569 खर घघ्घू मूरख पसू सदा सुखी प्रिथिराज
पृथ्वीराज कहते हैं कि गधा, उल्लू, पशु और मुर्ख सदा सुखी रहते हैं।
मूर्ख सदा सुखी रहता है क्योंकि उसे बड़े प्रपंचों में नहीं पड़ना पड़ता
और न लोग घेरे रहते हैं–न कोई चिन्ता होती है।
इसका पूरा दोहा यों है:–
चातक चकवा चतुर नर, इतरा रहत उदास।
खर घघ्घू मूरख पशु, सदा सुखी प्रिथिराज।।

570 खरच रा भाग मोटा
खर्च के भाग्य बड़े।
जो खूब खर्च करता है उसका भाग्य तेज रहता है।
कंजूसी की निन्दा।

571 खरची खूटी यारी टूटी
खर्च करने का पैसा न रहा तो दोस्ती टूट गई।
जब तक पास में पैसा होता है तभी तक लोग दोस्ती रखते हैं।
मि.– सांई या संसार में मतलब को व्यवहार
जब लग पैसा गांठ में तब लग ताको यार
तब लग ताको यार यार संग ही संग डोले
पैसा रहा न पास यार मुख से नहीं बोले
कह गिरधर कविराय जगत को याही लेखा
कर बेगरजी प्रीत यार हम बिरला देखा।

572 खरबूजे ने देख’र खरबूजो रंग बदलै
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।
दूसरे को देखकर लोग उत्साहित होते हैं।

573 खरी मजूरी चोखा दाम
मजदूरी की प्रशंसा
मि.–ॅवता इतपदहे पजे वूद तमूंतकण्

574 खांड खायां गांड गळ
खांड खाने से गांड़ गलती है।
अधिक मीठा नहीं खाना चाहिये क्योंकि उससे शरीर कमजोर होता है।

575 खांड गळै जद सगळा आ ज्याचै गांड गळै जद कोई को आवै नी
खांड़ गलती है तब सब आ जाते हैं, गांड गलती है तब कोई नहीं
आता सम्पत्ति में सब साथ देते हैं विपत्ति में कोई पास नहीं रहता।
मि.– सेवे पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ जांय।

576 खांड में खायो जाय ना कोई गुळ में खायो जाय
न खांड़ में खाया जाता है न गुड़ में खाया जाता है।

577 खां सा’ब लकड़ी तोड़ो तो कै यह काफर का काम
खां सा’ब खीचड़ी खावो तो कै बिसमिल्लाह
खां साहब, लकड़ी फ़ाडिये तो कहते हैं कि यह काफिर का काम है
हमारा नहीं। खां साहब, खिचड़ी खाइये तो कहते हैं– बिसमिल्लाह,
बस लाओ।
ऐसे व्यक्ति के लिए जो काम न करे और लाभ उठाने को तय्यार हो
जाय।

578 खाख में कटारी चोर ने घोंचां सूं मारै
बगल में कटारी, चोर को तिनकों से मारता है
पास होते हुए भी वस्तु का अुपयोग न करने पर।
मि.– घरि घोड़ो नै पैदल जाय, घरि धीणो नै लूखो जाय।
घरि पलंग नै धरती सूवइ, तेहनी बइयर जीवतां रोवई।।

579 खा गुड़ तेरो ही है
मौके से बेजा लाभ उठाने वाले पर व्यंगोक्ति।

580 खाट गाय आप रो दूध को दैनी दूजी रो ढोळाय दै
दुष्ट न स्वयं लाभ पहुंचाता और न दूसरे को पहुंचाने देता है।

581 खाड खिणै जकेने कूव़ो त्यार है
खाड़ खोदता है उसको कुंआ तय्यार है।
जो दूसरे की बुराई करता है उसका बुरा होता है।
मि.–खाड़ खनै जो और को ताको कूप तयार।
ज्ीमल ीनतज जीमउेमसअमे जींज ूतवदह वजीमतेण्

582 खांता–पीता हर मिलै तो हम कूं कहियो
खाते–पीते भगवान् मिलें तो हमें कहना।
बिना कष्ट उठाये लाभ की इच्छा करने वाले के लिए।

583 खाध करै उपाय
खाना पीना उपाधि करता है।
खाने को मिलता है तब उपद्रव सूते हैं,
खाने से बल बढ़ता है।

584 खाय हंगाया कदे न धाया
जो खाते ही पाखाने जाता है वह कभी तृप्त नहीं होता
या जो पाखाने की की इच्छा होते हुए ही खाता वह कभी नहीं
अघाता।

585 खायां किसा खाड़ा पड़ै है
खाने से कौन–से खे पड़ते हैं।
खाने–पीने से क्या कमी पड़ती है।

586 खाया सो ही ऊबरा दीया सो ही सथ्थ
जो धन भोगा वही बचत में रहा, जो दिया वही साथ चलता है बाकी
नष्ट हो जाता है।
धन खान पीने और दान के लिए ही होता है।

587 खायोर परड़ोरियो, कैं काळंदर कठां सूं लाऊँ
किसी को छोटा सांप खा गया तो वह कहता है कि अरे मुझे परड़ने
काट खाया तो उत्तर देता है भला काला सांप कहां से लाऊँ?
मिलाओ– अेक आने का दूध लिया उसमें भी मक्खी? साब इतने थोड़े
दूध में मक्खी नहीं तो हाथी कहां से आयगा।

588 खारी बोली मावड़ी मीठी बोली लोक
मां के कटु वचन और लोगों के मीठे वचन
मां के कटुवचन भी हितकर हैं।

589 खाली वासन घणा खड़खड़ावै
खाली भांडे अधिक खड़खड़ाते हैं।
गुणहीन बढ़ बढ कर बातें बनाता है।
मि.– ओछा घट छलके सदा पूरो छलके नाहिं।
म्उचजल अमेेमसे उंाम उनबी दवपेमण्

590 खाली बैठां उतपात सूै
निकम्में बैठे उत्पास सूते है।
निकम्मा नहीं बैठना चाहिए।
मि.– प्कसम इतंपदे ंतम जीम कम टपसश्े ूवता.ीवनेमेण्
प्कसम मिससवूे ंतम जीम कम टपसश्े चसंल मिससवूेए

591 खावण ने खोखा पैरण नु चोखा
खाने को खोखे मिलते हैं पर पहनने को चोखे कपड़े चाहिए।
घर में फाका करते हुए भी छैले बनने वालों के लिए।

592 खावण पीवणने खेमली नाचण ने गजराज पाठान्तर–नगराज
खाने–पीने को तो खेमली और नाचने को गजराज।
मजे कोई उड़ावे परिश्रम कोई करे।

593 खावण पीवण ने दीयाली कूटीजण ने छाज
खाने–पीने को दिवाली और पिटने को छाज।

594 खावतो–पीवतो मरै जकेरो कोई कांई करै
जो खाते–पीते मरे उसका कोई क्या करे।
सावधानी रहने पर भी कोई काम बिगड़े तो उसका क्या उपाय।

595 खावै–पीवै खसम रो गीत गावै बीरै रा
खाती है खसमका, गीत गाती है भाई के।
कृतज्ञता न मानना।

596 खावै जकी थाळी में हिंगै
जिस थाली में खाता है उसी में हंगता है।
उपकार को न मानना। उपकारी के साथ अपकार करना।

597 खावै जकी हांड़ी ने फोड़ै
जिस हांड़ी में खाता है उसी को फोड़ता है।
ऊपरवाली कहावत देखो.

598 खावै जकी हांड़ी में ही छेकला करै
जिस हांडी में खाता है उसी में छेेद करता है।
मि.–जिकी डालपर बैठो बे नै इ काटै।
ऊपरवाली कहावत देखो.

599 खावै जकेरो गावै
जिसका खाता है उसका गाता है
पालन–पोषण करनेवालेका बखान या उपकार करती है।

600 खावै जिती भूख, लेवे जिती नींद
खावै उतनी ही भूख और ले जितनी नींद
भूख और नींद की कोई सीमा नहीं।

601 खावै़ सूर कुटीजै पाडा
खाते है सुअर, पिटते है पाड़े
अपराध कोई करता है फल कोई भोगता है।
बलवान् अपराध करता है निर्बल उसका फल भोगता है
श्रंदनंतल बवउउपजे जीम ​िंनसज – उंल ठमंते जीम इसंउम

602 खावै पीवै जकेने खुदा देवै
जो खाता–पीता है उसे खुदा देता है
संपत्ति का भोग करना चाहिए–भोगने से वह नहीं नाश होती
कंजूसी की निंदा।

603 खिणियो डंूगर निक​िळयो ऊंदर
खोदा पहाड़, निकला चूहा
बहुत परिश्रम का बहुत थोड़ा फल मिलना
मि.– पहाड़ खोदकर चूहा निकालना
ज्व कपअम कममच ंदक इतपदह नच ं चवजेीमपक

604 खिणै जको पड़ै
जो खा खोदता है वही गिरता है
जो करता है वह फल भोगता है।

605 खीचड़ खाया पेट कुटाया तेरे राज में क्या सुख पाया
किसी दुखी ी का पति से कथन।
किसी दुखी सेवक या आश्रित या प्रजा का मालिक से कथन।

606 खीचड़ी पापड़ खावतां ही पुणचो उतरै
खिचड़ी खाने से ही पहुंचा उतर जाता है
निर्बल के लिए व्यंग
सुकुमार के लिए व्यंग।

607 खीरां मेली खीचड़ी टीलो आयो टच्च
खिचड़ी को चूल्हे से उतार कर अंगारों पर रखा कि खाने के लिये
टीला आया और चट आसन लगाकर बैठ गया।
जो काम न करे या काम की समय कहीं चला जाय और लाभ उठाने
को तुरंत तय्यार हो जाय उसके लिए।

608 खीसा तर तो भावे ज्यूं कर
खीसा तर हो तो चाहे जो कर
पास में पैसा होने से सब कुछ हो सकता है
मि.– लिखमी थारी राह, ना जायो ना जिनमसी
कुणसी जगरीबाट, थां राजी माना सधै

609 खुदा जेहड़ा फरेश्ता
जैसा खुदा वैसे फरिश्ते
उपयुक्त वस्तु के मेल।
मि.– 1 नकटा देव सुरड़ा पूजारा
2 आंधा अंूहर थोथो धान, जैसा गुर विसा जजमान
3 या दृशी शीतला देवी या दृशो वाहनो खर:

610 खुदा देगा तो छप्पर फोड़कर देगा
परमात्मा चाहे जैसे सहायता कर सकता है।
दृढ़ निय वाले की परमात्मा अवश्य सहायता करता है

611 खुदा री महर तो लीला लहर
परमात्मा की कृपासे सब हराभरा
परमात्मा की कृपा हो तो सब आनंद हो जाते है।

612 खूंटी में बूंटी कोनी
खूंटी हुई आयु की दवा नहीं
आयु पूरी होने पर कोई दवा नहीं लगती।

613 खूटा बाणियो जूना खत जोवै
खूटा हुआ वनिया पुराने खत–पत्र तमस्सुक देखता है।

614 खूती खसमां सेती
खेती मालिक की खबरदारी से ही ठीक हो सकती है
खेती का काम नौकर–चाकरों के भरोसे नहीं हो सकता
मि.– 1 खेती पानी वीनती, परमेस्वर का जाप
परहाथां ना कीजिये, निडर कीजिये आप
2 संदेसां खेती को नीपजै नी

615 खे देख’र घोड़ा मत बाढ़ो
केवल संन्देह पर नुकसान पहंुचाना ठीक नहीं होता

616 खेल खेलरां रा, घोड़ा असवारां रा
खेल खेलने वालों के हैं, घोड़े असवारोंके हैं
दूसरों के लिये वे व्यर्थ है
साहसी व अनुभवी पुरुषों को ही सफलता सहज में मिलती है।

617 खोटे खत में साख कुण घालै
खोटी तमस्सुक में गवाही कौन करे
खोटी बात में हां में हो नहीं मिलानी चाहिअे।

618 खोटो रुपियो गमै कोनी
खोटा रुपया नहीं खोया जाता

619 खोळे मांय लेने छोड’र पेट मांयले री आस करै
गोदवाले बच्चे को छोड़कर पेट वाले बच्चे की आशा करती है।
निश्चित को छोड़कर अनिश्चित की आशा करना।
मि.– बादल उमड़े देखकर घड़ा फोड़ता है।