337 ओछा बोल ठाकुरजी ने छाजै
अभिमान भरी अथवा अपमान भरी बात प्रभु को अच्छी नहीं लगती है
338 ओछी गरदन दगैबाज
छोटी गरदन वाला दगाबाज होता है।
339 ओछी पूंजी धणी नै खाय
थोड़ी पूंजी मालिक को खाती है
थोड़ी पूंजी से दुकानदारी या व्यापार में हानि होती है।
340 ओठियै नै पोठियो भोळायो
गाड़ीवाले ने ऊँटवाले को काम सौंप दिया
अेक का दूसरे को और दूसरे का तीसरे को काम करने के लियेकहने वाले के लिअे।
341 ओठो हो ओखर हिलग्यो
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342 ओधार पोधार, थारै घरे सिधार
उधार पुधार मांगता है. तो तेरे घर जा
उधार व्यवहार नहीं करना चाहिए।
343 ओनामासी धम, बाप पढा न हम
ओनामासी धम, निरक्षरों के लिअे, बाप पढ़े न हम ओनामासी धम
नम: सिद्ध का अपभ्रंश है।
344 ओ भौ मीठो तो आगलो कैण दीठो?
यह भव सुखी तो, अगला भव किसने देखा है?
इस लोक में सुखसे रहना चाहिए। अगले लोक की पर्वाह नहीं करनाचाहिए।
मि.– यावज्जीवेत् सुखी जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनम् कुत:।। –चार्वाक