326. मकड़ी जाळैमें फँसगी
मकड़ी जालेमें फँस गयी
जब कोई व्यक्ति आफतमें फंस जाता है तब
327. मकर–चकररी घाणी, आधो तेल’र आधो पाणी
मकर चकरकी धानी, आधा तेल और आधा पानी
धूत्र्तता और मक्कारीसे भरा व्यापार।
328. मजा मजेमें लड़का–लड़की नफेमें
विषय–वासना की तृप्तिके साथ साथ संतान की प्राप्ति भी होती है।
329. मंजरीरो मैणौ कोनी, चोरी–जारीरो मैणो है
मजदूरी का ताना नहीं, चोरी–जारीका ताना है
मजदूरी करना कोई बुरा काम नहीं।
330. मढी सांकड़ी कोडा घणा
मठ छोटा और मोडैबहुत (मोडामुंडित, साधु)
जगह थोड़ी, बैठनेवाले बहुत
जगह थोड़ी, रहनेवाले बहुत
331. मणभररो माथो हलाव़ै पण टकैभर जीभ को हलायीजै नी (पाठान्तर–सिर; पईसैरी)
मन भरका सिर हिलाता है पर पैसे भरकी जबान नहीं हिलाता।
जब कोई व्यक्ति किसी कथनका उत्तर जबानसे न देकर
केवल सिर हिलाकर देता है तब।
332. मणमें चाळीस सेरई मैदो!
मनमें चालीस सेर मैदा है।
सर्वाश में झूठ
333. मणमें चाळीस सेर रो धोखो!
334. मणमें आठ पंसेरी री भूल!
मनमें आठ पंसेरी की भूल!
सवंर्ाशमें झूठ, रत्ती भर भी सच नहीं।
335. मणमें पंसरीरी भूल
मनमें पंसेरीकी भूल
बहुत बड़ी भूल। बहुत बड़ा झूठ
336. मन खटाईमें दीसै है
मन खटाईमें दिखायी पड़ता है
मनमें कपट जान पड़ता है।
337. मन चंगा तो कठोतरीमें गंगा
मन शुद्ध है तो कठौतीमें ही गंगा है
मन शुद्ध है तो तीर्थ–पूजा आदि बाहरी आडंबरों की आवश्यकता नहीं,
और मन ही शुद्ध नहीं है तो ये सब आडंम्बर व्यर्थ हैं।
338. मन चालै पण टू को चालैनी
मन चलता है पर टू नहीं चलता
1. इच्छा होती ळ पर साधन नहीं।
द्रव्य न होनेसे इच्छाके अनुसार कार्य नहीं होता।
2. वृद्ध और शक्तिहीन पुरुषोंकी विषय–वासनाके लिअे।
339. मन टू चालै पण पईसा कठै?
मनका टू तो चलता है पर पैसे कहां?
मन तो इच्छा करता है पर द्रव्य नहीं।
(ऊपरवाली कहावत देखो)
340. मन ना मिलै ज्यांसूँ मिलबो किसोरे?
लागी प्रीत ज्यांरो तजबो किसो रे?
जिनसे मन नहीं मिलता उनसे मिलना कैसा और जिनसे प्रेम हो गया उनको छोड़ना कैसा?
जिनसे मन न मिले उनसे नहीं मिलना चाहिअे।
और जिनसे प्रेम कर लिया उनको कभी छोड़ना चाहिअे।
341. मन विनारो पाव़णो, घी घालूं क तेल?
बिना मनका मेहमान है उसे घी परीसूं या तेल?
बिना मनका काम कभी अच्छी तरह नहीं किया जाता।
342. मन मिलियांरा मेळा, नहीं तो चला अकंला
मन मिले तो मेला (साथ) करो, नहीं तो अकेले चल दो
जिनसे मन मिल जाय अैसे लोगाेंसे हेलमेल रखना चाहिअे,
नहीं तो अकेले रहना अच्छा।
343. मन मिलियाँरा मेळा, नहीं तो सबसूं भला अकेला
(ऊपर की कहावत देखो)
344. मन राजा–सो, कर्म कमेड़ी–सो!
मन राजा जैसा, और भाग्य पंडुखी जैसा?
मनकी अभिलाषाअें तो बहुत बड़ी, पर भाग्य साधारण।
345. मनरा लाडू खाव़ै
मनके लडू खाता है
1. झूठी आशाअें करना
2. पूरे न हो सकनेवाले ऊंचे–ऊंचे मनोरथ करना
मि–ज्व इनपसक बेंजसमे पद जीम ंपत
346. मनरा लाडू खाव़णा तो कसर क्यूं राखणी?
मनके ही लडू खाना तो फिर कमी क्यों रखना(फिर तो पेट भर खाना चाहिअे)।
(नीचेवाली कहावत देखा)
347. मनरा लाडू खाव़णा तो पेट भर खाव़णा
मनके लड्डू ही खाना तो फिर भरपेट खाना चाहिअे।
जब मनोरथ करना ही है तो फिर तुच्छ मनोरथ क्या करना।
348. मनरै हाराँ हार है, मनरै जीत्यां जीत
मनके हारे हार है, मनके जीते जीत
जय–पराजय या सफलता मन पर ही निर्भर है।
मनमें उत्साह ही तो सफलता मिलती है और मन ही हिम्मद हार जाय तो असफलता निश्चित है।
इसलिअे मनोबल रखना चाहिअे।
मि– 1. मनके हारे हार है मनके जीते जीत।
पारब्रको पाइये मनहीकी परतीत।।
2. मन अेब मनुष्याणां कारणं बंध–मोक्षयो:।।
349. मनसूँ ही गधैरो नांव़ मोव़नियो!
मनसे ही (जबर्दस्ती) गधेका नाम मोहनिया!
350. मन होय तो माळव़ै जाय परो
मन हो तो मालवे चला जाय
काम करनेको मन ही तो फिर मनुष्य कठिन काम भी कर लेता है।
351. मनै न म्हारै जायैनै, दे खाटरै पायैनै
यदि मुझे या मेरे लड़केकी नहीं देते तो चाहे खाटके पायेकी दो।
कोई चीज अपने काम न आवे तो अपनी बलासे चाहे जहां जाय।
352. मर ज्याव़णो पण बात राखणी
मर जाना पर बात रखनी चाहिअे।
1. वचनसे कभी नहीं टलना चाहिअे चाहे मरना ही पड़े
2. कीत्र्ति कर जाना चाहिअे चाहे प्राण देना पड़े
353. मर ज्यावणो पण दिळयो नहीं खाव़णो
मर जाना पर दलिया नहीं खाना
चाहे मरना पड़े पर पेट भरनेके लिअे नीच काम नहीं करना चाहिअे।
मि– 1. लंघण कर लंकाल, सादूल़ो भूखो सुव़ै।
कुल़–वट छोड़ क्रपाले़, पैंड न देत, प्रतापसी।।
2. िंसंह–बचा जो लंघणा तोय न घास चरंत
354. मरणनै ही व़खत कोनी (पाठान्तर – फुरसत)
मरनेको भी समय नहीं
जब कोई बहुत काममें लगा होता है तब
355. मरणरा किसा गाडा जूतै है?
मरनेको कौनसे गाड़े जुतते हैं?
मौत न जाने कब आ जाय। उसके लिअे कोई तय्यारी नहीं की जाती।
356. मरताँ किसा गाडा जूते?
मरते हुअे कौन गाड़े जुतते हैं?
(ऊपर की कहावत देखिये)
357. मरतां मौत विगाड़ीजै
मरते–मरते मौत बिगाड़ी जाती है
जब कोई बिना सामथ्र्य का काम करता है तब।
358. मरती क्या न करती?
मरती हुई क्या नहीं करती?
1. करता हुआ मनुष्य क्या नहीं करता–बुरे–से–बुरा काम भी कर डालता है।
2. जो मरनेको तय्यार है वह कठिन–से–कठिन कार्य से भी नहीं डरता
359. मरतैआळी डाचल्यां मारै
मरते हुअे मनुष्यके (समान) मुह मारता है
थोड़ी बातके लिअे बहुत लालच करना।
360. मरतैनै सै मारै
मरते हुअे को सब मारते हैं
दुर्बल या गरीब को सब सताते हैं।
361. मरतैरै सागे मरीजै कोनी
मरते के साथ मरा नहीं जाता
362. मरतै मोडै मारिया चोटीआळा च्यार
मरते हुअे मोड़े(सन्यासी) ने चार चोटीवालों (अमुंडितों) को मार डाला।
जब कोई अपनी हानिके साथ दूसरे कइयोंकी हानि करा दे तब।
इसका निकास इस प्रकार है–केहरोसिंह, देवीसिंह, छत्रसिंह और दौलतसिंह मारवाड़–नरेश
महाराजा विजयसिंह के सरदार थे जो राज–विद्रोही हो गये थे। उनने महाराजाको बहुत कष्ट
दिया। महाराजा के गुरु आत्मारामजी सन्यासी थे। उनने कहा कि तुम्हारा कष्ट मैं अपने
साथ लेता जाऊंगा। थोड़े दिनोंमें आत्मारामजी का देहान्त हो गया। सरदार लोग उन्हें
मिी देनेको किलेमें अेकत्र हुअे। उपयुर्क्त सरदार भी आये। उनको उसी समय घेर कर
पकड़ लिया गया। इस पर किसी कविने यह दूहा कहा–
केहर देव़ो छत्रसो दोलो राजकंवार।
मरतै मोडै मारिया चोटी आला च्यार।।
363. मारतो तरळा खाव़ै
मरता हुआ टिल्लेबाजी करता है
व्यक्ति मिथ्या चेष्टा पर।
364. मरतो मलार गावै
मारता हुआ मलार गाता है
शक्ति मिथ्या चेष्टा पर।
365. मरद तो अेकदंता ही भला
मर्द तो अेक दांतवाले ही अच्छे
जिसके दांत टूट जाते हैं वह हंसीमें ऐसा कहता है।
366. मरदाँ मरणा हक्क है, रोणा हक्क न होय
मर्दोंके लिअे मरना न्याय है, रोना न्याय नहीं
मर्द विपत्ति पड़ने पर रोते नहीं, उससे जूझ जाते हैं।
367. मरिया मरिया लेखै लाग, जीवै़ जका खेलै फाग
मरे–मरे व्यक्ति लेखे लगे और जो जीते हैं वे फाग खेलते हैं
मरे सो गये, बाकी मौज उड़ाते हैं।
368. मरी क्यूं? सांस को आयो नी
अेकने पूछा– मरी क्यों? दूसरा उत्तर देता है– सांस नहीं आया इसलिअे।
369. मरै न मांचो छोडै
1. न मरता है न खाट छोड़ता है (चंगा होता है)
2. मरे तो कहीं जाकर खाट छोड़े (और हमारा पिंड छूटे)
बूढे़ के लिअे जिसकी सेवा करते–करते घरवाले थक जाते हैं
3. जब किसीसे पिण्ड नहीं छूटता हो तब
4. मरेंगे तभी खाट छोड़ेगें
मरनेपर ही किसी कामका पिंड छोड़ेगें
जो दूसरोंको अनिच्छाकी पर्वाह न करके किसी स्थान पर डटा रहे उसके लिअे
370. मरां तांईरो नातो है
मरे तकका नाता है
1. सांसारिक संबंध मरने तक ही हैं, बादमें कोई किसी का नहीं।
2. मरनेके बाद सब भूल जाते हैं।
385. मरां पछै कुण देखणने आव़ै
मरेके बाद कौन देखने आता है?
1. मरनेके बाद कोई काम हो तो व्यर्थ है
2. कोई मरे हुअे की बुराई करे तब
3. मरनेके बाद उसके साथ चाहे जैसा व्यवहार करो
386. मरां पछै कण देखी है?
मरनेके बाद किसने देखा है
मरनेके बाद न जाने क्या हो?
मरनेके बाद का हाल कौन जानता है?
385. मरोड़ा दाव़ तो ढेढ ही घींसैला
मरे हुअे जानवरोंको तो ढेढ़ (चमार) ही घसीटेंगे
1. कुत्सित कार्य नीच पुरुष ही किया करते हैं
2. जो जैसा होता है वह वैसा ही कार्य करना पसन्द करता है।
386. मरोड़ा लारै मरीजै थोड़े ही
मरे हुओंके पीछे मरा थोड़े ही जाता है
कोई आदमी किसी मृत संबंधी के पीछे बहुत दु:ख करे तब।
387. मसाणां गयोड़ा मुड़दा आगै ही पाछा आया हा?
श्मसान गये हुअे मुर्दे आगे ही कभी लौटे थे?
श्मसान पर गये मुर्दे फिर नहीं जीते।
388. मसाणां गयोड़ा लाकड़ा कदे ही पाछा आया हा?
श्मसान पर गया हुआ काठ कभी लौट कर आया?
नीचों को सौपी हुई वस्तु कभी वापिस नहीं मिलती।
389. मसाणां में मीठैरो सव़ाद जोयीजै
श्मसानमें मीठेका स्वाद चाहिअे
जो कुछ मिल गया उसे ही गनीमत सकझा।
390. मसाणां रै लाडव़ांमें इळायचीरो सव़ाद जोयीजै
श्मसान के लुओं में इलायचीका स्वाद चाहिअे
(ऊपर की कहावत देखिये)
391. मंगतैसूं कोई गळी छानी कोनी
मंगते से कोई गली छिपी नहीं
बहुतसे रास्तों की जानने वाले मनुष्य के प्रति हंसी में ऐसा कहा जाता है।
392. मा आव़ै, दही–बाटियों लाव़ै
मा आवेगी, दही–बाटियों लावेगी
किसीकी प्रतीक्षा करते रहना।
इसका निकास इस कहानीसे है–अेक स्त्री थी जिसके अेक छोटा बच्चा था। अेक बार भयंकर
अकाल पड़ा तो उसके लिअे बच्चे को पालना कठिन हो गया। तब वह जंगलमें गयी और बच्चे को
अेक पेड़के खोखलमें लिटा दिया और कहा–बेटा! मैं तेरे लिअे दही–बाटी लाने जाती हॅं।
यह कहकरचली गयी। बच्चा बराबर पुकारता रहता–माँ आवेगी, दही–बाटी आवेगी। भगवानने उसकी
पुकार सुनी और उसके अंगूठेमें दूध उत्पन्न कर दिया जिसे वह चूसता रहता। यों करते
अकाल बीत गया। माँने सोचा कि बच्चे को देख आऊं – जीता है या मर गया। माँ आयी तो
उसने बच्चे को ज्यों–का–त्यों पाया। बच्चे ने कहा–माँ! दही बाटी लायी? माँने
कहा–बेटा! लायी तो नहीं, अब लाती हूें। यह कहकर दही–बाटिया लाने चल दी। मनमें
सोचा–जब इतने दिन नहीं मरा तो अब दो–चार दिनमें क्या मरेगा? भगवानने सोचा देखो,
मैने इसके बालकको इतने दिनों तक पाला पर इसे अभी भी कोई पर्वाह नहीं, अब तो सुकाल आ
गया, अब मैं क्यां पालूं? बस दूधका आना बंद हो गया और बालक मर गया। माँ कुछ दिनोंके
बाद दही–बाटी लेकर आयी तो बच्चेको मरा पाया।
केसरदेसर गांवके मार्ग में ‘बालकिये रो धोरा’ प्रसिद्ध है जहां इसी प्रकार की घटना
घटी थी ‘‘बाबौ आसी, दही–बाटियोलासी’’ वह बच्चा मरकर पितर हुआ जो बड़ा सात्विक और
पथिकों का मार्गदर्शक था।
393. माईताँरी गाळूयां घीरी नाळूयां
मा–बापकी गालियां घीकी नालियों के समान हैं
बड़ोंकी गालियाँ (कठोर वचन)हितकारी होती है।
394. माइ। नांव़सूं खाई प्यारी
माता की अपेक्षा खाया हुआ ज्यादा प्यारा होता है
जो खिलाता है वह मातासे भी अधिक प्यारा लगता है।
जिससे स्वार्थ निकले वह संबंधियोंसे भी अधिक प्यारा होता है–उसी का लोग सबसे ज्यादा
ध्यान रखते हैं।
395. माई! माई! भोत वियाई
ए भाई! ए भाई! अन्यत्र बहुत बियाई हुई है (तुम्हारे अतिरिक्त और बहुत सी माताओं ने
पुत्र जने है)
एक जगह से कार्य सिद्धि नहीं हुई तो और बहुत सी जगहोंसे हो सकती है।
396. मा करै सो घी करै
जो माता करती है वही बेटी करती है
सन्तान माता के अनुसार होती है।
397. मां खेतमें, पूत जनेतमें
माता खेतमें, बेटा बरातमें
कुसुम या कसुमेके लिअे जिससे कुसुमी रंग बनता है।
कुसुमका पौधा खेतमें होता है और उससे उत्प कुसुमी रंग काम आता है,
बराती कुसुमी रंग के वस्त्रादि पहनते हैं।
398. माख्यां मार’र तीसमारखां बण्या है
मक्खियां मारकर तीसमारखां बने है
व्यर्थ शेखी मारने वाले पर।
399. माडपूरी माथुरा नगरी, आधा मोदी आधा खतरी
माडपुरा मथुरा जैसा नगर है, उसमें आधे मोदी और खत्री हैं
माडपुराबीकानेर के एक स्थान (लक्ष्मीनाथजी की घाटी) का पुराना नाम।
400. माणै जकांरा माल
जो भोगते हैं उन्हींके माल हैं
संपत्ति उन्हीं की है जो भोगते हैं, कमानेवालोंकी नहीं।
401. माताजी मठमें बैठी ही गटका करा है, व़ाणियैरै घकै का़े चढ़ीनी
माताजीने मंदिरमें बैठे–बैठे ही मौजसे बलि–भोजन की गटका है, किसी बनियेके धक्के
नहीं चढ़ी।
भोले–भाले व्यक्तियों को सतानेवाले के प्रति
इसका निसास इस कहानी से है–
एक बनिये ने किसी कार्यके लिए भेरूजीं की मान्यता की, कार्य सिद्ध होने पर संकल्पित
भैंसेको बलि के लिअे लाकर भैरवमूर्ति से बांध दिया क्योंकि वह अहिंसावादी पशुवध
कैसे करता। भैंसा भैरव मूर्ति को लेकर भगा, पासही माताजी का मठ (देवी का मन्दिर)
था, देवी हँसी, भैरव रे रुष्ब् होकर उपयुर्क्त कहावत कही। किसी जबरदस्त से पाला
पढ़ने पर इस कहावत का उपयोग किया जाता है।
402. मातो देख’र डरणो नहीं, पतलो देख’र अड़नो नहीं
मोटा ताजा आदमी देखकर उससे डरना नहीं चाहिअे और पतले आदमीको देखकर उससे अड़ नहीं
जाना चाहिअे।
मोटे आदमी हमेशा बलवान् नहीं होते और न पतले आदमी हमेशा कमजोर।
403. माथेमें गिज, कांकरांमें कलाबाजी खावै
माथेमें गंज और कंकरीमें गुलांचिया खाता है
असमर्थ व्यक्ति शक्ति से ऊपर कार्य करने की चेष्टा करे तब।
404. माथेमें दियाँ गाँड बोलै
माथे पर मारनेसे गांड बोलती है
पासमें कुछ भी नहीं है।
405. माथै रो भार पगां नै
सिरका भार पैरों को ही ढोना होता है
करजा लेने वाने को चेतावनी।
406. माथैरी पागड़ी बगल में लियां पछै कांई डर?
माथेकी पगड़ी बगलमें लिये पीछे क्या डर?
लज्जा छोड़ देनेपर किसी बात का भय नहीं रहता?
407. माथो ऊखली में दियां पछे घावों रौ कांई डर
सर ऊखली में डाल देने पर घावों का कया डर
खतरे के काम में हाथ डालने पर नुकसान से नहीं डरना चाहिए।
408. माथो मसाला मांगै है
माथा मसाले मांगता है
मार खाना चाहता है, मार खानेकी मनमें आ रही है।
409. माथो मूंडों तो मनमें मूंड नहीं तो पड़सी नरक की कूंड
माथा मुंडाया है तो मनकी भी मुंडा नहीं तो नरक कुंडमें पड़ोगे
मन वशमें नहीं किया तो साधु होनेसे क्या लाभ।
410. माथा माटा, घरमें टोटो
सिर मोटा, घरमें टोटा
मोटे सर वाला व्यक्ति भाग्यवान समझा जाता है, जब वैसे पुरुष के घरमें भी टोटा हो तब
ऐसा कहा जाता है।
411. माथो मूंडयां जती नहीं, आधो ओढयां सती नहीं
माथा मुंडवा लेनेसे ही कोई यती नहीं हो जाता और अन्धा वस्त्र ओढ. लेनेसे ही कोई सती
नहीं हो जाती।
412. मादलियो मारो’र गोठ विखरी
मादलिये को मारा और गोष्टी विखर गयी
जब किसी व्यक्ति के न रहने पर कार्य अस्तव्यस्त हो जाय तब।
टिप्पणी–मादलिया अेक भील सरदार था।
413. मान मनाया खीर न खाया, अैंठा पातल चाटण आया
सन्मानके साथ मनाया तब तो खीर भी नहीं खायी और अब जूठे पतल चाटनेको आ पहुंचे
आदरपूर्वक करनेको कहा तब तो काम नहीं किया, अब बेइज्जती के साथ वही काम करता है।
414. मानै तो देव, नहीं तो भींतरा लेव़
यदि कोई (देवताओं को) माने तो देवता हैं नहीं तो भींतके लेवड़े हैं
415. मा पर पूत, पितापर घोड़ा वो’त नहीं तो थोड़ा–थोड़ा
पुत्र माता जैसा होता है और घोड़ा पिता जैसा
416. मा–पीटी कहो भावैं, बाप–पीटी कहो
मां–पीटी कहो चाहे, बाप–पीटी कहो
दोनों का तात्पर्य अेक ही है, केवल कहनेका फर्क है।
417. मा–बापा थंरी बेटी म्हारौ बेटैनै परणाय दो
अेक महतरानीका अपने मालिक से कथन–मां–बाप! अपनी लड़की मेरे लड़के को ब्याह दो।
धनकी गर्मीसे साधारण आदमी का भी हौसला बढ़ जाता है।
धन पाकर छोटा आदमी अनुपयुक्त बातें कहने या करने लगे तब।
इस कहावतका निकास इस कहानी से है–
अेक गांवमें अेक ठाकुर था। उसके यहां अंक महतरानी थी जो बड़ी सीधी थी पर जब वह
द्वार पर आकर खड़ी होती तो बड़े ठाठसे कहती– मां–बाप! अपनी लड़की मेरे लड़केको
ब्याह दें। जब वह उस जगह से हटती तो फिर वैसी ही सीधी हो जाती। अेक दिन ठाकुरने
कहा–बात क्या है? इस जगहमें कोई विशेषता होनी चाहिअे, इसको खोदो। खोदा तो नीचे
मुहरोंसे भरा अेक चरू निकला। ठाकुरने कहा बस, यही कारण है, इसीकी गर्मीसे महतरानी
अैसी बातें कहती है। ठाकुरने चरू उठवा कर भीतर रख लिया। तबसे महतरानी का वैसा बोलना
भी बंद हो गया।
418. मा–बाप मीठा मेव़ा है
मां–बाप मीठे मेवे हैं मा–बाप बड़े हितकारी हैं।
419. मा भठियारी, पूत फतैखां
मां भठियारी और बेटा फतहखां
हैसियतके प्रतिकूल कार्य करनेवाले व्यक्तिके लिअे।
420. मा मरी, बेटी हुई, रह्या तीन–रा तीन
मां मर गयी तो बेटी जनम गयी, इस प्रकार तीन–के–तीन ही रहे अेक औरका घाटा दूसरी ओरसे
पूरा हो जाय तब।
मि– 1. मरा घर बेटा भया, इसका घाटा उसमें गया।
2. बाबा मरे, निहालू जनमे, वही तीन–के–तीन
3. बाबो मर्यो गीगली जायी रेया तीन रा तीन।
421. मामैरो ब्यांव़ मा पुुरसगारी, जीमो बेटा रात अंधारी
मामे का ब्याह, मां परोसनेवाली और अंधेरी रात, बस फिर क्या चाहिअे, बेटा! खूब जीमा।
जब सभी बातें अनुकूल हों।
राजस्थानमें महतर अपने जजमानों को मां–बाप कह कर संबोधन करते हैं।
422. मामैरै कानमें मुरकी, भाणजो भाराँ मरै
मामे के कानों में बाली और भानजा भार मरे
जो दूसरेके धन पर घमंड करे उसके लिअे।
मि–मामूके कानमें बालियां, भानजा अैंड़ा–अैड़ा फिरै।
423. मायड़को मन धीयड़सूं, धोयड़का मन धींगासूं
माता का मन (प्रेम) बेटासे और बेटाका मन शोहर्दासे।
मि–मा चाहै केटाकी, बेटी चाहै मोटे धींगको।
424. माया कनै माया आवै
माया के पास माया आती है
धनवान के पास धन आता है।
मि–डवदमल इतममके उवदमल
425. माया गंठ, विद्या कंठ
माया (धन) जो गांठ में हो और विद्या जो कंठमें हो (वही काम आता है)।
मि– 1. पुस्तकस्थातु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
2. नाणो अंट’र विद्या कंठ
426. माया थारा तीन नाम, परस्या परसू परसराम
हे धन तेरे तीन नाम हैं– अेक परसिया, दूसरा परसु और तीसरा परशुराम मनुष्यका आदर
धनके अनुसार होता है– जब धन नहीं होता तो लोग परसिया कहकर पुकारते हैं, जब कुछ धन
ही जाता है तो परसा कहने लगते हैं और जब और ज्यादा धन हो जाता है तो परसराम कहा
जाता है।
427. मायानै भै, कायानै भै नहीं
धनको भय होता है, शरीरको कोई भय नहीं
पासमें धन हो तो हर समय और हर स्थान पर भय बना रहा है कि कहीं चोर–डाकू छीन न लें
पर जिसके पास कुछ नहीं उसको कोई भय नहीं होता–
वह सब जगह भिय आ–जा सकता है।
428. मायासूं माया मिलै कर–कर लांबा हाथ
मायासे माया लंबे हाथ कर–करके मिलती है।
धनवान, धनवानका आदर करते हैं, गरीबोंका नहींं
429. मारणों तो मीर ही मारणो
मारना हो तो किसी मीर (बड़े व्यक्ति) को ही मारना चाहिये।
काम करना हो तो बड़ा ही करना चाहिअे।
430. मारवाड़ मनसोबे डूबी
मारवाड़ मनसूबोंमें डूबी।
मारवाड़के लोग मनसूके ही बांधते रहते हैं, करके कुछ भी नहीं दिखाते।
मिलाओ– मारवाड़ मनसोबे डूबी पूरब डूबी गाणे सें।
खानदेस खुरदै सैं डॅब्यो दक्खण डूबी खाणे सें।
431. मार, विद्या–सार
(गुरुको) मार विद्याका सार है।
1. गुरुकी मार विद्या देनेवाली होती है इससे उसका बुरा नहीं मानना चाहिअे।
2. बिना मारके विद्या नहीं आती।
मिलाओ–ैचंतम जीम तवक – ेचपस जीम बीपसकण्
432. मारसूं भूत भागे
मारसे सब डरते हैं।
मार पड़नेसे बड़े–बड़े बदमाश भी सीधे हो जाते हैं।
433. मारै’र रोवण को दै नी
मारता है और रोने नहीं देता
जबर्दस्त या अत्याचारी के लिअे।
434. मारै सो मीर
जो मार लेता है वही मीर है।
जो काम कर लेता है वही श्रेष्ठ है।
435. मांरै पेटमें सीख’र कोई को आयो नी
माता के पेटमें सीखकर कोई नहीं आया।
काम सीखने ही से आता है अपने–आप नहीं।
436. माल माथै जगात है
माल पर जकात है (जिसके पास माल होता है उसीको जकात देनी पड़ती है)
437. मालैरा मढै वीरमारा गढै
मालाजीके वंशज मढि़योंमें और वीरमजीके गढ़ोंमें रहेंगे।
राव मालोजी या मल्लीनाथजी मारवाड़के राजा थे और वीरमदेवजी उनके छोटे भाई। मालोजी के
बाद उनका राज्य तो उनके वंशजोंमें बंटकर टुकड़े–टुकड़े हो गया और वीरमजी के पुत्र
चूंडोजीके वंशज हैं।
438. माला फेरयां हर मिलै तो हूं फेरूं झाड़
माला फिरानेसे ही यदि भगवान मिल जायं तो मैं माला क्या, झाड़को ही फेरने लगूं,
जिसके फेरने लगूं , जिसके फूलों से माला बनती है।
मन शुद्ध और पवित्र नहीं तो माला फिरना व्यर्थ है।
मिलाओ– माला फेरे हरि मिलैं बंदा फेरै झाड़।
439. माली’र मूला छीदा ही भला
माली और मूली विरल ही अच्छे।
खेतमें मूली बिल्कुल पास बोनेसे फसल अच्छी नहीं होती और माली अेक साथ रहें तो अनर्थ
करते है।
440. माली सींचै सो घड़ा रुत आयां फल होय
धीरे–धीरे ठाकरां धीरे सब कुछ होय
माली चाहे सौ घड़े ही पानी क्यों न सींचे पर फल ऋतु आने पर ही लगता है।
काम धीरे–धीरे ही होता है, अनावश्यक उतावली करनेसे वह जल्दी नहीं हो जाता।
441. मांगण गया स मर गया, मरया स मांगण जाय
उससे पहले वो मुआ जो होते ही नट जाय
जो माँगने गये वे मर गये, जो मरे हुअे(मनस्विता–हीन) हैं वे ही मांगने जाते हैं पर
वह उससे पहले मर गया जो होते हुए भी न दे।
मांगनेकी एवं सूमकी निंदा।
मिलाओ 1. मांगन मरन समान है मत कोई मांगो भीख।
2. मांगन गयो सो मर गये, मरे सी मांगन जाहिं।
442. मांग–तांग छाछा लायी, सिव़जीनै छांटो
मांग–मूंगकर छाछ लायो और शिवजीको छींटा
443. मांग्या मिलै रे माल, जकांरै कांई कमी रे लाल!
जिनको माल मांगे ही मिल जाता है उनको क्या कमी हो सकती है?
मांगकर काम चलानेवालेको क्या कष्ट हो सकता है? कष्ट तो उन्हें होता है जो परिश्रम
करके प्राप्त करते हैं।
444. मांग्यासूं तो मौत ही को आव़ै नी
मांगनेसे तो मौत भी नहीं आती
इच्छा की हुई वस्तु नहीं मिलती।
445. मांग्योड़ी मौत ही को मिलै नी
मांगी हुई मौत भी नहीं मिलती।
1. जब कोई बहुत निराश हो जाय या जीनेसे ऊब जाय
2. मांगनेसे और तो क्या मौत नहीं मिलती अत: मांगना बुरा है।
(ऊपरवाली कहावत देखिये)
446. मांटीडो निरभाग, ज्यांरी बैर रो अभाग
पति भाग्यहीन है तो उसकी स्त्रीका अभाग्य है
पति भाग्यहीन होता है तो स्त्रीको कष्ट उठाने पडते हैं।
447. मांटीनै रोव़ै बैठी–बैठी, रिजकरने रोव़ै ऊभी–ऊभी
पतिको बैठी–बैठी रोती है और रिजकको खड़ी–खड़ी
पतिसे भी जीविका प्यारी होती है।
448. मांटी मरैरो फिकर नहीं, सपनो साचो हुयो जोयीजै
पतिके मरनेका फिक्र नहीं, पर सपना सच्चा होना चाहिअे।
अपनी बुराई भले ही हो पर हठ नहीं छोड़ना।
449. मायं–रा–मांय, बारै–रा–बारै
भीतर–के भीतर और बाहर–के–बाहर
1. जो दोनों और मिला रहे
2. जो दोनों ओरसे लाभ उठावे।
450. मिनकी दूध पीव़ै नहीं तो ढोळ तो देव़ै
बिल्ली दूध पीती नहीं तो गिरा तो देती है
दुष्ट आदमी व्यर्थ दूसरों की हानि करते हैं।
452. मिनकी दूध पीव़ती आंख्यां मींचै
बिल्ली दूध पीते हुअे आंखे मूंदती है
453. मिनकीरै पेटमें घी थोड़ी ही खटावै़
बिल्लीके पेटमें घी थोड़े ही खटता है(रह सकता है, पच सकता है)
छिछोरे व्यक्तियोंके पेटमें बात नहीं रहती, वे उसे सबसे कहते फिरते हैं।
454. मिनकीरै भागरो छींको टूूटो
बिल्ली के भागका छींका टूटा
1. जब संयोगसे कोई कार्य हो जाय।
2. जब संयोगसे तुच्छ आदमीको कोई बड़ी वस्तु मिल जाय।
455. मिनख कमाव़ै च्यार पोर, व्याज कमाव़ै आठ पोर
मनुष्य केवल चार पहर (अर्थात् केवल दिनमें) कमाता है पर ब्याज आठों पहर (अर्थात्
दिन–रात) कमाता रहता है।
ब्याज दिन–रात चढ़ता रहता है अत: रकमको ब्याज पर लगाना अधिक लाभदायक है।
मिलाओ–1. ब्याज और भाड़ा दिन–रात चलता है।
2. ब्याजके आगे घोड़ा नहीं दौड़ सकता ।
456. मिनख मजूरी देत है, क देवेगो राम?
मजदूरी तो मनुष्य भी देता है परमात्मा क्या देगा? अर्थात् सब कुछ देगा।
457. मिनख मजूरी देत है, क्या राखै लो राम?
जब मनुष्य भी मजदूरी देता है तो क्या राम नहीं देगा?
458. मिनख मार हाथको धोवेनी
मनुष्यको मारकर हाथ्र नहीं धोना।
निर्दयी या दुष्टके लिअे।
459. मिनखरो काम मिनखसूं पड़ै
मनुष्यका काम मनुष्यसे पड़ता ही है। इसलिये किसी मनुष्यको तुच्छ समझकर उपेक्षा नहीं
करना चाहिये। सभीकी सहायता करनी चाहिअे क्योंकि दूसरों की सहायताकी आवश्यकता खुदको
भी पड़ेगी।
460. मिनखरो मिनखसूं सो बार काम पड़ै
मनुष्यका मनुष्यसे सैकड़ों बार काम पड़ता है।
(ऊपरवाली कहावत देखिये)
461. मिनखांमें नाई, पखेरुव़ामें काग
पाणी मायलो काछवो, तीनूं दगैबाज
मनुष्योंमें नाई, पक्षियोंमें कौआ और जलवालोंमें
मिलाओं–नराणां नापितो धूत्र्त: पक्षिणां चैव वायस:।
462. मिनखांरी माया, रूंखांरी छांया (पाठान्तर–दरखतरी)
मनुष्योंकी ही सब माया है और रूंखों ही की छाया है।
मनुष्योंके कारण ही सब चहल पहल है। घरमें बहुत–से मनुष्य हो तभी शोभा है।
463. मिनख़ाँरी माया है
(ऊपरवाली कहावत देखिये)
464. मिन्नी केदार कांकण पहरो!
बिल्लीने केदारजी का कंकन पहना!
जन्म भरका कपटी और धूत्र्त जब महात्मा बने तब। अेसे आदमी विश्वास करने योग्य नहीं
होते!
465. मिन्नी तीरथां न्हा’र आई
बिल्ली तीर्थं में नहाकर आई।
1. दुष्ट आदमी ऊपरसे महात्मा बन जाय तो भी विश्वासके योग्य नहीं।
2. कोरी तीर्थ यात्रासे कोई महात्मा नहीं हो सकता।
(ऊपरवाली कहावत देखो)
466. मिन्नीरी चाल जाव़णो, कुत्तैरी चाल आव़णो
बिल्लीकी चाल जाना, कुत्तेकी चाल आना।
कार्य करनेको जाते समय बिल्लीकी भांति चुपचाप तथा सावधानी पूर्वक जाना चाहिअे और
काम करके आते समय कुत्तेकी भांति जल्दीसे आ जाना चाहिअे।
467. मिन्नीरो कोठारियो ढकूं कन खालूं?
बिल्ली की कोठरी – इसे ढकूं या खोलूं?
जब कोई तुच्छ आदमी इतरा कर बार बार अपनी चीज को दिखानेके लिअे खोले और बन्द करे।
खोले और बन्द करे।
468. मिन्नीरो गू चोकै–पोतैमें ही कामको आव़ैनी
बिल्लीका गू चौका पोतनेक काम में भी नहीं आता।
सर्वथा निकम्में व्यक्ति या वस्तुके लिअे।
मिलाओ– बिल्ली का गू लीपने का न पोतनेका।
469. मिन्न्यांरी दुरासीससूं छींका थोड़ा ही टूटै है?
बिल्लीयोंकी दुराशीषसे छींके थोड़े ही टूटते हैं?
बुरा चाहनेवालों की इच्छासे ही बुराई नहीं हो जाती।
मिलाओ–ढेढांरी दुरासीससूं गायां थोड़ी ही मरे?
470. मिलै तो ईद, नहीं तो रोजा
हाथमें आ जाय तब तो सब–का–सब उड़ा देना और कुछ न रहे तब भूखों मरना।
471. मिलै मुफतरो माल, सांड रैव़ै सोरा
मुफ्तका माल मिलता है और सांड़ बने हुअे मौज उड़ाते हैं।
आधुनिक साधु–संयासियों के लिअे।
472. मिसरी कह्यांसूं मूं मीठोको हुव़ैनी
मिश्रीका नाम लेनेसे ही मुंह मीठा नहीं हो जाता।
केवल बातोंसे ही काम नहीं चलता।
473. मियाजी–जियाजी थारी जिलंपतरी
दाढ़ी–मूंछयां कैण कतरी?
अजी मियांजी! तुम्हारी जन्मपत्री, तुम्हारी डाढ़ी–मोंछ दोनोंको किसने कतर डाला?
1. अपने आपको बहुत होशियार समझने वाला जब ठगा जाय तब।
2. बालकोंका खेलमें अेक–दुसरेको चिढ़ाना। हास्यमें
474. मियाँ! थारी बुझाऊं कै म्हारी?
मियां। तुम्हारी आग बुझाऊं या अपनी?
पहले अपना दुख दूर किया जाता है, पीछे दूसरोंका।
475. मियां–बीबी राजी तो क्या करैला काजी
मियां–बीबी (पति–पत्नी) राजी तो फिर काजी बीचमें क्या करेगा?
जब दो आदमी आपसमें निपट लें तो दूसरोंका बीचमें पड़ना व्यर्थ है।
जब दो आदमी आपसमें मिल जायं तो दूसरे बीचमें दखल देकर क्या लेगें।
476. मियां भी नूंव़ार कायदा भी नंूव़ा
मियां भी नये और कायदे भी नये।
1. नये हाकिम के आने पर नये कायदे बरते जाते हैं।
2. स्वेच्छाचारी हाकिमों पर।
477. मियाँ जी! मरो हो कांई? कै झख मारके
किसीने पूछा–मियांजी मर रहे हैं क्या? तो कहा–
झख मारके (मरना पड़ता है)
जब कोई काम अनिच्छा से बरबस करना पड़े तब
478. मियाँ मरग्या क रोजा घटग्या?
(अब) मियाँ मर गये या रोते घट गये।
जो बात पहले थी वह अब भी है। अब भी काम हो सकता है।
479. मियाँ मुी भर, दाढ़ी हाथ भर
नाटे कद और लंबी डाढी वाले व्यक्ति के लिअे हास्यमें।
480. मियाँ, रोते क्यूं हो? कै बंदे की सकल ही अैसी है
किसी रोनी–सूरतवालेको देखकर अेक आदमीने पूछा–मियाँ रोते क्यों?
तो कहा–बंदेकी सूरत ही अैसी है।
जो मनहूस और रोनी सूरत बनाये रहे उके लिअे।
481. मिजैजीरी दोड़ मसीज ताणी
मियांकी दौड़ मसजिद तक
जिस आदमीमें थोड़ी ही सामथ्र्य हो उसके लिअे।
482. मियोजी जिलमरा गांडू
मियांजी जन्मके डरपोक
डरपोक या कमजोर आदमी के लिअे।
483. मियोंजी मर पण टांग ऊँची रही
मियांजी मरे पर टांग ऊँची ही रही
अन्त तक अपना हठ रखना।
484. मीठाखाऊ मंद–कमाऊ
मीठा खानेवाला और थोड़ाकमानेवाला
जो कमाता नहीं और मौज करना चाहता है उसके लिअे।
485. मीठी छुरी जहरसूं भरी
कपटीके लिअे।
486. मीठाबोला लोक नै कड़वी–वोली मां
मीठा बोलनेवाले लोग और कडुवा बोलनेवाली माता
1. कुपथमें जानेपर लोग तो उत्साहित करते हैं पर माता फटकारती है।
487. मीठी रोटी तोड़ै जठीनै ही मीठी
मीठी रोटीको जिधरसे तोड़ो उधर ही मीठी होगी
सज्जन सब प्रकार से भले होते हैं
कोई काम जो सभी प्रकार से लाभदायक हो।
488. मीठी वाणी दगाबाजरी निसाणी
मीठा बोलना यह दगाबाजका लक्षण है
दगाबाज मीठी–मीठी बातें करके अपने फंदेमें फँसता है।
489. मीठैरै लालच अैंठो खाव़ै
मीठेके लालचसे जूठा खाता है
1. जिा स्वादके लिअे बुरा काम करता है
2. स्वार्थ के