350 कचर सूं कचरो वधै
कूड़े से कूड़ा बढ़ता है
सफाई रखना चाहिअे।

351 कठैई जावो पईसां री खीर है
कहीं जाओ, पैसों की खीर है
सभी जगह पैसे की जरूरत पड़ती है।

352 कठैई, व़ावे, कठेई ऊगै
कहीं बातो है, कहीं उगता है
अैसे व्यक्ति के लिअे जो अभी अेक जगह थोड़ी देर पीछे दूसरी जगह
तथा और थोड़ी देर पीछे तीसरी जगह दिखायी पड़े।
अस्थिर अथवा बेपता आदमी के लिअे।

353 कठै राजा भोज, कठै गांगलो तेली
कहां राजा भोज, कहां गंगला तेली
जब दो वस्तुओं में या व्यक्तियों में बहुत अन्तर हो।

354 कढी में कोयला
कढी में कोयले
अनमोल वस्तुओं का संयोग अच्छे के साथ बुरे का संयोग।

355 कण थोड़ा, कांकरा घणा
दाने थोड़े, कंकर बहुत
बात में सत्यांश का अभाव

356 कथनी सूं करणी दोरी
कहन से करना कठिन

357 कदास डाली निंव ज्याय
कदाचित डाळी झुक जाय
संभव है सफलता मिल जाय। संभव है अच्छे दिन लौट आवें।

358 कदेई सुपनो साचो करणों क नहीं?
कभी सुपना सच्चा करना या नहींं?
अनेक बार कहने पर
1 काम न कर दिखाने वाले के लिअे
2 जब कोई अनेक बार कहने के बाद अेक बार काम कर दे।

359 कदे गाडी चीलां पर, तो कदे खरबूजों में ही सही
कभी गाड़ी रास्ते पर तो कभी खरबूजों में ही सही
............

360 कदे गाडी नाव पर तो कदे नाव गाडी पर
कभी गाड़ी नाव पर तो कभी नाव गाड़ी पर
1 जब विभि परिस्थिातियों के व्यक्ति परस्पर सहायता करें
2 दो भि परिस्थितियों के व्यक्तियों का परस्पर भाग्य परिवर्तन

3 कभी अेक का दोष तो कभी दूसरे का।
मि.–ऊतर भीखा म्हारी बारी।

361 कदे घी घणा, कदे मुी चिणा
कभी खूब घी, और कभी केवल मुी भर चने
1 संसार में सभी दिन अेक–से नहीं होते।
2 जो कुछ ईश्वर दे उसी से संतोष करना चाहिअे।

3 विरक्त साधुके लिअे।

362 कदे दिन बड़ा कदे रात बड़ी
कभी दिन बड़े और कभी रात बड़ी
1 संसार की परिवर्तनशील दशापर, समय सदा अेक–सा नहीं रहता।
2 कभी अेक का दांव, कभी दूसरे का।

363 कदे न गांठू रण चढा, कदे न भानी भीड़
कायर कभी युद्ध के लिअे नहीं चढ़ा और न कभी किसी का दु:ख दूर
किया
1 कायर और पोच आदि से सहायता की आश नहीं रखनी चाहिअे।
2 दान न मिलने पर कंजूस यजमान के लिअे भाट आदि याचक
जातियों के लोगों का कथन।

364 कनै कोडी कोनी, नांव किरोड़ीमल
पास में कौड़ी नहीं, नाम करोड़ीमल
जब नाम के अनुसार गुण न हो।
मि.–1 आंख्यांरा आंधा, नांव नैणसुख।
2 पेरणनै घाघरो ही कोनी, नांव सिणगारी।
3 खसबोरो छांटो ही कोनी, नांव गुलाबसिंघ।

365 कपड़ा सपेत’र घोड़ा कमेत
कपड़ा सफेद और घोड़ा कमेती रंग का उत्तम।

366 कपड़ा पहरै तीन वार, मंगल, बुध अर थावर वार पाठांतर वृस्पत
मंगल, बुध और शनिवार को कपड़ा पहनना चाहिअे।

367 कपड़ा फाट गरीबी आयी जूती फाटी चाल गमायी
कपड़े फटे और गरीबी आयी, जूती फटी और चाल बिगड़ी।

368 कपड़ो क तूं म्हारी इज्जत राख, हूं थारी राखूं
कपड़ा कहता है कि तुम मेरी इज्जत रखो, मैं तुम्हारी रखूंगा।
कपड़ों को खूब सावधानी से रखना चाहिअे क्योंकि अैसा करने से
कपड़े अच्छे रहते हैं और अच्छे कपड़ों से आदमी की इज्जत होती है।

369 कपूत पूत खांधनै काम आवै
कपूत बेटा बाप की अरथी को कंधा देने के काममें आता है पिता की
मृत्यु पर पुत्र तथा अन्य निकट सम्बन्धी अरथी को कंधों पर उठाकर ले
जाते हैं
1 कपूत और किसी काम का नहीं होता।
2 बेटा कपूत हो तो भी कंधा देने के काम तो आता है।

3 नालायक आदमी भी कभी–न–कभी कुछ–न–कुछ काम आता ही है।

370 कप्पूआला पोत दिखा दिया
कप्पू वाले लक्षण दिखा दिये।
अपनी नीचता प्रकट कर दी।

371 कबूतर नै कूवो ही दीखै पाठान्तर सूै
कबूतर को कुंवा ही दिखाई देता है।
1 टेव पड़जाने पर फिर वैसा करना ही अनिवार्य हो जाता है।
2 टेव पड़ जाने पर फिर मनुष्य वही काम करता है।

372 कमजोर गुस्सा ज्यादा, मार खाणै का इरादा
कमजोर को अधिक गुस्सा आता है और परिणामत: हानि उठाता है।

373 कमजोर गुस्सो घणो
कमजोर को बहुत क्रोध आता है
कमजोर बात–बात में क्रोध करता है

374 कमजोर री जोरू सगळांरी भाभी
कमजोर की ी सबकी भाभी
1 कमजोर की ी से सब मज़ाक करते हैं क्योंकि उससे कोई नहीं
डरता।
2 कमजोर को सब सताते है।
मि.–कमजोर की जोरू सबकी सरहज

375 कमाऊ पूत आवै डरतो, अणकमाऊ आवै लड़तो
कमाऊ बेटा डरता–डरता घर में आता है और न कमाने वाला
लड़ता–लड़ता आता है।
कमाऊ को घर की चिंता बनी रहती है कि कहीं पीछे से कुछ अनिष्ट
न हो गया हो और अन–कमाऊ को कलह से ही मतलब होता है।

376 कमावै तो वर, नहीं तो आघड़ो मर
कमाता है तो पति है, नहीं तो दूर जाकर मर
ी को कमाऊ पति ही अच्छा लगता है।

377 कमावै तो वर, नहीं जणै माटीरो ही ढल
कमाता है तो पति है, नहीं तो मिी का ढेला है
कमाऊ पति ही को ी वास्तव में अपना पति मानती है, अणकमाऊ
तो उसकी दृष्टि में मिीके ढेले की तरह नगण्य तुच्छ होता है।

378 कमावै धोती आला खा ज्याय टोपी आला
कमाते हैं धोतीवाले, खा जाते हैं टोपीवाले
हिन्दुस्तानी कमाते हैं और उनका रुपया अ.रेज ले जाते हैं।

379 कयां कांई कुवै में पड़सी?
दूसरो के कहने से क्या कुंवें में पड़ेगा?
जो सदा दूसरों के कहने के अनुसार चलता है उसके लिये
मि.– 1 पाणी पीणो छाणियो, करणो मनरो जाणियो
2 सुननी सबकी, करनी मन की

380 कयां किसो कूवे में पड़ीजै?
कहनेसे क्या कुंवे में पड़ा जाता है?
दूसरे के कहने के अनुसार नहीं चला जा सकता।

381 कयां सूं कूंभार गधै माथै थोड़ा ही चढै?
कहने से कुम्हार गधे पर थोड़ा ही चढ़ता है?
यद्यपि वैसे सदा चढ़ता है
1 जो काम सदा करता आया है उसे कोई आदमी कहने पर न करे
तब
2 दुराग्रही कहना न मानने वाले के लिअे
मि.– व़कारो ढेढ सीटी को देवेनी

382 करणी आपो–आपरी, कुण बेटा कुण बाप?
अपनी–अपनी करनी है, कौन तो बेटा है और कौन बाप है?
1 कोई किसी का बाप या बेटा नही, सब अपनी–अपनी करनी के
अनुसार जन्म लेकर उसका फल भोगते हैं।
2 सब अपनी करनी का फल भोगते हैं, बेटा या बाप कोई भी उसमें
हिस्सा नहीं बंटा सकते।

3 अपनी करनी काम देती है, बेटे की करनी बाप के या बाप की
करनी बेटे के काम नहीं आ सकती।

383 करणी जिसी भरणी
जैसी करनी वैसी भरनी
करनीके अनुसार फल भोगना पड़ता है, जैसा करता है वैसा पाता है।
मि.– 1 बोवे बींज बवूल के आम कहांते होत?
2 जो जस करहिं सो तस फल चाखा।

384 करणो मरणौ बराबर
करना मरने के बराबर
1 काम का करना बड़ा कठिन है।
2 जब कोई काम नहीं करता तब उसके लिअे कहा जाता है।

385 करता उस्ताद है
करले वाला उस्ताद है
1 काम को बराबर करने से ही काम सीखा जाता है।
2 अभ्यास करने वाला काममें कुशल हो जाता है।

386 कर भला तो हो भला
भलाई करने से भलाई होती है।

387 कर लियौ सो काम’अर भज लियौ सो राम
जो काम कर लिया व ईश्वर का भजन कर लिया वह अपना है।
कत्र्तव्य को शीघ्रता से करने की प्रेरणा।

388 करम कारी नहीं लागण दै जद कांई हुवै?
भाग्य पैबन्द नहीं लगने देता तब क्या हो सकता है?
भाग्य साथ न दे तो क्या हो सकता है?
भाग्य भलाई न होने दे तो प्रयत्न व्यर्थ है।
मि.– भाग्यं फलति सर्वत्र न विद्या न पौरुषम्

389 करम छिपै न भभूत रमायां
राख रमाने पर भी साधु हो जाने पर भी कर्म नहीं छिपता
1 साधु हो जाने पर भी भाग्य पीछा नहीं छोड़ता
2 साधु हो जाने पर भी भले–बुरे काम करने की जो प्रकृति पड़
जाती है वह नहीं छिपती।

390 करम फूटोड़ै नै भाग–फूटोड़ो सौ कोसांरी अंवलाई खा’र मिलै
कर्म–फूटे के पास भाग–फूटा सौ कोश का चक्कर खाकर भी पहंुच
जाता है
दोनों बहुत दूर–दूर हों तो भी भाग्यवश आपस में मिल जायेंगे
1 भाग्यहीन के पास भाग्यहीन अपने–आप सहज में ही पहुंच जाता है
2 जैसे को तैसा सहज में ही मिल जाता है!

391 करम–रेख ना मिटै, करो कांई लाखूं चतराई
भाग्य की रेखा नहीं मिटती, चाहे कोई लाखों चतुराई कर ले।
कितनी ही चतुराई हो भाग्य में जो लिखा है सो तो होता ही है।
1 मि.– विधिकर लिखा को मेटन हारा?

392 करम हीण खेती करै, बलध मरै कै काल पड़ै
भाग्यहीन खेती करता है तो या तौ वैल मर जाते हैं या अकाल पड़
जाता है।
भाग्यहीन जिस किसी भी काममें हाथ डालता है उसी में असफलता
मिलती है

393 करसी सो भरसी
करेगा सो भरेगा
जो काम करता है वही फल भोगता है।

394 करंता सो भुगंता, खुणंता सो पड़ंता
जो करता है सो भोगता है, जो दूसरे के लिए खाई खोदता है वह
स्वयं पड़ता है।
ऊपरवाली कहावत देखो

395 करैगा सो पावैगा, बंदा रोटी खावैगा
जो बुरा काम करेगा वही उसका फल भोगेगा, हम तो मौज उड़ावेंगे
1 जो स्वयं बुरा काम नहीं करता उसकी उक्ति
2 जो दूसरों से बुरे काम कराकर उनके बल पर स्वयं मौज करता है
उसके लिअे।

396 करै जिसा भुगतै
जैसा करता है वैसा भोगता है
करनी के अनुसार फल मिलता है।

397 करै तो डर नहीं करै तो कांयका डर?
जो बुरा काम करता है उसी को दण्ड मिलता है।
जो नहीं करता वह दण्ड से क्यों डरे?

398 करै तो डर, नहीं करै तो डर
क्योंकि कभी–कभी नहीं करने पर भी धोखे से दण्ड मिल जाता है
अथवा न करने पर भी दुनियां बुराई करने लगती है

399 करै सौ भरै
करै सो भोगै
देखो ऊपर कहावत न.ं 393

400 करोड़ दिवाल्यां राज करो
करोड़ दिवालियों तक राज्य करें
बहुत दिन जियो और सुखी रहा आशीर्वाद

401 करो पाप, खाओ धाप
पाप करो और छककर खाओ पापी प्राय: सुखी रहता है और धर्मात्मा
को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं।

402 करो बेटा फाटका, वेचो घररा वाटका
हे बेटे, फाटका करो और फल–स्वरूप घर के थाली–लोटे बेच डालो
फाटके की निंदा।

403 करो सेवा, पावो मेवा
सेवा–कार्य की प्रशंसा
सेवा धम्मों‍र् गहन विषयो योगिना मप्यगम्य:

404 करो स काम, भज्यो स राम
किया वही काम और भजा वही राम–भजन
काम को और राम–भजन को तुरन्त कर डालना चाहिअे

405 करो स काम वींध्यो स मोती
किया सो काम, वेधा सो मोती
काम कर डाला सो हो गया, नहीं किस सो रह गया काम को तुरन्त
कर डालना चाहिअे।

406 कळकत्तै रो धारो, बाप सूं बेटो न्यारो
कलकत्ते की यही ढंग हैं कि बेटा बापसे भी जुदा रहता है।

407 कळजुग नहीं कर जुग है
यह कलियुग नहीं, कर युग है
कर–युग हाथों का युग इस लिअे है कि इस हाथ से देगा वैसा ही
उस हाथ से लेना पड़ेगा– जैसा करता है वैसा फल तुरंत मिल जाता
है,
पूरी कहावत इस तरह है–
कलियुग नहीं करजुग अहै, इस हाथ दे उस हाथ ले।
क्या खूब सौदा नकद है, दिन को दे और रात को ले।

408 कळ सूं कळ दबै
कल से कल दबती है
किसी आदमी से कोई काम कराना हो तो उस पर जिनका दबाव पड़ता
हो उनसे दबाव डलवाना चाहिअे तभी काम होता है।

409 कळह सूं कळसा रो पाणी जाय परो
कलह से कलसी का पानी चला जाता है
कलह से घड़े का जल तक सूख जाता है अत: वह निंदनीय है।

410 कळंक रो टीको लागणो ही है
कलंक का टीका लगना ही है
अब तो लाचारी से यह करना ही है और फलस्वरूप कलंक भी लगेगा
ही।
1 जब लाचारी से कोई बुरा काम करना पड़े ।
2 अब चाहे अच्छा काम करें या बुरा कलंक तो लगेगा ही।

411 कवि़त सोव़ै भाट नै, खेती, सौव़ै जाट नै
कवित्त भाट को शोभा देते हैं, खेती जाट को शोभा देती है
जो जिसका काम हो वह उसी को शोभा देता हैं
मि.–1 विणज किया था जाट ने सौका रहग्या तीस
2 जाको काम वाही को छाजै
और करै तो डंडा वाजै

412 कसाई नै गाय व़ेचै
कसाई को गाय बेचता है
दुष्ट के हाथ में सीधे व्यक्ति को सौंप देना

413 कसी कव़ाड़ा व़च रे बाबा!
धम्मोळी धसकाय दे
हे बाबा! कसी, कवाड़ा, बेच कर भी मेरे लिए ‘धम्मोळी’ प्रबंध कर
ही दे।
टिप्पणी– तीजों के त्यौहार का राजस्थान में बड़ा महत्व है। तीज को
यिां ीव्रत रखती है और चन्द्र दर्शन के बाद फल, सत्तू आदि खाती
है। दूज की रात को अनिवार्य रूप से गृहस्थ बाई–बेटियों के लिअे
मिठाई मंगवाकर उन्हें देते हैं। यहां बेटी बाप से जिद करके कह रही
है कि पिताजी! चाहे आपको औजार बेचना पड़े तब भी मेरे लिअे
मिठाई तो मंगानी ही पड़ेगी।

414 कहणी सूं करणी दोरी
कहने से करना कठिन है
नीचेवाली कहावत देखो

415 कहणो सोरो करणो दोरो
कहना आसान, करना कठिन
कोई बात कह देना आसान है पर उसके अनुसार काम कर दिखाना
बड़ा कठिन होता है।

416 कह’र धूड़ में नाखणो है
कहकर धूल में डालना है
1 जिस व्यक्ति पर कहनेका कुछ असर नहीं होता उसके लिअे।
2 कहना फिजूल है, क्योंकि अमल तो होगा नहीं।

417 कह व़ात, कटै रात
नींद न आने पर कोई कहानी या कोई बात सुनने–सुनाने से ही रात
कटती है अन्यथा रात बड़ी मालूम होती है
लोक कथाओं में पक्षियों के वार्तालाप का अनुप्रास

418 कह्यो नहीं मानै, जकेरो काळो मूंढो लीलो पग
जो कहा नहीं मानता, उसका काला मुंह और नीले पैर।
जो कहा नहीं मानता, उसके प्रति घृणा–प्रकाश।
नोट–भयंकर अपराध करने पर पहले, ऐसी प्रथा होती थी, कि अपराधी
का काला मुंह और नीले पैर करके गधे पर चढ़ाकर नगर में घुमाते
थे।

419



कंगालरो काळजो पोलो पाठान्तर–काचो
कंगाल का कालेजा पोला कच्चा
गरीब को हिम्मत नहीं होती ।


420 कँव़ारी कन्या ने व़र घणा पाठान्तर–टाबर
कुंवारी कन्या को वर या, बालक बहुत मिल जायेंगे

421 काकड़ी रै चोर ने मुक्की री मार
ककड़ी के चोर को मुक्के की मार
साधारण अपराधी को साधारण ही दंड दिया जाना चाहिअे।

422 का केई नै कर लेणो का केई रो हो रैवणो
या तो किसी को अपना बना लेना चाहिअे या किसी का बन जाना
चाहिअे नहीं तो इस संसार में गति नहीं।

423 काकै रा जयोड़ा मिलै जद ही काम देव़ै
चाचा के जाये हुये जब मिलते हैं तभी काम देते हैं
कुटुंबी सदा काम आते हैं।

424 काक री धी’र खीचड़ी पर घी
चाचा की बेटी क्या है खिचड़ी पर घी
मि.–मामा घी नहीं देगा तो कोण देगा
मुसलमानों के लिये हास्य में जिनमें चचा की बेटी से विवाह करने की
प्रथा है।

425 काकै री पियोड़ी भतीजै ने ऊगै
चाचा की पी हुई भंग भतीजे को उगती है।
भंग पीने वालों पर हास्योक्ति

426 काको करै भतीज ने गांड फाटतो गोठ
गांड़ फटने पर चाचा भतीजे की गोठ करता है।
आफत आने पर बड़ा भी छोटे की खुशामद करता है।

427 कागद री हांडी चूल्है को चढैनी
कागज की हंडिया चूल्हे पर नहीं चढ़ती।
धोखे का काम सफल नहीं होता।

428 कागद होय तो वांचलूं करम न वाच्यो जाय
कागद हो तो पढ़ लूं पर भाग्य पढ़ा नहीं जा सकता।
भाग्य का पता नहीं चलता।
मि.–श्यिचरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानति कुतो मनुष्य:।

429 काग पड़ै, कुत्ता भुसै
कौवे गिरते है और कुत्ते भौंकते हैं
सूने घर या गांव के लिअे।

430 काग मोती दै नहीं, नै चिड़ी रोती रै नहीं
कौवा माती देता नहीं और चिडि़या रोती रहती नहीं।
दोनों ओर हठ।

431 कागलां री दुरासीस सूं ऊंट थोड़ा ही मरै
कौवों की दुराशीष से कहीं ऊंट मरते हैं?
मि.–ढेढांरी दुरासीस सुं गाय को मरै नी
किसी के बुरा चिन्तन करने से बुरा नहीं होता।

432 कागलां रै की हुवै तो अुडतां दीखै ही नी
कौवों के कष्ट हो तो अुड़ते समय न दिखायी दे?
जब कोई यह कहना चाहता है कि अमुक के पास कुछ नहीं, कुछ हो
तो मौका पड़ने पर दिखायी न दे तब कही जाती है।

433 कागलो तीर सूं डरै ज्यूं डरै
जैसे कौवा तीर से डरता है वैसे डरता है।
बहुत डरता है।

434 कागलो नाक लेग्यो!
कौवा नाक ले गया।
निर्लज्ज व्यक्ति के लिअे जो किये पर लज्जित नहीं होता।

435 कागलो हंसरी चाल चालै
कौवा हंस की चाल चलता है।
अयोग्य व्यक्ति की बराबरी करे तब कही जाती है।

436 कागलो हंस री चाल सीखण नै गयो, आपरी भूलि आयो
कौवा हंस की चाल चलने गया पर अपनी ही भूल आया।

437 काची कली कनेर की तोड़त ही कुमळाय
कनेर की कच्ची कली जो तोड़ते ही कुम्हला जाती है।
सुकुमार अथवा दुर्बल व्यक्ति के लिअे।

438 काचै घड़ै ही कारी लागै
कच्चे घड़े पर ही जोड़ लगता है।
सुधार आरम्भ में या छोटी अवस्था में ही हो सकता है।

439 काजी जी दूबळा क्यों? सहर रै सोच में
काजीजी, दुबले क्याें? सहर के सोच में?
जो व्यर्थ ही चिन्ता करता रहे उसके लिअे।

440 काजीजी रीकुत्ती कैनैठा कठै जांवती व्यासी पठान्तर–कांजौरी
काजीजी की कुत्ती न जाने कहां जाकर बच्चे देगी।

441 काजीजी री कुत्ती मरी जद सगळा वैसण गया, काजीजी मरा जद कोई
को गयोनी
काजीकी कुत्तिया मरी तब सारा गांव बैठने गया पर काजीजी मरे तब
कोई भी नहीं गया।
जब तक किसी के हाथ में अधिकार होता है तब तक सब कोई
उसका तो क्या उसके अनुचर तक का आदर व सेवा करते हैं परन्तु
अधिकार हाथ से निकल जाने पर कोई उसकी सुधि नहीं लेता।

442 काठरी हांड़ी अेक ही वार चढै
काठ की हंडि़या अेक ही बार चढ़ती हैं
कपट का काम अेक ही बार हो सकता है।
मि.–जैसे हांडी काठ की चढै न दूजी बार।

443 काठै में भाठो’र गीलै में गोबर
कठोर पदार्थ में पत्थर और गीले पदार्थ में गोबर छोड़ रखा है
बिना व्रत नियम वाले सर्वभक्षी पर व्यंग से।

444 काणी पीठ में पड़ै
कानी पीठ में पड़ता है
रास्ते से बहुत दूर कोने में पड़ता है किसी स्थान के लिअे।

445 काणी बाई! छाछ घाल
कानी बाई! छाछ डाल
नीचे वाली कहावत देखो

446 काणी रांड! छाछ घाल
मीठो घणो बाल्यो, बेटा! दूध घालसूं
कानी रांड़! छाछ घाल
मीठा बहुत बोला, बेटा! छाछ क्या दूध डालूंगी
जिससे स्वार्थ सधता हो उससे मीठा बोलना चाहिअे।

447 काणी रै व्यांव़ नै सौ जोखम
कानी के विवाह को सौ जोखिम न जाने कब भेद खुल जाय
जब भेद खुलने का डर हो।

448 काणी रो काजळ ही को सुव़ाव़ैनी
कानी का काजल भी नहीं सुहाता
किसी के साधारण पहनाव बनाव को भी जब कोई टोके तब कही
जाती है

449 काती–कपासी सान पूरीकर दी पाठान्तर–पूणी
काता हुआ सब समाप्त कर दिया
किये–कराये काम को खराब कर दिया।

450 काती कुत्ती, माघ बिलाई,
फागण, मिनख’र व्यांव़ लुगाअी
कातिक में कुतिया, माह में बिल्ली, फागुन में पुरुष और विवाह में ी
निर्लज्ज हो जाते है।

451 काती–पींजी सान कपास कर दी
काता हुआ और पींजा हुआ सब वापिस कपास कर दिया।
बना–बनाया सारा काम बिगाड़ दिया।

452 कात्या त्यांरा सूत, जाया ज्यांरा पूत
सूत उनका जिनाने काता और बेटे उनके जिनोने जन्म दिया

453 कात्यो पींज्यो कपास हुग्यो
काता हुआ और धुना हुआ सारा फिर कपास हो गया
ऊपर कहावत नं. 49–451 देखो

454 कान अर आंख में च्यार आंगळ रो फरक है
कान और आंख में चार आंगुल का अंतर है।
सुनी हुअी और देखी हुअी बात में बहुत अंतर होता है।
सुनी बात का विास नहीं करना चाहिये।

455 कान खूस’र हाथ में आयग्या
कान टूट कर हाथ में आ गये

456 कान में ठेठी घाल राखी है
कानों में ठेठी डाल रखी है ठेठी3ध्4कर्णमल
बात सुनता ही नहीं।

457 कानूड़ो कुळ में आयो, रात बड़ी दिन छोटा लायो
कान्हने कुल में जन्म लिया, वह बड़ी रातें तथा छोटे दिन लाया
कृष्ण जन्माष्टमी के पीछे रातें बढ़ते लगती हैं और दिन घटने लगता
है।

458 काम करै अूधोदास, जीम ज्याय माधोदास
काम करता है अूधोदास और खा जाता है माधोदास,
काम कोई करता है और लाभ कोई उटाता है।
मि.–कमाव़ै धोतीआळा, खा ज्याय टोपीआळा।

459 काम करा जकै कामण करा
जिसने काम किया उसने जादू कर दिया।
काम करनेवाला सबको वश में कर लेता है।

460 काम प्यारो है, चाम प्यारो कोनी
काम प्यारा है, चाम प्यारा नहीं।
1 काम करनेवाला आदमी अच्छा लगता है, खूबसूरत पर कामचोर
किसी को अच्छा नहीं लगता।
2 शरीर को कोई प्यार नहीं करता, सब काम को प्यार करते है।

461 काम भोळायो जाणै माथै में सोटरी दी है
काम करने को सौंपा मानो माथे में सोटकी दी
जो व्यक्ति काम करने में अनिच्छा प्रकट करे।

462 कामर नांव़ ताव़ चढै
काम के नाम पर बुखार चढ़ आता है
जो काम न करे उसके लिअे।

463 कामळ भीजै ज्यूं–ज्यूं भारी हुव़ै
कम्बल ज्यों–ज्यों भीगता है त्यों–त्यों भारी होती है
1 संपत्ति बढ़ती है त्यों–त्यों अभिमान बढ़ता है
मि.– ज्यों–ज्यों भीजै कामरी त्यों–त्यों भारी होया

464 काम सरा दुख वीसरा वैरी हुयग्या व़ैद
जब काम बन गया और दुख भूल गया तो वैद्य बैरी हो गया।
गरज निकल जाने पर उपकारी को न पूछने वाले के लिअे।

465 काम हुवण सूं पहली ही सिकोतरी बोल जाय
काम होनेसे पहले ही सिकोतरी बोल जाती है।
काम सफल होने से पहले ही सफलतासूचक सूचना अथवा चिन्ह प्रकट
होने लगते है।

466 कायथ कागा कूकड़ा तीनूं जात सुजात
कायस्थ, कौवा और मुर्गा–ये तीनों अच्छी जातें है।
क्योंकि ये अपनी जातिवालों से प्रेम करते हैं।
मि.– 1 बामण, कुत्ता, वाणिया तीनूं जात कुजात।
2 बामण, नाई, कूतरा तीनूं जात कुजात।
3 बामण, कुत्ता, वाणिया जात देख गुर्राय।
कायथ, कागा, कूकड़ा जात देख हरखाय।।

467 कारनै कार सिखावै
काम काम को सिखाता है।
काम करने से ही काम करना आता है।

468 काल कण देखी है?
‘कल’ किसने देखा है?
पता नहीं कल क्या होगा; कल आवेगा भी या नहीं; भविष्य की कौन
जानता है?
मि.–1 कुण जाणे कलकी, खबर नहिं है जग में पलकी।
2 निजनतम पे मदजपतमसल पद जीम कंताण्

469 काल में इधकमासो
अकाल में अधिक मास।
विपत्ति में विपत्ति आने पर।

470 काल वागड़ सूं ऊपजै बुरो बामण सूं होय
अकाल मरुभूमि से होता है, बुराई ब्राण से होती है।
ब्राण सब बुराइयों की जड़ है।

471 काल विगोवै कोनी, बाल बिगोवै
काल बदनाम नहीं करता, संतान बदनाम करती है।
अकाल अर्थात् अभाव में बदनामी नहीं होती। परन्तु संतान छोटे
बालकों को देर में भोजन न मिलने पर अथवा रातको रोटी नहीं बचने
के कारण प्रात: कलेवा न मिलने पर वे बदनामी कराने लगते हैं।

472 काला आखर भैंस बराबर
काले अक्षर भैंस के समान है
मूर्ख के लिअे जो पढ़ नहीं सकता।
मि.–करिया अक्खर भैंस बराबर।

473 काला काला किसनजी रा साला
काले–काले कृष्णजी के साले।
जब काले आदमी की बुराई की जाती है तो उसका कथन।

474 कालियोे गेारियो कनै बैठै, रंग नहीं तो अकल तो आवै ही
पाठान्तर–रंग नहीं बदलै, अक्कल तो बदलै
काला गोरे के पास बैठता है तो, रंग नहीं तो, अक्ल तो आती ही है
रंग नहीं बदलता है तो भी अक्ल तो बदलती ही है।
1 अच्छी संगति से अक्ल आती है।
2 संगति का असर होता ही है।
मि.–काक होय पिक बकहु मराला।

475 काली ऊन कुमाणसां चढै न दूजो रंग
काली अून और दुष्ट मनुष्याें पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता।
दुष्ट की दुष्ट प्रकृति नहीं बदल सकती।
मि.–सूरदास काली कमरी पर चढ़ै न दूजो रंग।

476 काली कयां ही ढीकै अर गोरी कयां ही ढीकै
काली कहने से भी रंभाती है और गोरी कहने से भी रंभाती है।
दोनों ओर हां में हां मिलाने वाले पर।
मि.–गंगा न्हाये गंगादास, जमना न्हाये जमनादास

477 काळी फूल न पाया पाणी, धान मरा अधव़ीज जवानी
पानी नहीं पिलाया जिससे धान भर जवानी में मर गये।

478 काळो मूंढ़ो, लीला पग
काला मुंह और नीले पग।
बड़ों की आज्ञा न मानने वाले का तथा बुरे काम करने वाले का मुंह
काला व पैर नीले कर देने चाहिए अर्थात् उसको कठोर सजा
तिरस्कार देनी चाहिए।

479 का वातनै, का स्वादनै
या तो बात को या स्वाद को।
अपनी बात रखने के लिए तथा सुस्वादु व्यंजन खाने के लिये उचित
मूल्य देना पड़ता है।

480 कांई गोडियो गावै अर कांई पूंगी व़ाजै
क्या तो संपेरा गाता है और पूंगी बजती है?
देखे क्या फल निकलता है। कार्य का फल भविष्य के गर्भ में रहता
है।

481 कांई माखी छींक दिया
क्या मक्खी ने छींक दिया?
क्या हो गया? कोई आदमी काम न करे या करता करता इनकार कर
दे।

482 कांकरा पाठान्तर–काकडि़या कंवला हुवै तो स्यालिया कद छोडै
कंकर कोमल हो तो गीदड़ कब छोड़ें कभी के खा जायं
लाभ सहज ही हो तो कौन छोड़े?

483 कांकरां नै हाथ घालतां रुपिया हाथ आवै
कंकरों के लिये हाथ डालते हैं तो रुपये हाथ में आते है।
भाग्यशाली के लिअे जिसे बिना परिश्रम स्वत: धन मिलता है।

484 कांकरै री देसी जको पंसेरी री खासी
जो कंकर की मारेगा वह पंसेरी की मार खावेगा।
जो दूसरे का अपकार करता है उसका बड़ा अपकार अवश्य होता है।

485 कांजर की कुत्ती कठै जावती व्यावै
कंजर की कुत्तिया न जाने कहां जाकर प्रसव करे!

486 कांटै सूं कांटो नीकलै
कांटे से कांटा निकलता है।
जैसे का इलाज तैसे से ही हो सकता है।
मि.– 1 कंटकेनैव कंटकम्।
2 विषस्य विषमौषधम्।।

487 कांटो कांटै नै काढ
कांटा कांटे को निकालता है।
ऊपरवाली कहावत देखिये

488 कांदैरा छूंतरा उतारणा चोखा कोनी
प्याज छिलके उतारना अच्छा नहीं।
बात को बढ़ाने से लाभ नहीं होता निबटाने से होता है।

489 कांदैरा छूंतरा उतारै जिता ही उतर आवै
प्याज के छिलके जितने उतारें उतने ही उतर जाते है।
ऊपरवाली कहावत देखिये

490 कियां करै जाणै नातै आयोड़ी ढेढणी करै
कैसे करता है जैसे नाते आयी हुअी ढेढणी करती है

491 किंया देखै जाणै कागो नीबोळी कानी देखै
कैसे देखता है जैसे कौवा निंबोली की ओर देखता है।
ललचाई हुई नजर से देखने वाले पर व्यंग।

492 कियां देखै जाणै गैली बजार कानी देखै
कैसे देखता है जैसे बावली बाजार की ओर देखती है
अज्ञानवश आर्य चकित होने वाले और व्यंग।

493 कियां नाचै जाणै हंसराज री घोड़ी नाचै
कैसे नाचता है जैसे हंसराज की घोड़ी नाचती है
अति चंचल पर व्यंग।

494 कियां फिरे जाण वीगडोडै़ व्यांव़ में नाई फिर
कैसे फिरता है जैसे बिगड़े हुअे विवाह में नाई फिरता है
असफल प्रयत्न करने वाले पर व्यंग।

495 कियो स काम, भज्यो स राम
अूपर कहावत न.ं 404 देखिये

496 किसी देवर माथै बेटी जिणी है?
कौनसी देवर के भरोसे बेटी जनी है?
दूसरे के भरोसे काम नहीं अुठाया है।

497 किरत्यां अेक बूकड़ो ओगण सह ग​िळयाह

498 किसा भाग लुयीजै है
कौन भाग पुंछते है?
कौन कोई नाराज होकर भाग्य की रेखाओं को थोड़े ही बदल सकता
है।

499 किसी थारी खीर खायी है?
कौन तेरी खीर खायी है?
किसी का लिहाज तभी किया जा सकता है जब कालान्तर में उसने भी
अपना उपकार किया हो।

500 किसी चोटी काटी है?
कौन चोटी काटी है चेला बनाया है
अधीन थोड़े ही हैं?
विसायरो चोटी कटयोड़ो है।

501 किसी सांभर सूनी हुवै है
कौनसा सांभर सूना हुआ जाता है।
कौनसी कमी हुयी जाती है।

502 किसी सिंधड़ी सूनी हुवै है
अूपरवाली कहावत देखिये

503 किसो तमासो है?
क्या तमाशा है?
खिलवाड़ को छोड़कर कार्य की गम्भीरता पर ध्यान देना चाहिअे।

504 किसो नानेरो है
कौनसा ननिहाल है।
किसी कार्य के सहज में बन जाने की मिथ्या आशा पर व्यंग।

505 कीड़ी कैवै क मां गुड़री भेली लावं्
मा कैवै कै बेटा, थारी कमर ही कैवै है नी।
अेक चींटी अपनी मां से कहती है कि मां गुड़ की भेली अुठा लाअूं?
मां कहती है कि–बेटी, तेरी कमर ही कहती है न कि तू भेली ले
आवेगी।
जब कोअी व्यक्ति अपनी शक्ति के बाहर काम करने को तय्यार हो।

506 कीड़ी ने कण, हाथी ने मण
चींटी को कन, हाथी को मन।
निर्वाह के योग्य भोजन परमात्मा सबको देता है।

507 कीड़ी ने मूतरो रेलो ही भारी
चींटी को मूत की बाढ़ ही भारी होती है।
कमजोर व्यक्ति को साधारण–साधारण संकट ही ले बैठता हैं

508 कीड़ी संचै तीतर खाय पापीरो धन परलै जाय
चींटी अनाज संचय करती है और तीतर अुसे खाता है। ​िअस प्रकार
पापी का धन नष्ट होता है अुसके काम नहीं आता।
पापी की कमाअी बुरे काममें लगती है।
पापका धन कमानेवाले के लाभमें नहीं खर्च होता।

509 कीरत हंदा कोटड़ा पाड़ा नहीं पड़न्त
कीर्ति के किले गिराने से नहीं गिरते।
यश का नाश नहीं होता।

510 कुगांव में अेरंडियो रूंख
बंजड़ गांव में अेरंड भी पेड़ कहा जाता है।
जहां विद्वान नहीं होते वहां साधारण–पढा लिखा भी बड़ा भारी विद्वान
माना जाता है।

511 कुजात मनायां माथै चढै
नीच जाति का आदमी मनाने से सिर चढ़ता है।
नीच की खुशामद करने से वह और अकड़ता है।
मि.–सुजात मनायां पगां पड़ै

512 कुठोड़ खायी रे सुसरो वैद
बुरी जगह काटा अुसपर ससुर ही वैद्य अुससे कैसे ​िअलाज करवाया
जाय
अज्ञान वो धोखे से हानि उठाने तथा निरुपाय हो जाने पर।

513 कुण पीला चावल भेज्या हा
किसने पीछे चावल भेजे थे!
किसने बुलाया था। किसने कहा था कि आकर यह काम करो!

514 कुतड़ो कैवै क गाड़ी म्हारे ही ताण चालै
गाड़ी के नीचे चलता हुआ कुत्ता कहता है कि गाड़ी मेरे ही कारण
चल रही है।
अयोग्य व्यक्ति के इस कथन पर कि सब मेरा किया ही होता है, एक
व्यंग।

515 कुत्ता ही खीर को खावैलानी
कुत्ते भी खीर नहीं खायेंगे।
कोअी भी नहीं पूछेगा।
किसी से अड़नेपर उसके द्वारा भयंकर हानि पहुंचाने की धमकी।

516 कुत्ता, थारी काण कै थारे घररां री काण
कुत्ते, तेरा लिहाज या तेरे घरवालों मालिकों का लिहाज
दुष्ट का कोई लिहाज नहीं रखता बल्कि उसके परिवार वालों की
सज्जनता का लिहाज करके ही उसे क्षमा प्रदान की जाती है।

517 कुत्ता थारी काण कै थारे मालक धणी री काण
अूपरवाली कहावत देखिये

518 कुत्तां रे संप हुवै तो गंगाजी नहायि आवै
कुत्तों के मेल हो तो गंगाजी नहा आवें
जिन लोगों में परस्पर मतैक्य नहीं होता अुनपर

519 कुत्ती जाया कूकरिया अेके डोरे अूतरिया
कुत्तिया ने पिल्लों को जन्म दिये जो सब अेक डोरे पर अुतरे
किसी समाज के सभी व्यक्ति दुगु‍र्णी हों तब।

520 कुत्ते ने मूंढे लगावणो चोखो कोनी
कूत्ते को मुंह लगाना अच्छा नहीं
1 कुत्ते को ज्यादा प्यार नहीं करना चाहिअे
2 नीच आदमी को मुंह नहीं लगाना चाहिअे।

521 कुत्ते री कपाळी है
कुत्ते की खोपड़ी है
जो व्यक्ति बकता ही जाय।
मि.–कुत्ते का मगज खाया है

522 कुत्ते री पूंछ दस व़रस जमी–में राखी,
निकाली तो फेर आंटी–र–आंटी
कुत्ते की पूंछ दस बरस जमीन में गाड़कर रखी, पर जब निकाली तो
फिर टेढ़ी–की–टेढ़ी
1 जिस आदमी की बुरी आदत किसी प्रकार न छूटे
2 जो आदमी अपनी औंट या हट किसी प्रकार न छोड़े
मि.–बाणीडे री बाण न जाय कुत्तो मुते टांग उठाय

523 कुत्ते री पूंछ सदा आंटी–री–आंटी
कुत्तेकी दुम सदा टेढ़ी–की–टेढ़ी
अूपरवाली कहावत देखिये

524 कुत्ते री मोत मरसी
कुत्ते की मौत मरेगा
बुरी तरह या बेमौत मरेगा
बहुत दु:ख पावेगा।

525 कुत्ते रो सिर खल्ले जोगो
कुत्ते का सिर जूते के योग्य है
1 मूर्ख या दुष्ट ताड़ना के ही योग्य है
2 जैसे को तैसा

526 कुत्तो नारेळ रो कांअी करै
कुत्ता नारियल का क्या करे

527 कुरकुरा पीसै ररा पोवै जिणरा मांटी रात्यूं रोवै
जो बहुत ज्यादा मोटा पीसता है और अुसकी भुरभुरी रोटी बनाती है
अुसका पति रात में चुपचाप रोता है।
फूहड़ ी पर।

528 कुसळां आया धाड़वी धाड़े लारे धूड़
डाकू, कुशल से लौट आये यही बहुत है लूट पीछे धूल फेंको लूट
न मिली तो कोअी हरज नहीं
खतरे में से निकल आये यही बहुत है, लाभ हाथ न आया तो न सही

529 कूरा करसा खाय गेहूं जीमै व़ाणिया
किसान मोटा अनाज खाते हैं, बनिये गेहूं खाते हैं

530 कूवे भांग पड़गी
कुंवे में भांग पड़ गयी जिससे पानी पीकर सब पागल हो गये
सबकी बुद्धि मारी गयी
सब भ्रम में पड़ गये।

531 कूवे में हुवै तो खेळी में आवै
कुंवे में हो तो खेली में आवे नहीं तो कैसे आवे
1 भीतर कुछ तत्व हो तो बाहर आवे
2 पास में कुछ हो तो दे

532 कूवे री छयां कूवे में रैव़ै
कुंवे की छाया कुंवे में रहती है
गंभीर आदमी अपने मन की बात मनमें ही रखता है।

533 कूंभार कूंभारी ने को नावड़ै नी जरां गधीरा कान मरोड़ै
कुंभार कूंभारी को नहीं पहुेंच पाता तब गधीके कान मसलता है
बलवान से वश न चले तब निर्बल पर गुस्सा अुतारना

534 कूंभार फूटी में रांधै
कुंभार फूटी हंडिया में रांधता है
सम्प व्यक्ति के घर में भी बे–परवाही अथवा अविचार से अशोभनीय
कार्य हो जाते है।

535 कूंभार रे घरे फूटी हांडी
कुंभार के घरमें फूटी हंडिया
अूपरवाली कहावत देखो

536 केअीरी जीभ चालै केअीरा हाथ चालै
किसी की जीभ चलती है किसी के हाथ चलते हैं
1 कोअी गाली देता है कोअी पीट डालता है
2 जब कोई गाली दे तब सामने का व्यक्ति कहता है

3 जो गाली देता है वह मार खाता है

537 केसां ने काटाँ किया मुड़दा होळा हुवै
बाल काटने से कौनसे मुर्दे हलके हो जाते हैं
अधिकांश बुराई को कायम रखकर केवल उसके नगण्य भाग हटाने का
उपाय सोचने पर व्यंग।

538 केसरिया केरै अूपर व़णिया
किस पर केशरिया बने भद्र हुअे
किस सम्बन्धी की मृत्यु पर सिर और मूंछ के बाल कटवा डाले?

539 केसोराय अंूडो घणो तो भांडासर अूंचो घणो
केशोराय नामक कुंआ गहरा बहुत तो भांडासर नाम का जैनमंदिर
अूंचा बहुत
दो बातों के मिलानपर

540 कै घोड़ा घोड़ां में कै घोड़ा चोरां में
या तो घेाड़े घोड़ों में या चोरों में
या तो लाभ हो जायगा या सब कुछ चला जायगा
हानि–लाभ की पर्वाह न करके किसी काम में जुट जाना।

541 कैररो कांटो व़ढो साढ़ी सोळै हाथ
करील का कांटा बढ़ा साढ़े सोलह हाथ
बहुत गप करने वाले पर।

542 कैरा जायोड़ा, कैने दुख दे
जाये हुअे किसी के, दु:ख देते हैं किसी को
विदेशी अथवा अवांछित व्