901 जंगल जाट न छेडि़यै हाटां कीच किराड़।
रांगड़ कदे न छेडि़ये पटकै टांग पछाड़।।
जंगल में जाटको न छेड़ो और बाजार में बनिये को
राजपूत को कभी मत छेड़ो वह पछाड़ मारेगा।

902 जंगळ में मंगळ

903 जकै गांव जाव़णो नहीं जकैरो मारग क्यूं बूणो
जिस गांव जाना नहीं उसका मार्ग क्यों पूछना।
जिस काम से मतलब नहीं उसके पीछे क्यों सिर खपाना।

904 जग जीत्यो म्हारी काणी, अूभो हुव़ै जद जाणी
जग जीता मेरी कानी; वर ठाढ़ होय जब जानी।
जब दोनों ओर खोट हो।

905 जट बुध नट बुध
जाट और नट की बुद्धि विचित्र होती है।

906 जटा वधायां हर मिलै तो वड़ला सुर्ग क्यूं जावै नी
जटा बढ़ाने से भगवान् मिले तो बड़ के पेड़ स्वर्ग क्यों नहीं जाते?

907 जठै पड़ै मूसळ बठै खेम कूसळ
जहां मूसल गिरता है वहां खेम–कुशल रहती है।
जहां मूसल गिरता है वहां अनाज को कूट–पीस कर रख देता है।
इसी प्रकार जहां समर्थ व्यक्ति पहुंचता है वहीं उसे सफलता मिलती है।

908 जठै सेर वठै सवा सेर
जहां सेर वहां सवा सेर

909 जठै सौ वठै सवा सौ
जहां सौ वहां सवा सौ।
दुनियां में बलवान और महा बलवान दोनों ही मिलते है।

910 जण–जण रो मन राखती वेस्या रहगी बां
प्रत्येक का मन रखने से वेश्या बां रह गई।
जो प्रत्येक मनुष्य को प्रस रखना चाहता है उसका काम कभी नहीं
होता।

911 जणज्यो अे रांडां डीकरा हाथों में लीज्यो ठीकरा
ए रांड़ों, पुत्र जनना और हाथों में ठिकरा लेना।
नालायक पुत्राों के प्रति जो शादी होने पर माता–पिता की सेवा छोड़कर
अपनी बहू के वशमें हो जाते है।

912 जब तक सांसा तब तक आसा
अंतिम सांस तक आशा रहती है

913 जबर ने पूगै सबर
जबरदस्त अथवा जुल्मी के जुल्मों को धैर्यपूर्वक सह लेना ही ठीक है
क्योंकि एक दिन निर्बल की हाय से जुल्मी नष्ट हो जायगा।

914 जबरो मारै र रोवण को दै नी
जबरदस्त मारता है और रोने नहीं देता।

915 जबान हारी जिकै जिलम हार्यो
जेा प्रतिज्ञा से टल गया उसने जीवन व्यर्थ कर दिया।
प्रतिज्ञा का पालन सदा करना चाहिए।

916 जम रो बुलावो आई जो पण राज रो बुलावो मत आई जो
यम का बुलावा आवे पर राज्य का बुलावा न आवे।

917 जमा लगै सिरकार की मिर्जो खैले फाग
खर्च होता है सरकार का फाग खेलता है मिरजा।
पराये खर्च पर आनन्द मनाना।

918 जमी जोरू जर राड़ रा घर
जमीन, ी और धन ये तीन गड़े के घर हैं।
अधिकतर इन्हीं तीनों में से किसी एक के कारण गड़ा होता है।
मि.– गड़े की तीन जड़ जन जमीन जर

919 जलम रा मंगता नांव दाताराम
जन्म के मंगते नाम दाताराम
नाम के अनुसर गुण नहीं होता।

920 जलम रा साथी है करम रा साथी कोनी
मां–बाप जन्म के साथी हैं पर भाग्य के साथी नहीं।
मां–बाप जन्म देते हैं पर भाग्य का फल अपना भोगना पड़ता है।

921 जलम रो दुखारी नांव सदासुख
जन्म का दुखी नाम सदासुख
ऊपर न.ं 9 9 की कहावत देखो.

922 जळ में मूतै जको जाणै
जल में जो मूतता है वहीं जानता है दूसरा नहीं जान सकता कि
उसने जल में मूता है अक्सर पाप कर्म गुप्त रह जाते हैं और उनको
करने वाला ही जानता है।

923 जवानी में गधे ने ही जोवन चढै
जवानी में गधे को भी यौवन चढ़ता है।
मि.–प्राप्ति तु षोड़शे वर्षे शूकरी सुन्दरी भवेत्

924 जवानी रांड गधी ने ही आवै
जवानी रांड गधी को भी आती है

925 जहर खावण ने ही टको कोनी
जहर खाने को भी टका पास में नहीं।
बिलकुल ही गरीब है।

926 जहर रा कीड़ा जहर में राजी
विष के कीड़े विष में ही राजी रहते है।
मि.–दाख छुहाड़ा छांडि़ अमृतफल, विषकोड़ा विष खात।

927 जहर सूं जहर डटै
जहर से जहर दबता है।
मि.–विषस्य विषमौषधम्।

928 जाका पडा सभाव जासी ज वसूं
नीम न मीठा होय सींचो गुड़ घी सूं
जिसका जो स्वाभाव पड़ गया है वह जीव के साथ ही छूटता है।
नीम को चाहे घी गुड़ से सींचो तो भी वह मीठा नहीं होता।
स्वाभाव नहीं बदलता।
मि.–स्वभावों दुरतिक्रम:
अतीत्य हि गुणान् सर्वान् स्वभावो मूघ्नि वत्र्तते।

929 जाकूं राखै साइयां मार न सक्कै कोय
परमात्मा जिसका रक्षक है उसको कोई हानि नहीं पहंुचा सकता।

930 जागते ने जगावणो दोरो
जागते हुए को जगाना कठिन है
छवदम ेव इसपदक ें जीवेम ूीव ूवदज ेममण्
ज्ीमतम ंतम दवदम ेव कमं​ि ें जीवेम जींज ूवदज ीमंतण्

931 जाट कहै जाटणी इये गांव में रहणा।
ऊँट बिलाई लेयगी हांजी–हांजी कहणा।।
जाट कहता है कि जाटनी ‘यदि गांव में रहना है तो रहना तभी हो
सकता है कि जब गांव वाले लोग कहें कि बिल्ली ऊँट को ले गई
तो हम भी हां में हां मिलावें।
किसी जगह रहना हो तो वहा के नियमों का पालन करना पड़ता है
चाहे वे कैसे ही हो।
किसी आदमी के साथ रहना है तो हां में हां मिलानी ही पड़ती है।

932 जाट जंवाई भाणजा रेबारी सोनार।
इतरा हुवे न आपरा कर देखो उपगार।।
जाट, जंवाई और भाणजों की अकृतज्ञता पर।

933 जाट जठे ठाट
जहां जाट वहां ठाट

934 जाट जाटणी ने बारी कोनी आवै जणां गधेड़ी रा कान मरोड़ै
जाट जाटनी को नहीं पहंुच पाता तब गधी के कान मरोड़ता है
ज्ीमल ूीपच जीम बंज प​ि जीम उपेजतमेे कवमे दवज ेचपदण्

935 जाट डूबै धोळी धार
जाट धोली धार डूबता है

936 जाटणी को जायो नी
जाटनी ने नहीं जना है 3ध्4 कायर नहीं हूं।

937 जाट न जाणै गुण किया चिणा न जाणै बेह

938 जाट री बेटी काकेजी री आण
जाट की बेटी काकाजी की आन
गरीब की शपथ को कोई नहीं मानता।

939 जाटणी बेटी काकोजी नांव
जाट की बेटी काकाजी नाम
अयोग्य को सुन्दर नाम देने पर व्यंग।

940 जाडा जका सदा ही जबरा
जो घने हैं वे सदा ही बलवान होते हैं
मिल–जुलकर रहने में बल होता है। एकता में बल होता है।
मि.–न्दपवद पे ेजतमदहजी
संघे शक्ति: कलौयुगे

941 जाणे कोई गांव रे ने कैवै है
मानो किसी पराये गांव वाले को कहते हैं इसे नहीं कह रहे हैं
किसी को कहने पर भी जब वह नहीं सुनता तब कही जाती है।

942 जाण मारै वाणियो पिछाण मारै चोर?

943 जात जात रो बैरी
जातिवाला जातिवाले का वैरी होता है

944 जात पांत पूछै नहिं कोय, हर कूं भजैस हरको होय

945 जात मनायां पगै पड़ै कुजात मनायां सिर चढै
अच्छी जात मनाने से पैरों पड़ती है, कुजात मनाने से सिर चढ़ती है

946 जात री धारण की ढेढ़, अछूत भींटोड़ो खाऊँ कोनी
जाति की धाण की कहती है कि छुआ नहीं खाती

947 जात रो कारण नहीं रात रो कारण है
जाति का कारण नहीं रात का कारण है

948 जा भैंस पाणी में
जा भैस पानी में
कोई वस्तु लापता हो जाने पर

949 जाय जान रह ईमान
जान भले ही जाय पर ईमान रह जाय
ईमान जानसे बढ़कर है

950 जाय लाख रह साख
लाख का धन चला जाय पर साख रह जाय
साख सबसे बड़ा धन है।

951 जायोड़ा कदे पगां चालसी
तेरे जाये हुए भी कभी पैरों से चलेंगे
बार–बार कहने पर भी किसी काम को न करने वाले के प्रति।
देखो आगे कहावत नं. 803

952 जालम गुजर ज्याय जुलम रह जाय
जालिम मर जाता है पर जुल्म रह जाता है
जालिम जो जुल्मी कायदे बना जाता है वे बने रहते है।

953 जावणो नहीं जके गांव रो मारग क्यूं बूणो
देखा ऊपर कहावत नं. 903

954 जांवतोड़ा जांवतोड़ा, म्हारे बाके में बोर मेल दिये
किसी आलसी के पास बेर पड़ा है पर वह आलस के मारे उसे मुंह
में नहीं डाल सकता। एक रास्ते चलने वाले को जाता देखकर पुकारता
है कि अरे जाने वाले, जाने वाले, मेरे मुंह में यह बेर तो रख देना।
आलसी की उक्ति
नवाब वाजिदअली शाह के अहदियों की कथा प्रसिद्ध है।

955 जावै सो दिन आवै नहीं
जैसा दिन जाता है वैसा फिर नहीं आता
यही अच्छा दिन है अभी काम कर डालो

956 जिण घर बाळा उरा घर कायका दिवाळा
जिस घर में बालक है उस घरमें काहे का दिवाला
बालक सबसे बड़ी संपत्ति हैं।
घर में बालक हैं तो फिर अच्छे दिन आ सकते हैं।

957 जिण रे हाथे हांडी–ढोई उणरे हाथ है सब कोई
जिस के हाथ में हंडि़या और कलछी है उसके हाथ में सभी कोई है।
धनवान् या रसोइये के सब वश में हैं।

958 जितो गुड़ घालसो जितो ही मीठो हुसी
जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा
जितना खर्च करोगे उतना ही काम अच्छा होगा

959 जितो बारे जितो ही मांय
जितना बाहर उतना ही भीतर
चालाक व धूर्त के प्रति

960 जिसा करै जिसा भोगै
जैसा करता है वैसा ही भोगता है
करनी के अनुसार फल भोगता है

961 जिसा नागनाथ बिसा सांपनाथ
जैसे नागनाथ वैसे सांपनाथ
जब दो व्यक्ति एक–से हों।

962 जिसा भाई रा मोसाळा बिसा बहन रा गीत
जैसी भाई की मौसालै की सामग्री वैसे बहन के गीत कीति

963 जिसो खावे अ जिसो हुवे म
जैसा अ खाता है वैसा मन होता है
भोजन का प्रभाव मन पर अवश्य पड़ता है

964 जिसो देव बिसी पूजा
जैसा देवता वैसी पूजा

965 जिसो देवता बिसा पुजारी
जैसा देवता वैसा पुजारी

966 जिसो पीवै पाणी बिसी हुवै वाणी
जैसा पानी पीता है वैसी ही वाणी होती है

967 जिसो सिलाम बिसो इनाम
जैसा सलाम वैसा इनाम

968 जीभ नहीं हुती तो कुत्ता ही खीर को खांवतानी
जीभ नहीं होती तो कुत्ते भी खीर नहीं खाते कोई भी बात न पूछता
अधिक बकने वाले के लिए कहा जाता है।

969 जीमण में अगाड़ी लड़ाई में पिछाड़ी
जीमने में सबसे आगे और लड़ाई में सबसे पीछे रहना चाहिए

970 जीमणो मंा रे हाथ रो हुवो भलांई जहर ही
जीमना मां के हाथ से, हो चाहे जहर भी
सदा माता के हाथ से भोजन करना चाहिए।

971 जीमता हुवो तो चळू अठे आर कीजा
जीमते हों तो आचमन यहां आकर करना
संदेश पहुंचते ही तुरंत चले आना।

972 जीवणो जिते सीवणो
जब तक जीना जब तक सीना
जन्म भर काम लगा ही रहता है।

973 जींवतां री माया है
जीते हुओं की माया है
जब तक जीवन है तभी तक यह ठाटबाट है

974 जींवते सटे मरयोड़ो को देवै नी
जीवित के बदले मरा हुआ नहीं देता
बड़ा कंजूस है

975 जीवै जिते कुत्तो भुसावै
जब तक जीता है भौंकता है
जब तक जीवित है तभी तक नाम चलेगा, साहसहीन के प्रति

976 जीवे जिते जंजाळ
जब तक जीता है तब तक जंजाल लगा रहता है
संसार की चिन्ताएं जीते जी के लगी रहती है

977 जूंवारे खायां सूं किसा घाघरा नाखीजै है
जुओं के खाने से लहंगे कहीं फेंके जाते हैं
लहंगों में जुएं पड़ जायं तो वे फेंक नहींं किये जाते।
साधारण कष्ट के डर से अपना काम नहीं छोड़ा जाता।

978 जुती जकेरो ही सिर
जिस की जूती उसी का सिर
किसी का माल छल अथवा चालाकी से लेकर वापिस उसी को देना
परन्तु यह कह कर कि यह मेरा है।

979 जेठ–असाढां रा तपै तावड़ा जोगी हुयग्या जाट
जेठ–आषाढ़ की धूप तपती है जिससे जाट जोगी बन गये
जेठ और आषाढ के महीनों जाट धूप–कष्ट की परवाह न करके कठिन
श्रम करते है।
मि.– आसोजां रा तावड़ा जोगी हुयग्या जाट

980 जेठ वैसाखां रा तावड़ा लागण दो
जेठ–वैशाख की धूप लगने दो
पा होने दो, कष्ट अनुभव करने दो

981 जेठ माथे बेटी थोड़ी ही जिणी है
जेठ पर बेटी थोड़े ही जनी है
दूसरे के भरोसे काम थोड़ा ही किया जाता है।

982 जेठे जेठे असाढ हेठे

983 जेतियो जांगळू जासी
जेतिया जांगलू जायगा ही। ऐसा काम करके ही रहेगा
कार्य विशष को करने के लिए हठ करने वाले के प्रति।

984 जे सुख चावै जीव तूं चोदू होकर रह
हे जीव, जो तू सुख चाहता है तो गरीब बनकर रह

985 जैसा कंता घर भला वैसा रहै विदेस
जैसा कंत घर बसै तैसा वसै विदेश
जिसके पास रहने पर भी सहायता न मिलै
निकम्मे आदमी का घर रहना और बाहर रहना एक–सा है

986 जैसे कूं तैसा मिल्या डूमण कूं नाई
ठीक साथ या मेल मिलने पर

987 जैसे कूं तैसा मिल्या बामण कूं नाई
वै देखाअी आरसी वै तिथवार बताअी।
जैसे को तैसा मिला ब्राण को नाई।
जब बदले में वैसा ही वत्र्ताव करनेवाला मिल जाय तब।

988 जैसे बाजै बायरा तैसी दीजै पूठ
जैड़ा बाजै बायरा तैड़ी लीजै ओट ।
समय के रुख के अनुसार काम करना चाहिए।

989 जोगी जुगत जाणी नहीं कपड़ा रंग्या तो क्या हुवा
योगी ने योग की युक्ति नहीं जानी खाली योगी के से कपड़े पहन
लिए तो क्या लाभ हुआ।

990 जोगी था सो रम गया आसण रही भभूत
जोगी तो चला गया अब तो उसके आश्रम में भभूत का ढ़ेर पड़ा है।
सत्पुरुष के स्थानान्तर होने पर भी उसके सुकृत्यों की सुगन्ध रह जाती
है।

991 जो जावै गुजरात करम छावणी साथ री साथ
यदि गुजरात भी जाय तो भी कर्म की छावनी तो साथ–की–साथ रहती
है।
भाग्य सब जगह साथ लगा रहता है।

992 जो धन दीसै जांवतो आधो लीजे बांट
जो सब धन जाता दिखाई दे तो आधा ही बांट लेने पर राजी हो
जाना चाहिए।

993 जोव़निया तूं भलां ही जाज्ये तूं मत जाज्ये टहरका
हे यौवन तू भले ही चले जाना पर हे नखरे तू मत जाना।
नखराली अधेड़ ी के प्रति व्यंग।

994 जोहर ने जोहरी परखै
जौहर की परीक्षा जौहरी ही कर सकता है।
गुण की कदर गुण का जानने वाला ही कर सकता है।

995 ज्यांने राखै सांइयां मार न सके कोय
जिसकी ईर रक्षा करता है अुसे कोई नहीं मार सकता।

996 ज्यांरा वखत पावणा बांरा सै काम सुवावणा
जिसका अच्छा समय पाहुना होता है उसके सब काम सुहावने होते हैं
अच्छा समय आने पर सब काम अच्छे होते है।

997 ज्यांरी खावै बाजरी बांरी भरै हाजरी
जिसकी बाजरी रोटी खाय उसी की हाजिरी भरे।
जो पालता है उसी का काम लोग करते है।
पालने वाले का काम करना ही पड़ता है।

998 ज्यूं–ज्यूं भीजै कामळी त्यंू–त्यूं भारी होय
कंबल ज्यों–ज्यों भीगता है त्यों–त्यों भारी होता है।
दिनोदिन बढ़ने वाले कष्ट के प्रति।
छोटे आदमी के उच्चपन प्राप्त कर लेने से उसमें जो दिनोदिन अहंकार
की वृद्धि होती है उस पर उंक्त