251 ऊँताव़ळांरी देव़ळाँ हुव़ै, धीरां रा गांव बसै
जल्दी करनेवालों के पीछे देहरियां बनती हैं, धैर्य रखने वालों के पीछे
गांव बसते हैं देवळी–पत्थरका स्मारक जिसपर मूर्ति बनी होती है
जल्दी करनेसे काम अधूरा होता है या ठीक नहीं होता, धीरज से काम
अच्छा बनता है और स्थायी रहता है।

252 ऊँतावला सो बावळा
जल्दबाज बावला होता है।

253 ऊँतावला सो बावळा, धीरा सो गंभीर
जल्दी में किया काम पागलपन जैसा होता है, धीरज का काम स्थायी
रहता है। जल्दबाजी की ​िंनंदा और धैर्य की प्रशंसा।
मि.– ;1द्ध । ीेंजल उंद दमअमत ूंदजे नेम
;2द्ध भ्ेंजम उंामे ूेंजमण्

254 ऊँतावला सौ बार पाछो आव़
जल्दबाज सौ बार वापिस आता है जल्दी के मारे प्रत्येक बार
कोई–न–कोई काम रह जाता है या कोई–न–कोई चीज भूल जाता है।
जल्दबाजी की निंदा।
मि.– ज्ीम उवतम ीेंजमए जीम ूवतेम ेचममकण्

255ऊकरड़ी पर किसो आंबो को हुव़ैनी
देखो ऊपर कहावत अकूरड़ीपर इ.।

256.ऊकरड़ी पर सूव़ै महलां रा सपना आव़ै
देखो ऊपर कहावत अकूरड़ीपर इ.।

257 ऊकरड़ी वधतां कांइ बार लागै
देखो ऊपर कहावत अकूरड़ीपर इ.।

258 ऊकळतै में थोड़ो ही ऊरणो है
उबलते में थोड़े ही डालना है।
बहुत जल्दी नहीं है।

259 ऊगतां ही को तप्यो नी जको आथमतां कांई तपसी?
उगते ही नहीं तपा वह अस्त होते क्या तपेगा?
जो बचपन में ही प्रतापी नहीं हुआ वह बुढ़ापे में क्या होगा।
जो आरंभ में ही बड़ा या अच्छा नहीं हुआ वह बाद में क्या होगा।

260 ऊगसी जको आथमसी
उगेगा वह अस्त होगा।
उति के बाद अवनति आती ही है।

261 ऊगा हूर भागा भूर
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...................................

262 ऊगो’र पूगो
उदय हुआ और अस्त को पहुँचा।
शीतकाल के दिन के लिअे।

263 ऊजड़ गांव में अेरंडियो रूंख
ऊजड़ गांव में अेरंड ही पेड़ गिना जाता है।
विशेष योग्यता वाले व्यक्तियों के अभाव में थोड़ी योग्यतावाले भी आदर
पाते है।
मि.–निरस्तपादपे देशे अेरंडोपिद्र मायते।

264 ऊगतो सूरज तपै
उगता हुआ सूर्य तपता है।
बचपन जो प्रतिभा दिखाते हैं वही प्रतिभावान् हैं।

265 ऊजलो–ऊजलो ही दूध को हुव़ैनी
उजला–उजला सभी दूध नहीं होता।
ऊपर से अच्छे दिखाई देनेवाले सभी पदार्थ वास्तव में अच्छे हो यहबात नहीं होती।
मि.–म्अमतलजीपदह जींज रनजमे पे दवज हवसकण्

266 ऊधो का लेणा न माधोका देणा
स्वाधीन मनुष्य जिसे किसी का लेना–देना नहीं।

267 ऊधो का लेणा न माधो का देणा मगन रहणा
किसी से कोई लेनदेन या व्यवहार नहीं रखने वाला बेपरवाह और सुखीरहता है।

268 ऊपर माळा, मांय कुदाळा

269 ऊपर हाथ में माला, भीतर कुदाली
ऊपर से सज्जन, भीतर हृदय में दुष्ट।

270 ऊभां खेजड़ां बे थोड़ा ही पड़ै
खड़े हुए खेजड़ों की लकड़ी में छेद थोड़े ही बनाये जा सकते है पहले उन्हें काटना होगा।
जल्दीमें कोई काम नहीं हो सकता।

271 ऊभाँ पगां री सगाई है
खड़े पैरों की सगाई है।
खड़े रहकर सामने काम करवाने से तुरंत हो जाता है, नहीं तो हो भीसकता है और नहीं भी हो सकता।

272 ऊभो मूतै सूतो खाय, जिणरो दालद कदे न जाय
जो खड़ा मूतता है और सोता हुआ खाता है उसका दरिद्र कभी नहीं जाता।
खड़े–खड़े मूतना और सोते–सोते खाना बुरा है।

273 ऊँखली में माथो दियो पछै घावांरी कांई गिणती।
ओखली में सिर दिया फिर चोटों की क्या गिनती करना।

274 ऊँखली में सिर घाल्यो पछै मूसळरो कांई डर?
ओखली में सिर डाला पीछे मूसल की चोटों का क्या डर।
जब किसी काम में हाथ डाल दिया तो फि़र विघ्न बाधा या कष्टों कीक्या परवाह करना।

275 ऊंघती नै बिछाव़णो लाधग्यो।
ऊॅंघती हुई को बिछौना मिल गया।

276 ऊंघती नै मांचो लाध्यो
ऊंघती हुई को पलंग मिल गया।
1 जो बात चाहते हों वही हो जाना। इष्ट कार्य करते समयअनुकूल साधन मिल जाना।
2 काम करना नहीं चाहता हो उसे अनुकूल बहाना मिल जाना।

277 ऊंचा चढ–चढ देखो घर–घर ओ ही लेखो
ऊंचे चढ़ चढ़कर देखलो घर–घर यही हिसाब मिलेगा।
1 सब जगह यही हाल है।

2 सुख–दुख सबको भोगना पड़ता है।

278 ऊंट किसी घड़ बैसे
देखें, ऊंट किस करवट बैठता है?
देखें, आगे चलकर क्या नतीजा होता है या कैसी परिस्थिति खड़ी होतीहै।

279 ऊंट कूदै ही कोनी, बोरा पहली ही कूदण लाग ज्याव़ै
ऊंट कूदता नहीं, बोरे उसके पहले ही कूदने लगते हैं।
सम्बन्धित व्यक्तियों की मौजूदगी में असम्बन्धित व्यक्तियाें का पंचायतीकरना ठीक नहीं होता।

280 ऊंट खुड़ाव़ै, गधो डांभीजै
ऊंट खुड़ाता है, गधा दागा जाता है।
अपराध कोई करे, फल कोई भोगे।
मि.– और करै अपराध कोउ और पाव फल भोग
अति विचित्र भगवंत–गति को जग जानै जोग।

281 ऊंट खुड़ावै जद गधैरै डाम देव़ै
ऊंट लंगड़ाता है, तब गधे के दाग देते हैं।
अपराध कोई करे, दंड किसी को दिया जाय।
ऊपरवाली कहावत देखो

282 ऊंट चढ़ी गुड़ खाय
ऊंट पर चढ़ी हुई गुड़ खाती है।
.............................................

283 ऊंट चढैनै कुत्तो खाय
भाग्य बुरा होता है तब ऊंट पर चढ़े हुए को कुत्ता खा जाता है।
ऊंट पर चढ़े हुअे व्यक्ति तक कुत्ते का पहंुचना असंभव है अत: असंभवबात।
भाग्य खोटा होने पर असंभव बात भी हो जाती है।
मि.–भा बिधना प्रतिकूल जबै तब ऊंट चढ़े पर कूकर काटत।

284 ऊंट चढै नै दो दीसै–
ऊंट पर चढ़ै हुअे को दो दिखायी देते हैं।
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285 ऊंट तो अरड़ांव़ता हीज लादीजै
ऊंट तो अर्राते ही लादे जाते हैं।
जब मनुष्य काम न करे और उससे जबर्दस्ती करवाया जाय।

286 ऊंट नै गुळ पाणी सूं कांई हुव़ै?
ऊंट को गुड़–पानी से क्या हो!
अधिक खानेवाले के लिअे।

287 ऊंटनै उठतां ही ढाण नहीं घातणो
ऊंट को उठते ही तेज नहीं चलाना।
किसी काम के आरम्भ में ही अधिक तेजी नहीं दिखाना क्योंकि यहतेजी बराबर नहीं रह सकती और बाद में काम ढीला पड़ने लगता है।

288 ऊंट फिटकड़ी दियां ही अरळावै, गुड़ दियां ही अरळावै
ऊंट फिटकरी देते भी अरलाता है और गुड़ देते भी अरलाता है।
दुख और सुख दोनो ही में असंतुष्ट रहनेवाले के लिअे।

289 ऊंट मरै जद मारव़ड़ सामो जोव़ै
ऊंट मरता है तब मारवाड़ की ओर देखता है।
क्योंकि वह उसकी मातृ–भूमि है।

290 ऊंट रे ऊंट तेरी कोणसी कल सीधी?
अरे ऊंट, तेरी कौनसी कल सीधी है ऊंटकी सब कलें बांकी होती हैं।
सब प्रकार अवगुणी मनुष्य के लिअे।

291 ऊंट रै पेट में जीरै रो बधार
ऊंटके पेट में जीरे का बघार।
बहुत खाने वाले को थोड़ी चीज देना।

292 ऊंट रो पाद जमी रो न आसमान रो
ऊंट का पाद न जमीन का न आसमान का।
1 जो किसी के काम का न हो उसके लिअे।

2 निकम्मे आदमी के अधूरे काम के लिअे।

293 ऊंट लदण सूं गयो तो कांई पदणसूं ही गयो?
ऊंट लदने से गया तो क्या पादने से गया?
पूर्ण अधिकार छिन गया तो क्या साधारण अधिकार भी न रह गया?
मि.–चोर चोरी सुं तो को गयो नी

294 ऊंट लांबो तो पूंछ छोटी
ऊंट लंबा पूंछ छोटी।
1 सब बातें मनचाही नहीं होती।

2 कुछ कुछ कमी रह गयी।

295 ऊंटां रै कण छपरा छाया हा?
ऊंटों के किसने छप्पर छाये थे? वे तो खुलेमें ही रहते आये हैं।
व्स्तु के बिना काम चलाने वाले के लिअे।

296 ऊंतावला सो बाव़ला