655. लक्ष्मी बिन आदर कूण करै?

लक्ष्मी के बिना कौन आदर करे?

धनहीन का आदर कोई नहीं करता।



656. लछमी विनारो लपोड़

लक्ष्मी के बिना लपोड़

धन न होने पर आदमी लपोड़–लबार, मूख–कहलाता है।



657. लड़नरी बखत करै बिछड़न वेला मत करै

लड़ने का वखत करना, विछुड़ने का मत करना

साथ–साथ रहकर लड़ते रहना मर कर बिछड़ने से अच्छा होता है।



658. लड़ाईमें किसा लाडू बंटै है?

लड़ाईमें कौन–से लड्डू बंटते हैं?

लड़ाई करने से या लड़ाईमें जानेसे, कोई लाभ नहीं होता।



659. लड़ाईमें लाडू थोड़ा ही बंटै है (पाठान्तर–उछळै है)

लड़ाईमें लड्डू थोड़े ही बंटते हैं।

(ऊपरवाली कहावत देखो)

मि–ज्ञममच ंसवव​ि तिवउ ुनंततमसेए इम दमपजीमत ं ूपदजदममे दवत ं चंतजल



660. लड़ै सिपाही जस जमादारनै

लड़ै सिपाही, नांव सिरदाररो

लड़ते हैं सिपाही, नाम होता है सरदार का।

युद्ध में सिपाही लड़कर विजय प्राप्त करते हैं पर नाम होता है सेनापतिका कि अमुक सेनापति ने विजय प्राप्त की।

जब काम कोई करे और प्रशंसा की जाय किसी और की।

मि–ज्ीम इसववक व​ि जीम ेवसकपमत उंामे जीम हसवतल व​ि जीम हमदमतंस



661. लहणो बापरां ही खोटो

लहना (ऋण) बापका भी बुरा

ऋण सदा बुरा है, चाहे निकट संबंधियों का ही क्यों न हो।



662. लंकामें किसा दाळद्री को हुव़ै नी?

लंकामें कौन–सा दरिद्री नहीं होते? अर्थात् होते हैं।

लंका सोनेकी बनी हुई है। वहां कोई दरिद्री नहीं होना चाहिअे।

जब अच्छे स्थान या कुलमें या अच्छे लोगों में या अच्छे भाग्यवालोंमें कोई बुरा या अभागा होता है तो यह कहावत कही जाती है।



663. लंकामें तूँ ही दाळद्री रह्यो

लंकामें तू ही दरिद्री रहा

अच्छों में या अच्छे भाग्यवालोंमें तू ही बुरा या अभागा हुआ।

(ऊपरवाली कहावत देखो)



664. लाकड़ांरै देव़ने खूंसड़ैरी पूजा

लकड़ों के देवताको जूतोंकी पूजा

देवताके उपयुक्त पूजा। किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ उपयुक्त व्यवहार करना।

मि–नष्ट देव री भ्रष्ट पूजा



665. ला कोई बीरबल अैसा नर, पीर बबरची भिस्ती खर

हे बीरबल, कोई ऐसा मनुष्य लाओ जो पीर(की भांति पूज्य), रसोइया भिस्ती और गधा चारों एक साथ हो।

ब्राण के लिअे। ब्राण पूज्य होता है, रसोई बनाता है, पानी पिलाता है और गधेकी भांति भार उठाकर साथ भी चल सकता है। आधुनिक कालके ब्राण का उपहास।



666. लाख जाय, साख ना जाय

लाख (का धन) चला जाय पर साख न जाय।

साख ही सबसे बड़ा धन है।



667. लाग लगी जद लाज किसी?

लगन लग गई तब लाज कौन–सी?

प्रेम हो गया तो लज्जा का क्या काम? किसी काममें हाथ डाल दिया तो फिर क्या शरमाना?



668. लागै जकैरै दूखै

जिसके (चोट) लगती है उसीके दूखती है दूसरेके नहीं दुखती।

मि–जाके पैर न फटी बेवाई सो क्या जाने पीर पराई।



669. लाग्योड़ीमें लाग्या करै

लगी हुई में लगा करती है

विपत्तिमें विपत्ति आती है।

मि– 1. छिद्र ष्वनर्था बहुली भवंति।

2. डपेवितजनदम दमअमत बवउमे ंसवदमण्



670. लाजवाळांनै जोखम है

लाजवालोंको जोखिम का भय है

अपनी लज्जा का ध्यान रखनेवाले को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं। निर्लज्ज सदा सुखी रहता है।

मि–एकां लज्जां परित्यज्य



671. लाठी जकैरी भैंस

जिसकी लाठी उसकी भैंस

सब कुछ बलवानका है। बलवान अन्यायसे भी निर्बलकी किसी वस्तु पर अधिकार जमा ले तो उसे कौन रोक सकता है?

मि–डपहीज पे तपहीज



672. लाडूरी कोरमें कुण खारो, कुण मीठो?

लड्डू की कोरमें कौन (सा भाग) खारा और कौन (सा भाग) मीठा

सबको एक समान मानना।

पक्षपात रहित रहना।

सबको अच्छा समझना।



673. लातांरो देव़ बातांसूं थोड़ो ही मानै?

लातों का देव बातों थोड़े ही मानता है।

दुष्ट दुष्टता करनेसे ही मानता है या सीधा रहता है।

उसको समझाना व्यर्थ है।

मि–शठे शाठम् समाचरेत्



674. लाद दो, लदाय दो, लादनवाळो साथ दो

(बोझा ऊँट पर) खुद लाद दो, लदवा दो, और एक लादनेवाला भी साथ दे दो।

अनुचित मांग पर। जब किसीको कोई चीज दो और वह कहे कि हमारे घर पहुँचा भी दो।

जब किसीको कोई लाभ का काम बताया जाय और वह कहे कि साथ चलकर करवा दो।



675. लाधो माल खाधो

पाया माल खाया

जो रास्ते मेें पड़ा हुआ मिला सो अपना हो गया।



676. ला म्हारी दो मुी चिणांरी दाळ

ला मेरी दो मुी चनेकी दाल।

अनुचित हठ करना



677. ला म्हारी सागी रोटीरी कोर

ला मेरी वही रोटीकी कोर (टुकड़ा)



678. लांबा हेला, ओछी पीक

लंबे हेले और ओछा स्नेह

दिखावा बहुत और अन्तस में प्रेम नहीं

हेला आवाज देना, पुकारना, बुलाना।



679. लांबा तिलक, माधरी बाणी, दगैबाजरी आई निसाणी

लबे तिलक लगाना और मीठा बोलना–यही दगाबाजकी पहचान है।

धोखा देनेवाला ऊपरसे बड़ा महात्मा बनता है और मीठा बोलता है।

मि–ज्वव उनबी बवनतजमेलए जवव उनबी बतंजि



680. लांठरा डौका (डोका सूखी हुई डाली का टुकड़ा) डांगनै फाड़ै

जबर्दस्तका डोका भी लाठी को फाड़ डालता है।

जबर्दस्तकी सब चलती है। उससे सब डरते हैं।



681. लावनै दीयो ले’र देखै है

लगी हुई आगको दियालेकर देखता है।

आगको देखने के लिए दियेकी आवश्यकता नहीं वह तो बिना दियेके ही दिखाई दे सकती है।

जब कोई स्पष्ट बात को (मूर्खतावश) जानने की चेष्टा करे तब



682. लाय लाग्यां कूव़ो खोदै, वो काम कद पार पड़ै?

आग लगने पर कुँआ खोदे तो वह काम कब पार पड़ै

विपत्ति के उपस्थित हो जाने पर उपाय सोचे तब



693. लाल किताब में लिक्खा यूँ

लाल किताब में जो लिखा है



684. लाल किताब में लिक्खा यूँ

तेली बैल लड़ाया क्यूँ

खळी खवायकै किया मुसंड,

बैलका बैल और साठ रुपिया डंड।

पक्षपातपूर्ण न्याय। अपने स्वार्थ के लिअे न्याय का गला घोटना इसका निकास इस कहानी से है– किसी तेली के बैल ने एक काजी के बैल को माल डाला। इस पर काजी ने तेली से कहा कि तुमने अपने बैल को क्यों खिला पिलाकर मुसंड किया, जिससे मेरा बैल मारा गया। इस उपराध में तुम्हें बैल और तुर्माना दोनों देना होगा। अन्त में जब काजी को मालूम पड़ा कि मेरे ही बैल ने तेली के बैल को मार डाला है तब उन्होंने अपना दोष हलका करने के लिअे कहा कि फिर जानवर ही तो था अर्थात् पशु को भले बुरे का विचार नहीं होता। इस पर तेली ने अपने मन ही मन कहा, ‘‘वाहजी काजी साहब, एक ही अपराध में अपने लिअे खास अेक कानून और मेरे लिअे कुछ दूसरा ही’’



685. लालच बुरी बलाय

लालच बहुत बुरा है। पूरा दोहा इस प्रकार है–

माखी बैठी सहदपर, पंख गया लपटाय।

हाथ मलै अर सिर धुणै, लालच बुरी बलाय।।

मि–छव अपबम सपाम ंअंतपबम



686. लाल बही छप्पनरै पानै, सेठजी रोव़ै छानै–छानै

लाल बही के छप्पनवें पन्ने पर सेठजी छिप–छिपकर रोते हैं

किसी पूंजीपति का दिवाला निकले तब।



687. ला–ला मिटियाँ घर मांडो है, मूरख कह घर म्हारो

मिी ला–लाकर घर बनाया है और मूर्ख कहता है कि घर मेरा है

शरीरके लिअे कहावत। शरीर मिी का बना है पर अज्ञानी मनुष्य

उसे अपना समझता है। धन–दौलत मकान आदि के लिअे भी यह कहावत प्रयुक्त होती है।



688. लिख–लिख भेजूँ पत्तर में, तू सित्तर में न बव़त्तर में

(बार –बार ) पत्र में लिख दिया है कि तेरा नाम सत्तर ओर बहत्तर तक तो नहीं है।

जब कोई किसीसे मेलजोल करना चाहे और वह उदसकी ओर ध्यान ही न दे तब इसका निकास इस कहानी से है:– दो मित्र थे, एक परदेश में रहता था और लम्पट था उसने अपने देशस्थ मित्र को एक दो बड़ी (पार्सल) भेजी और उसे अपनी प्रेयसी किसी वेश्या को देने के लिअे लिखा। मित्र था बुद्धिमान। वह उस वेश्या के घर गया और उससे कहा कि किसी तुम्हारे प्रेमी ने एक दो बड़ी मेरी माफ‍र्त भेजी पर मैं तो भेजनेवाले का नाम भूल गया। वेश्या अपने प्रेमियों के नाम बतलाने लगी। सत्तर बहत्तर नाम बतलाये तब तक तो उसके मित्र का नाम नहीं आया। तब उसने दीबड़ी तो अपने मित्र की बहू को दे दी और उसे लिख भेजा कि मूर्ख क्यों व्यर्थ में धन गवांता है। वहां तेरी गिनती सत्तर बहत्तर तक तो नहीं है अर्थात् उस वेश्या के सैकड़ों पे्रमी हैं तेरी तो वहां गिनती ही नहीं है।



689. लिया–दिया आडो आव़ै

देखो दियो–लियो आडो आव़ै



690. लीद खाव़णी तो हाथी री गधैरी क्यों खाव़णी?

लीद खाना तो हाथी की खाना गधेकी क्यों खाना?

गुनाह बेलज्जत क्यों करना?



691. लीलटांस कीड़ा भखै, मुखे विराजे राम

करणी सूं क्या काम है, दरसण सूं है काम

नीलकंठ पक्षी कीड़ों को खाता है पर उसके मुखमें राम–नाम रहता है।

हमें उसकी करनी से क्या? हमें तो दर्शनसे काम है (नीलकंठका दर्शन सगुन माना गया है)



692. लुगाईरी अकल खडी में हुया करै पाठान्तर–अेडी नीचै

स्त्रीकी बुद्धि एड़ी में हुआ करती है।

स्त्री कम अक्लवाली होती है।



693. लखा लाड, घणी खमा

रूखा प्यार, घणी खमा

कोरे सूखे प्यारसे क्या? कुछ देने–लेने को तो कहो, नहीं तो दूर से प्रणाम।



694. लूंकड़ी पाद दियो, सिसियै साख भर दी

लोमड़ीने पाद दिया, ससे ने साक्षी दे दी

जब किसी की हां मे हां मिलाअी जाय तब



695. लूंठैरो डोको डांगनै फाड़ै

जबरदस्त की लाल आंखां के तौर सहने पड़ते है।



696. लूंठाई रा लाल तुर्रा

जबर्दस्त मारता है और रोने नहीं देता।

जलवान् सताता है और चूँ नहीं करने देता।

बलवानके अत्याचारको चुपचाप या ऊपरी प्रसन्नता के सहना पड़ता है।



697. लूंटीज्यां पछै कांई डर?

लूट जानेके पीछे क्या डर?

जिस बातका भय हो वह हो जाय तो फिर उसका क्या भय!



698. लूण बिना पूण रसोई

नमक बिना रसोई अधूरी है

भोज्यवस्तुओं में नमक प्रधान और सबसे उपयोगी है।



699. लूली झाड़ू दै जद अेक टांग पकड़नाळो चाहीजै

लंगड़ी स्त्री झाड़ू दे तब अेक आदमी उसकी टांग को पकड़े रहने के लिअे चाहिअे।

जब कोई किसी की बिना सहायता के काम न कर सके तब।



700. लेके दिया, कमाके खाया

झख मारणै जगतमें आया

यदि (किसीका कुछ) लेकर (लौटा) दिया और कमा करके खाया तो वह मनुष्य झख मारनेके लिअे ही जगतमें आया।

दुष्टोंका या आलसियों का कथन।



701. लेणो अेक न देणा दोय

लेना अेक न देना दोय

निकम्मे व्यक्ति के लिअे। सारहीन बात पर।



702. लेव़ण गयी पूत, गमा आयी खसम

लेने गयी पुत्र और गँवा आयी खसम को

लाभके बदले हानि होना

मि– 1. चौबेजी गये छब्बे होने, दुबे होकर आये।

2. चौबेजी गये छब्बे होने दो घरके खोय लगे रोने।



703. लोभी गरू लालची चेला, दोऊँ नरक ठेलमठेला

गुरु यदि लोभी हो और चेला यदि लालची हो तो दोनों नरकमें जाते हैं।



704. लोभे लाग्यो बाणियो चाटे लागी गाय,

हिली हिली लोंकड़ी अड़क मतीरा खाय

लोभ लगा हुआ वनिया और चाटै लगी हुई गाय और हिली हुई लोमड़ी मतीरा चााने अवश्य आती है।



705. लोव़ैसूं लोव़ो घसीजतां आग नीकळै

लोहेसे लोहा घिसने पर आग निकलती है

समान शक्तिशाली पुरुषों की भिड़न्त से नुकसान ही होता है



706. लोह जाणै लोहार जाणै, खातीरी बलाय जाणै

लोहा जाने लुहार जाने, खाती की बला जाने

जिसकी जो वस्तु हो उसे ही उसका ध्यान रखना होता है। असम्बद्ध व्यक्ति भला दूसरे की वस्तु का क्यों ध्यान रखने लगेगा।



707. लोहां लकड़ां चामड़ा, पहली किसा वखाण?

बहू बछेरां डीकरां नीव़डि़यां परवांण

लोहा, लकड़ी और चमड़ा प्रयोग में आने पर ही अच्छा बरा कहा जा सकता है। बहू बछेड़ा और सन्तान बड़े होने पर अच्छे हो तभी अच्छे समझने चाहिए।

मि–छमअमत चतंपेम ं वितक जपसस लवन ंतम वअमत