ भी नहीं।
782 घर में नाणा बींद परणीरजै काणा
घर में पैसा होतो काने दूल्हे का भी विवाह हो जाता है।
पैसे से सब कुछ हो जाता है।
783 घर में नहीं अखतरा बीज, कोडो खेळै आग्वातीज
पास में कुछ न होनेप र भी आनंद चैन उड़ाना।
784 घर में भूवाजी थड़ाँ करै
घर में कुछ नहीं है।
785 घर में रामजी रो दीन है
पूर्ण गृहस्थी है।
786 घर में रामजी को नांव है
घरमें रामजी का नाम है।
कुछ नहीं है।
787 घर में राम रम
घर में बाल–बच्चे व सुख है।
788 घर में हाण जगत में हांसी
घर की हानि होती है जगत हंसी उड़ाता है।
दो दो हानियां।
789 घर में हुवै संवार तो ख मारो गंवार
घर में सवार हो तो गंवार चाहे ख मारो
घर में लाभ होता हो तो गंवारों की बदनामी से नहीं डरना चाहिअे।
790 घर रा छोरा घंटी चाटै ओे जीने आटो
घर के बच्चे ची चाटते हैं और ओाजी को आटा चाहिये
791 घर रा टाबर कुंवारा फिर पाड़ास्यां ने फेरा भावै
घर के बच्चे कुंआरे फिरते हैं पड़ोसियों को फेरे चाहिए
792 घर रा ही देवता घर रा ही पुजारी
घरके ही देवता घरके ही पुजारी
सब प्रकार की सुविधा मिलने पर
793 घर री खांड करकरी लागै चोरी रो गुड़ मीठो
घर की खांड़ करकरी लगती है चोरी का बुड़ मीठा लगता है
घर की अच्छी वस्तु का तिरस्कार करके मु़त के माल पर आंख
लगाने वाले के प्रति व्यंग।
794 घर री रोटी बारे खावणी है
घर की रोटी बाहर खाना है।
795 घर रो छोरो बाहर रो बींद
घर का छोरा बाहर का बींद
796 घर रो भेदी चोर
घर का भेदी चोर होता है
797 घर रो सामी सूंठरो गांठियो
798 घरे घाणी तेली लुखो क्यों खावै
घर घानी फिर तेली रूखी रोटी क्यों खाता है
ज्ीम जंपसवतश्े ूपमि पे ूवतेज बसंकण्
799 घरे घोड़ो’र पाळो जावै
घर पर घोड़ा और फिर पैदल जाता है
800 घरे धीणोर लूखो खाय
घर में दूध–घी और रूखी रोटी खात है
801 घायल री गत घायल जाणै
घायल की गति को घायल ही जानता है
जिस पर बीतती है वही जानता है।
802 घाव बैरी रो ही सरावणो जोइजै
घाव वैरी का भी सराहना चाहिए
वैरी की भी अच्छी बात की तारीफ करना चाहिअे।
803 घाव माथे लूण बुरकावै
घाव पर नमक छिड़कता है
दुखी को और दुख देने या जली कटी सुनाने पर
804 घी आंगिळायं गुळ डिळयां
घी अंगलियों से गुड़ डलियों से
जैसी चीज वैसा उपयोग
805 घी इंधारे में ही छानो को रहैनी
घी अंधेरे में भी छिपा नहीं रहता।
अच्छाई छिपी नहीं रहती
806 घी खायां आंख्या री जोत वधै
घी खाने से आंखों की ज्योति बढ़ती है
घी खाना नेत्रों की दृष्टि के लिए लाभकर है
807 घी घालै जितो पाठान्तर–जिसो ही स्वाद
जितना घी डाला जाता है उतना ही स्वाद होता है
808 घी जाट रो तेल हाट रो
घी जाट का तेल बाजार का लेना चाहिये
809 घी ढुळो तो मूंगा में
घी लुड़का तो मूंगों में ही।
खर्च लगने से घरवालों को ही लाभ पहुंचने पर।
यह पूरी कहावत इस प्रकार है:–
भाई रो धन भाई खायो बिना बुलाये जीमण आयो
आखडि़यो पण पडि़यो नई घी ढुलियो तो मूंगा महीं
810 घी बिना लूखो कंसार टाबर बिना लूखो संसार
घी बिना कंसार रूखा संतान बिना संसार रूखा।
संतान ही संसार का सच्चा आनन्द है।
811 घी सुधारै सागने नांव बहूरो होय
घी से साग सुधरता है पर नाम होता है बहू का जो भोजन बनाती
है
812 घोड़ा गणगो रां ने ही नहीं दौड़सी तो फेर कद दौड़सी
घोड़े गनगोर को ही नहीं दौड़ेंगे तो फिर कब दौड़ेगें।
विवाहादि अवसरों पर शक्ति के अनुसार खर्च नहीं करने पर।
813 घोड़ो दोड़–दोड़ मरै सवार री हांस ही को पूरीजैनी
घोड़ा दौड़–दौड़कर मरता है पर सवार की हौंस ही पूरी नहीं होती
काम की बेकद्र पर
814 घोड़ां ने घर किती दूर
घोड़ों को घर कितना दूर
815 घोड़ा बरनोळे ने जोईजै कहै घिरतो आये
घोड़ा विवाह के मौके के लिए चाहिये और तू कहता है कि लौटते
हुए आना अवसर पर सहायता न देनेपर।
816 घोड़ी री लांवी हुसी तो आपरी ढकसी
घोड़ी की लम्बी होगी तो अपनी लज्जा ढकेगी
समर्थ व्यक्ति अपने ही बेटों–पोतों को लाभ पहुंचाता हैदूसरों को नहीं,
ऐसा तो कोई विरला ही होता है
817 घोड़े ही वेगा चढावै गधे ही वेगा चढावै
घोड़े पर भी जल्दी चढ़ाते हैं और गधे पर भी जल्दी चढ़ाते है
जो व्यक्ति जल्दी रुष्ट हो जाय और जल्दी प्रस हो जाय उसके लिए।
मि.– क्षणे रुष्ट क्षणे तुष्टा
818 घोड़ा घास सूं हेत करे तो खाय कैने
घोड़ा घास से प्रेम करे तो खावे किसे
मि.–गाय घास सुं भायला करै तो खावै कैने