1. पईसांरी खीर है
पैसां की खीर है
पैसे पास हों तभी काम बनता है; पैसे होनेसे ही अच्छी चीज मिलती है।
2. पईसै बिना बुध बापड़ी
पैसे बिना बुद्धि बेचारी है
पैसा पास न हो तो बुद्धि कुछ काम नहीं देती।
3. पईसैरी खातर दिल्ली जाय परो
पैसे के लिअे दिल्ली चला जाय
1. पैसे के लिअे मनुष्य दूर–दूर पहुंच जाता है।
2. कंजूस पर, जो अेक पैसे के लिअे दिल्ली जितनी दूर जगहको चला गया।
4. पईसैरी डोकरी, टको सिर–मुंडाई
पैसेके बुढि़या, टका सिर–मुडाई का
थोड़े लाभके लिअे अधिक खर्च करना पड़े तब कही जाती है।
5. पईसैरी भाजी, टकैरो बघार
पैसे की भाजी, टकेका बघार।
(ऊपर की कहावत देखो)
6. पईसैरी हांडी गयी, कुत्तैरी जात तो जाणी
पैसे की हंडि़या गयी तो पर्वाह नहीं, कुत्तेकी जाति(के स्वभाव) को तो जान लिया।
थोड़ी हानि तो हुई पर असलियत तो मालूम हो गयी। फिर वैसा धोखा नहीं खायेगें। थोड़ी
हानि उठाकर भारी भय से बच जाना।
7. पईसैरी हांडी पण बजा‘र लेवै़
पैसेकी हांड़ी भी बजाकर लेते हैं
चाहे थोड़े मोलका ही माल चाीदना हो पर उसको खूब देखभालकर लेना चाहिअे। छोटे कामको
भी खूब विचारपूर्वक करना चाहिअे।
8. पईसैसूं पईसो हुव़ै (पाठान्तर वधै)
पैसेसे पैसा होता है
पैसा पास हो तो उसके क्षरा अधिक धन कमाया जा सकता है।
मिलाओ– धन–सूं धन वधै।
9. पईसो तो जहर खाव़णनै ही कोनी
पैसा तो जहर खाने के लिअे भी नहीं है
जब हाथ बहुत तंग हो।
10. पईसो हाथरो मैल है
पैसा हाथका मैल है
जैसे हाथके मैलको उतारकर फेंक देते हैं वैसे ही पैसेका भी दान करते रहना चाहिअे।
हाथका मैल जैसे जमा होता रहता है वैसे ही पैसा भी आता ही रहता है अत: उसके खर्चमें
कंजूसी नहीं करनी चाहिअे।
11. पख–दाळदी है, जिलम–दाळदी कांय नी
पक्षका दरिद्री है, जन्मका दरिद्री नहीं
मन्दभागी तो है पर अधिक नहीं।
12. पग बिन कटै न पंथ
पैरोंसे चले बिना मार्ग नहीं कटता
13. पगमें चक्कर है
पैरमें चक्र है
दिनरात इधर–उधर आता जाता रहता है। व्यर्थ घूमनेवाले पर।
14. पगरै लागी अर पाटी बांधै माथैरै
पैरके लगी और पी बांधता है माथेके
असंगत काम करना। कहीं करनेका काम कहीं करना। बेवकूफी का काम करना।
15. पगां बळती को दीसै नी, डूंगर बळती दीस जाय
पैरोंके पास जलती आग नहीं दिखायी देती, दूर पहाड़ पर जलती हुई दिखायी दे जाती है।
अपने दोष नहीं दिखायी देते, दूसरोंके दिखायी पड़ जाते हैं।
16. पगांरै किसी महंदी लागियोड़ी है
पैरोंके कौनसी मंहदी लगी हुई है (कि चल नहीं सकते)
1. जब कोई व्यक्ति पैदल चलने में आनाकानी करता है तब
2. जब कोई व्यक्ति काम नहीं करता है तब।
17. (इयांरै) पगांरी बांध्योड़ो हाथांसूं को खुलैनी
(इनके) पैरोंसे बांधा हुआ हाथोंसे नहीं खुलता (से जिसे पैरोंसे बांध दें उसे दूसरे
लोग हाथें की सहायता से भी नहीं खोल सकते)
किसी चतुर या सबल व्यक्ति पर।
18. (इयांरै) पगांसूं दियोड़ी दांतांसूं को खुलैनी
(इनकी) पैरोंसे बांधी हुई दांतो से नहीं खुलती
(ऊपरवाली कहावत देखो)
19. पछै घाड़ो दौड़ै क घोड़ी दौड़ै
पीछे न जाने घोड़ा दौड़ै या घोड़ी दौड़ै
पीछे न जाने क्या हो। पीछे न जाने क्या विघ्न उपस्थित हो जाय।
20. पछै घोड़ो दौड़ो‘र घोड़ी दौड़ो
पीछे चाहे घोड़ा दोड़े और चाहे घोड़ी दौड़े
पीछे चाहे जो हो।
21. पड़ गया खल्ला, उड गयी खेह
फुल फड़क–सी हो गयी देह
जूते पड़ गये, शरीर परकी धूल उड़ गयी और शरीर ताजे फूलके समान (निर्मल और हलका) हो
गया।
1. उस व्यक्ति पर जो दण्ड पानेसे मार्ग पर आता है।
2. निर्लज्ज व्यक्ति पर, जो दण्ड पाने पर भी लज्जित नहीं होता, उलटे बातें बनाता
है।
22. पड़तां–पड़ता ही असव़ार हुया करै
गिरते–गिरते ही सवार होते हैं (सवारी सीखने के लिअे पहले कई बार गिरना पड़ता है तब
होशियारी आती है)
आदमी गतियां करता करता ही होशियार होता है। आदमी कष्ट उठा उठाकर ही निपुण होता है।
23. पड़व़ा पाटी फोड़ वतरणो
प्रतिपदाको पी और वतरना (स्लेट और पेंंसिल) फोड़ दो
प्राचीन प्रथाकी पाठशालाओं के छात्रों के छात्रों को उक्ति, जिनमें प्रतिपदाको छुी
रहती है और बालकों को पढ़ना नहीं पड़ता।
24. पड़व़ा पांटी भांगणो, बीज पाटी सांभणी
प्रतिपदाको स्लेट फोड़ देना और द्वितीयको संभाल लेना
पाठशालाओं के छात्रोंकी उक्ति।
25. पड़ै पासो तो जीतै गंव़ार
पासा अनुकूल पड़े तो गंवार भी जीत जाय (चौसर के खसेलसमें सब दारमदार पाा पड़ने पर
ही है, उसमें और चतुरताकी आवश्यकता नहीं होती)
भाग्य अनुकूल हो तो गंवार भी काम बना लेता है, नहीं तो अक्लमंदकी भी कुछ नहीं चलती।
मिलाओ– पासा पड़े अनाड़ी जीतै।
26. पड़ा तो कांई हुयो, टांग तो ऊपर ही है
(कुयतीमें ) गिरे तो क्या हुआ, टांग तो ऊपर ही है
जो पराजित हो जाने पर भी पराजय स्वीकार नहीं करता उस पर।
27. पड़यो पण टांग तो ऊंची ही राखी
गिरा, पर टांग तो ऊपर ही रखी।
(ऊपर वाली कहावत देखो)
28. पढै फारसी बेचै तेल, अै देखों कुदरतरा खेल
पढै फारसी बेचै तेल, ये देखो कुदरतके खेल
(1) जब पढ़ा लिखा आदमी छोटा काम करे तब व्यंगमें।
(2) भाग्यके कारण पढ़े–लिखे भी मारे–मारे फिरते हैं।
29. पढ़े फारसी बेचै आटो, ओ देखो किसमतरो घाटा
पढ़ फारसी बेचै आटा, यह देखो किसमतका घाटा।
(ऊपरवाली कहावत देखो)
30. पढ़ो, बेटा! फारसी, जोरू जूता मारसी
बेटा! फारसी पढ़ो और जोरूके जूते खाओ
फारसी पढ़नेवालों के प्रति हंसीमें।
31. पढया पण गुण्या कोनी
पढे पर गुने नहीं
गुनने के बिना पढ़ना व्यर्थ है।
32. पढोड़ैरे च्यार आंख्यां हुव़ै
पढ़े–लिखेके चार आंखें होती हैं
विद्याकी प्रशंसा।
33. पतळी छाछ, भळै पाणी पडो
अेक तो छाछ पतली थी, फिर पानी पड़ गया।
अेक दोषमें दूसरा दोष और उत्पन्न हो जाना।
34. पतळी देख’र भिड़नो नहीं, मातो देख’र डरणो नहीं
1. किसीको पतला देखकर भिड़ नहीं जाना चाहिअे और न मोटा देखकर डर जाना चाहिअे
(कभी–कभी पतला व्यक्ति भी बलवान, और मोटा व्यक्ति भी कमजोर होता है)
2. बाहरी रूपसे ही बल आदिका अनुमान नहंी कर लेना चाहिअे।
35. पथ्थर पूज्यां हर मिलै तो हूं पूजूं पा’ड़
पत्थर पूजनेसे भगवान मिल जायं तो मैं पहाड़को पूजने लगूं
1. मरमात्मा शुद्ध दय होनेसे मिलता है, मूर्तिपूजा आदि दिखावोंसे नहीं।
2. मूर्ति–पूजा पर आक्षेप।
मि–1. पत्थर पूजे हर मिलैं तो मैं पूजूं पहार।
2. माला फेरां हर मिलै तो हूं फेरूं झाड़।
36. परणीजै जिको गायीजै
जिसका विवाह होता है उसीके गीत गाये जाते हैं
जिसका प्रसंग होता है उसीका बखान होता है।
37. परणीज्या नहीं तो जान तो गया हा
ब्याहे नहीं गये तो बरातमें तो गये थे
काम स्वयं नहीं किया तो क्या हुआ, किया जाता हुआ देखा तो है (जब कोई किसीसे कहे कि
तुम क्या जानो, तुमने काम कभी किया तो है ही नहीं, तब वह इस प्रकार उत्तर देता है)
38. परमात्मा गिंजैनै नख को दिया नी
परमात्माने गंजेको नाखून नहीं देये (नहीं तो वह अपना ही सिर खुजा डालता)
परमात्माने नीच या दुष्ट व्यक्तिको बुराई करनेके साधन नहीं दिये, नहीं तो वह अपना
और पराया सबका नाश कर डालता।
39. परमात्मा घण–देव़ो है
परमात्मा अधिक देनेवाला है
परमात्मा जब देता है तो, चाहे सुख हो या दु:ख, अधिक ही देता है।
40. परायी गांडमें मूसळ देव़ै जरां सूई सो लागै
परायी गांड़में मूसल देता है तो सुई सा लगता है
हम दूसरों की बड़ी हानि करते हैं तो भी वह हमें थोड़ी ही जान पड़ती है और अपनी
थोड़ी हानि होती है तो भी बड़ी भारी दीख पड़ती है
मि.–पराया सिर पंसेरी बराबर।
41. परायी थाळी में घी घणो दीसै
परायी थाली में घी ज्यादा दिखायी पड़ता है
दूसरे का लाभ या धन या सुख सदा अपनेसे अधिक जान पड़ता है।
42. परायी पीड़ परदेस बराबर
दूसरेका दुख परदेशके बराबर
परायी पीड़का घ्यान किसीको नहीं होता।
43. पराधीन सपनै सुख नाहीं
पराधीनको स्वप्नमें भी सुख नहीं
पराधीनताकी, तथा नौकरी आदि पराधीनतावाले पेशोंकी, निंदा।
44. पराया घर ऊनै पाणीसूं बाळ
पराये घरोंको गर्म पानीसे जलाता है
किसीके कुकमौकी प्रशंसा करके उसे वैसा करनेके लिअे प्रोत्साहित करना।
45. पराया पूत कमा’र थोड़ा ही दै
पराये पूत कमाके थेड़ेही देते हैं (अर्थात नहीं देते)
1. दूसरोंसे काम करानेकी आशा नहीं करनी चाहिअे।
2. बुढ़ापे में अपनी संतान ही कमाकर खिलाती है।
3. गोद लिये हुअे पुत्र पर।
46. परायै कांसै घी घणो लखयीजै
परायी थालीमें घी अधिक दिखायी पड़ता है
(देखो ऊपर कहावत नं. 41)
47. परायै दुख दूबळा थोड़ा, परायै सुख दूबळा घणा
पराये दुखसे दुबले होने वाले लोग थोड़े हैं, पर पराये सुखसे दुबले होने वाले बहुत
हैं
पराये दुखकी चिन्ता करनेवाले थोड़े, पर पराये सुखसे जलनेवाले बहुत, मिलते हैं।
48. परायै धन माथै लिछमीनाथ
पराये धन पर लक्ष्मीनाथ
दूसरेके धनके बल पर, या दूसरेके धनको पाकर, दातारगी दिखानेवाले पर।
मिलाओ– माले मुफ्त दिले बेरहम।
49. परायो माथो लाल देख’र आपरो माथो थोड़ो ही फोड़ी जै
पराया माथा लाल देखकर अपना माथा थोड़े ही फोड़ा जाता है (ताकि वह भी लाल हो जाय)
हानि उठाकर दूसरोंकी बराबरी नहीं की जा सकती ।
50. पहरणनै तो घाघरो ही कोनी, नांव़ सिणगारी
पहननेको तो लहंगा तक नहीं, और नाम है सिनगरी (श्रृंगार की हुई )
जब नामके अनुसार गुण न हो तब।
51. पहली आव़ै जकैरी गोरी गाय
जो पहले आवेगा उसकी गोरी गाय होगी
1. दौड़के खेलमें दौड़नेवालोंको उत्साहित करनेके लिअे कही जाती है
2. जो पहले पहुंचता है वही लाभ उठाता है।
52. पहली घरमें, पछै मसीतमें
पहले घरमें, फिर मसजिदमें ( दिया जलाया जाता है )
1. पहले घरकी जरूरतें पूरी करके तब मन्दिर आदिमें दान देना चाहिअे।
घरवालोंका ध्यान रखकर परोपकार करना चाहिअे।
2. कोई काम घरमें करके पीछे बाहर करना चाहिअे। सुधार पहले घरका या अपना करना चाहिअे
पीछे दूसरों का।
मिलाओ– ब्ींतपजल इमहपदे ंज ीवउमण्
53. पहली धाप’र हंसलै पछै बात करै
पहले पेट भरकर हंस ले, फिर बात करना
जो बात करते–करते हंसता जाय उसके प्रति।
54. पहली पेट, पछै सेठ
जिस नौकरीसे पेट नहीं भरता वह नौकरी नहीं की जा सकती।
55. पहली पेट पूजा, पछै काम दूजा
पहले पेट पूजा और बादमें दूसरे काम ( करना चाहिअे )
1. सब काम छोड़कर भोजन करना चाहिअे।
2. पेट भरने पर ही दूसरे काम हो सकते हैं।
मिलाओ– शतं विहाय भोक्तव्यं।
56. पहली रहती यूं, तो तबलो जाता क्यूं ?
पहले ही यों रहती तो तबला क्यों जाता ?
पहले ही सावधान रहे तो फिर हानि नहीं होती।
57. पहली बिसमिल्ला में ही खोट
पहले बिसमिल्लामें ही गलती
जब कामके शुरूमें ही भूल हो तब।
मि0–1. बिसमिल्ला ही गलत
2. श्री दाता धनकैमें ही खोट
3. श्रीगणेशाय नम: में ही डबको।
58. पहली सोच–विचार कर पीछै कीजै कार
पहले सोच–समझकर बादमें काम करना चाहिअे।
59. पहलो सुख नीरोगी काया
शरीरका नीरोग होना सबसे पहला सुख है
स्वास्थ्यकी प्रशंसा।
मि0– 1. शरीरमाद्यं खलु धर्म–साधनम्
2. धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
3. भ्मंसजी पे ूमंसजी
60. पंच परमेश्वर
पंच परमेश्वर के समान है।
61. पंचोंमें परमेश्वरो वास़ है
पंचोंमें परमेश्वरका निवास है।
मि0– 1. पंच जहां परमेश्वर।
2. पंचनके मुख है परमेश्वर।
62. पंसेरी में पांच सेररी भूल
पंसेरीमें पांच सेरकी भूल
बहुत बड़ी भूल।
63. पंसेरी में पांच सेररो धोखो
पंसेरी में पांच सेरकी गड़बड़ ( या भूल)
(ऊपरकी कहावत देखो)
64. पाका पान तो खिरणरा ही है
पके हुअे पत्ते तो टूटनेको ही हैं
बूढ़े आदमी मरनेकी ही हैं। बूढ़ोंके मरनेकी ही अधिक संभावना होती है।
65. पाकै घड़ैरै कानों का लागै नी
पके घड़ेके जोड़ नहीं लगता
पकी उमर में सुधार नहीं हो सकता।
66. पागड़ी गयी आगड़ी, सिर सलामत चायीजै
पगड़ी गयी दूर, सिर सलामत चाहिअे
1. थोड़ी हानि हुई तो कुछ पर्वाह नहीं, बच तो गये।
2. लज्जा गयी तो कोई पर्वाह नहीं, सिर तो बच गया (निर्लज्जकी उक्ति)
67. पागड़ी गयी भैंसरी गांडमें
पागड़ी गयी भैंसकी गांड में
रिश्वतखोर हाकिमके लिअे जो दोनों ओरसे रिश्वत लेता है और ज्यादा देनेवालेको जिताता
है।
टिप्पणी – इस पर अेक कहानी है– अेक रिश्वत खानेवाला हाकिम था। अेक पक्षने उसकी
रिश्वतमें पगड़ी भेंट की। दूसरे पक्षको जब यह बात मालूम हुई तो वह भैंस भेंट कर
आया। हाकिमने भैंस देनेवालेके अनुकूल फैसला दिया। तब पहले पक्षवाला हाकिमके पास गया
और उसने कहा – मेरी पगड़ी का क्या हुआ? हाकिमने उत्तर दिया– पगड़ी गयी भैंसकी गांड
में।
68. पाड़ोसीरै व़रससी तो छांटां अइैई पड़सी
पड़ोसीके यहां मेह बरसेगा तो बूंदें यहां भी गिरेंगी
पड़ोसी या मित्रको लाभ होगा तो कुछ लाभ हमें भी होगा।
69. पड़़ोसण छड़ै खीच, धमको पड़ै म्हारै सीस
पड़ोसिन खिचड़ा छड़ती है, धमाका मेरे सिर पड़ता है
टि0– छड़नाऊखलमें डालकर मूसलसे कूटना।
70. पाणी आडी पाळ बांधै
पानीके सामने पार बांधता है
पहलेसे उपाय करता है।
पहलेसे बहानेबाजी करता है।
71. पाणी आडी पाळ पहली बांधै
पानी के आगे पार पहले बांधता है
काम न करना पड़े इसके लिअे पहलेसे बहानेबाजी करता है।
72. पाणीपर पथ्थर तिरै
पानी पर पथ्थर तैरते हैं
असंभव काम संभव होता है।
73. पाणी पहलां पाळ बांधै
पानी आनेके पहले पार बांधता है
( देखो ऊपर कहावत नं. 71)
74. पाणी पाणीरी ढाळ वैव़ै
पानी अपनी ढाल पर बहता है
काम अपने रास्तेसे होता है।
75. पाणी पीजै छाण, गुर कीजै जाण (पाठान्तर–सगो, सगपण)
पानी छानकर पीना चाहिअे, गुरु (पाठान्तर–समधी, संबंध) परीक्षा करके करना चाहिअे।
76. पाणी पीजै छाणियो, कीजै मनरो जाणियो
पानी छानकर पीना चाहिअे, काम मनका जाना हुआ करना चाहिअे।
77. पाणी पीणो छाणियो, काम करणो मनरो जाणियो
(ऊपरवाली कहावत देखिये)
78. पाणी पी’र जात नहीं बूझणी
पानी पीकर जाति नहीं पूछनी चाहिअे।
काम करनेके बाद उसका विचार नहीं करना चाहिअे।
79. पाणी पी’र मूत तोलै
पानी पीकर मूतको तोलता है
बड़े भारी कंजूसके लिअे।
80. पाणी पीव़ै छाण, जीव़ मार जाण
जो पानी को छानकर पीते हैं वे जानबूझकर जीवोंको माते हैं
जैनियों पर, जो जीव–हत्यासे बहुत डरते हैं।
81. पाणीमें मीन पियासी
पानीमें रहकर भी मछली प्यासी है
सब कुछ होते हुअे भी उसका लाभ न उठावे, या उठा पावे, तब।
82. पाणीरी पीक दुमारमें देखो
पानीकी चाह पानीका अकाल पड़नेपर देखी जाती है ( तभी पानीका मूल्य लोग समझते हैं )
वस्तुके अभाव में उसका मूल्य मालूम होता है।
83. पाद, छींक, डकार–तीनूं गुणाकार
पाद, छींक, और डकार ये तीनों गुणकारी होते हैं।
84. पादण घर कस्तूरी किता’क दिन ?
पादनेवाली के घर कस्तूरी कितने दिन ( काम दे ) ?
दुष्ट पर सदुपदेश का प्रभाव अधिक नहीं रह सकता।
यह कहावत कबीर के इस पद की प्रथम पंक्ति है –
पाणी में मीन पियासी।
मोहि सुण–सुण आवै हांसी।
घरमें वसत धरी नहिं सूझै, बाहर खोजन जासी
म्रिगकी नाभि मांहि कस्तूरी, बन–बन फिरत निरासी
आतम–ग्यान बिना सब सूना, क्या मथुरा, क्या कासी
कहै, कबीर, सुणो भाइ साथो, सहज मिलै अविनासी
85. पादणरी पोंच नहीं, गोळं दाजां में चेरो करो
शक्ति पादने की भी नहीं और कहता है कि गोलंदाजों में नौकर रख लो
थोड़ी शक्तिवाला बहुत बड़ा काम हाथमें लेना चाहे तब।
86. पाद्यां ही सर ज्याय तो झाड़ै कुण जाय?
पादनेसे ही काम बन जाय तो पाखाने कौन जावे?
साणारण प्रयत्न से काम चल जाय तो बड़ा परिश्रम कौन करे?
87. पादो, अे चिडयां! साव़ण आयो
हे चिडि़यों! पादो, सावन आ गया
जब किसी अयोग्य व्यक्ति की मनचाही हो जाय तब व्यंगमें।
88. पापड़ खा’र पाद्मणी हुई है
पापड़ खाकर पद्मिनी बनी है।
थोड़ा–सा थोथा दिखावा करके गुणवान बनने का आडंबर करना।
89. पापड़ तो घणा ही पीटया हा (पाठान्तर–पोया हा, बेल्या हा)
पापड़ तो बहुत–से पीटे थे (पीये थे, बेले थे)
प्रयत्न तो बहुत तरहके किये। तरह–तरहके काम किये पर किसीमें सफलता नहीं मिली।
90. पाप फूटै पण फेटै
पाप फूटता है और फूटता है
1. पाप अवश्य प्रकट होता है
2. पापका फल अवश्य भोगना पड़ता है।
मिलाओ – 1. पाप पहाड़ पर चढ़के पुकारै
2. पाप उभरै पर उभरै।
3. डनतकमत पे वनजण्
91. पपीरो धन परळै जाय
पापीका धन प्रलयको जाता है।
पापकी कमाई व्यर्थ या बुरे कामोें में नष्ट होती है।
92. पापीरै मनमें पाप वसै
पापी के मनमें पाप ही बसता है
1. पापी को पापके सिवाय और कुछ नहीं सुझता।
2. पापी सबाको पापी समझता है। कपटी सबको कपटी समझता है।
93. पारकी आस, सदा निरास
पराई आशा रखनेसे सदा निराश होना पड़ता है
मिलाओ– ैमसि.ीमसच पे जीम इमेज ीमसचण्
94. पारकै पईसै परमानन्द, लालकंव़रजी करै अनंद
पराया पैसा मिलने से बड़ा आनन्द है, लालकुंवरजी आनन्द करते हैं
(मौज उड़ाते हैं)
1. पराये धन पर आनंद मनानेवालेके लिअे।
2. पराये धन पर आनंद मनाना सहज है।
95. पारको घर, जठै थूकणरो ही डर
पराये घरमें थूकनेका भी डर लगता है
पराये घरमें स्वाधीनतासे नहीं रहा जा सकता।
96. पारसनाथसूं चक्की भली, पीस खाय संसार
पाश्र्वनाथसे चक्की ही अच्छी जिससे संसार खानेके लिअे आटा तो पीस लेता है।
मूर्ति–पूजा पर कटाक्ष।
मि– 1. परसनाथसे चाकी भली, आटा देवै पीस।
फूड़ नारसे मुरगी भली, जो अंडा देवै बीस।।
2. पाहण पूज्यां हर मिलै, तो मैं पूजंू पहाड़।
तातें या चक्की भली, पीस खाय संसार।।
97. पाली! थारा भाग, धना भगत धाड़ा करै!
हे पाली! धन्य तेरे भाग, जो धना भक्त तुझमेें डाके डालते हैंं!
98. पालीव़ाळी पेम, नकारैआळो नेम
पालीवाला पेम, नकारवाला नेम
जो कभी इनकारका शब्द मुंहसे नहीं निकालता उसपर। पालीमें पेमसिंह नामका सरदार था जो
नकार नहीं करता था।
99. पाळ जकै़रो धरम
जो पालता है उसका धर्म है
1. धर्मका पालन करनेको सब स्वतंत्र हैं, सब कोई धर्म कर सकते हैं।
2. धर्मका पालन करनेवालेको ही धर्मका फल मिलता है।
100. पाव़णा जीमता ही जाय, रांड़ा रोव़ती ही जाय
पाहुने जीमते ही जाते हैं, रांड़ें रोती ही जाती है
लोग विरोध करते रहेंगे और काम होता रहेगा।
101. पाव़णा जीमता ही जासी, रांडां रोव़ती ही रहसी
पाहुने जीमते ही जायेंगें और रांड़े रोती ही रहेंगी
(ऊपर वाली कहावत देखो )
102. पाव़णो प्यारो, पण अेक–दो दिन
पाहुना प्यारा होता है, पर अेक–दो दिन
पाहुना ज्यादा दिन रहे तो फिर अच्छा नहीं लगता।
103. पांच पंच मिल कीजै काज, हारे–जीने नांही लाज
कई–अेक आदमियोंको मिलकर काम करना चाहिअे क्योंकि मिलकर काम करनेसे सफलता मिलती है
और यदि वह न मिले तो किसी अेकके सिर बदनामी नहीं आती।
104. पांचमें तीन उठाऊं और दोमें सीर राखूं
पांचमेंसे तीन उठा लूं और बाकी दो में हिस्सा रखूं
स्वार्थी और चालाक पुरुषके लिअे जो सब प्रकार से स्वार्थ सिद्धि चाहता है।
105. पांचरो, मालक पचासरो गुमास्तो
पांच बरसों का मालिक और पचास बरसों का गुमास्ता
मालिक छोटी उम्रका हो और नौकर बड़ी उम्रका हो तो भी नौकरको मालिककी आज्ञा पालन करनी
पड़ती है।
106. पांचरो लाभ, पनरैरो खरच
पांचका लाभ, पंद्रहका खर्च
आयसे अधिक व्यय।
107. पांच–सातरी लाकड़ी, अेक जणैरो बोझ
पांच या सातकी अेक–अेक लकड़ी मिलने से अेक का भारा पूरा हो जाता है
सबकी थोड़ी–थोड़ी सहायतासे काम बन जाता है।
(नीचे कहावत नं. 111 देखिये )
108. पांचांमें परमेश्वररो वास
पांच आदमियोंमें परमेश्वरका निवास होता है
पांच आदमी मिल जाते हैं तो वे पांचों के बराबर हैं।
109. पांचांमें पंचांरो वास
पांच आदमियोंमें पांचों का निवास होता है
पांच आदमी मिल जाते हैं तो वे पंचों के बराबर है।
110. पांचां मांयसूं तीन उठावणा’र दोमें पांती राखणी
पांचमेंसे तीन उठा लेना और बाकी दो में भी हिस्सा रखना।
(ऊपर कहावत नं. 104 देखिये )
111. पांचांरी लकड़ी अेकरो भारों, पांचांरी लात अेकरो गारो
पांचकी अेक–अेक लकड़ी से अेक आदमी का पूरा भारा तय्यार हो जाता है
और पांचकी लातों से अेक आदमीका गारा (ढेर) हो जाता है
1. कई आदमियों की थोड़ी–थोड़ी सहायतासे सारा काम बन जाता है।
2. कई आदमियों के थोड़ा–थोड़ा सतानेसे अेक आदमी बर्बाद हो जाता है।
112. पांचूं आंगळयां घीमें
पांचों उंगलियां घी में
खूब लाभ ही लाभ है।
113. पांचूं आंगळयां सरीसी को हुव़ै नी
पांचों उंगलियां अेक–सी नहीं होती
सब आदमी (या सब चीजें ) बराबर नहीं होते ।
114. पांडेजी! पगै लागूं, तो कह–कुपासिया
किसीने कहा कि पांड़ेजी! पांव छूता हूं। तो बहरे पांड़ेजी उत्तर देते हैं कि–
कपासिये।
बहरे आदमीके लिअे, जो किसी की बात को ठीक न सुनकर अंदाजेसे उत्तर दे देता है।
115. पांडेजी पिसताव़ैला, झक मार खीचड़ो खाव़ैला
पांडेजी पछतावेंगें और झख मारकर खिचड़ा खायेगें
पाहले बहुत समझानेपर भी कोई काम न करना और अंतमें पछताकर और झख मारकर वही काम करना।
मि0– 1. पांडेजी पछितावेंगे, वही चनेकी खावेंगे।
2. पांड़ेजी पछितावेंगे, सूखे चने चबावेंगे।
116. पिरथी माथै भला–भली है
पृथ्वी पर भले–से–भले हैं
संसारमें अेक–से–अेक बढ़कर व्यक्ति हैं। कोई यह समझे कि मुझसे बढ़कर संसार में कोई
नहीं तो यह उसकी भूल है।
117. पिंडरो मैल ही को देव़ै नी
शरीरका मैल भी नहीं देता
बड़ा भारी लोभी या कंजूस है।
118. पीर बंबर्ची भिस्ती खर
पीर, रसोइया, भिश्ती और गधा (सब अेक में)
1. ब्राणके लिअे जो पूजा जाता है, रसोई बनाता है, पानी पिलाता है और जजमान बाहर
कहीं जाय तो साथ में गधेकी तरह सामान उठाने आदिका काम भी कर लेता है।
2. जैसे व्यक्तिके लिअे, जो अेक साथ कई आदमियों का काम कर सके।
119. पीररै भरोसै धाबलियो ही बाळयो
पीहरके भरोसे धाबलिया भी जला दिया।
भविष्यकी आशा में वर्तमानका नाश कर दिया।
टि0–धाबलियौओढ़नेका अेक मोटा भद्दा वस्त्र।
मिलाओ–गागर कैसे फोडि़यै उनयो देखि पयोद।
120. पीळो–पीळो सगळो सोनो को हुव़ै नी
पीला–पीला सब सोना नहीं होता
बाहर से अच्छी दीखनेवाली सभी वस्तुअें भीतरसे भी अच्छी हों अैसा नहीं होता।
मि.– ।सस जींज हसपजजमते पे दवज हवसकण्
121. पीससी जको पिसाई लेसी
जो पीसेगा वह पिसाई (पीसनेकी उजरत) लेगा।
1. जो काम करेगा वह मजदूरी लेगा (मुफ्त नहीं करेगा)।
2. जो काम करेगा उसीको मजदूरी मिलेगी (दूसरेको नहीं )।
122. पींडारै में छाणाही नीकळै
पिंडारेमें कंडे ही लिकलेगें (और कुछ नहीं निकल सकता )
बुरे आदमीकी प्रत्येक बात बुरी होती है।
123. पींपळांनै पोखो
पींपलके पेड़ोंको पोषण (जल–सिंचन)
जब किसी भोजनभको बड़े समयके पश्चात भोजनका निमंत्रण मिले तब व्यंगमें।
124. पींवतां–पींवतां समंदर ही खूट ज्याय
पीते–पीते समुद्र भी समाप्त हो जाता है
केवल खर्च करते रहने से बहुत बड़ी संपत्ति भी चुक जाती है।
125. पुटियो जाणै आभो म्हारै ही ताण ऊभो है
पुटिया समझता है कि आकाश मेरे ही बल पर ठहरा हुआ है (पुटिया अेक पक्षी का नाम है जो
अपने पैर आकाश की ओर रखता है।
जब कोई (अयोग्य) व्यक्ति समझे कि काम उसके सहारे से ही हो सकता है।
मि.– कुत्तो जाणै गाडी म्हारै ही ताण चालै।
126. पुष्करणा लाल फौज है
पुष्करणे लाल फौज हैं
पुष्करणे ब्राण वीर और साहसिक होते हैं।
127. पुराणो देगचो, कळीरी भड़क
पुराना देगचा, और कलईकी तड़क–भड़क
जब कोई बूढ़ा या बुढि़या बनाव श्रृंगार करे तब हंसीमें कही जाती है।
128. पूछतो–पूछतो दिल्ली जाय परो
पूछता–पूछता (आदमी) दिल्ली पहुंच जाता है
1. जब किसी आदमीसे कहीं जानेके लिअे कहा जाय और वह कहे कि मुझे पता नहीं मालूम तब
कही जाती है।
2. पूछताछ द्वारा प्रयत्न करते रहने से बड़े काममें भी सिद्धि हो जाती है।
(चुपचाप बैठे रहने से कुछ नहीं होता)
129. पूत जाया, हे पदमणी! जटा थोड़ी, जूवं़ा घणी
अरी पद्मिीनी! कैसे पूत जने हैं कि जिनके बाल तो थोड़े हैं और जुंअें बहुत हैं
मैले–कुचैले व्यक्तिके लिअे।
130. पूतरा पग पालणैमें पिछाणीजै
पूतके पैर पालनेमें पहचाने जाते हैं
1. संतान आगे चलकर कैसी होगी इसका अनुमान बचपनमें ही हो जाता है।
2. होनहार बालकके लिअे।
3. जब किसी कामके आसार पहले ही दीखने लगें तब।
मिलओ– होनहार विरवानके होत चीकने पात।
131. पूतरा लखण पाळणै, वहूरा लखण बारणै
पूतके लच्छन पालनेमें और बहूके लच्छन द्वारपर (मालूम हो जाते हैं)
पुत्र आगे चलकर कैसा होगा यह छोटी अवस्थामें ही मालूम हो जाता है।
बहू कैसी होगी यह उसके प्रथम द्वार–प्रवेश के समय मालूम होता है।
132. पूत सपूता क्यंू धन संचै, पूत कपूता क्यंू धन संचै?
पुत्र सपूत है तो क्यों धन जोड़ते हो और पुत्र कपूत है तो भी क्यों जोड़ते हो?
पुत्र सपूत होगा तो स्वयं कमा लेगा, ापूत होगा तो जोड़ा हुआ भी उड़ा देगा। इसलिअे
दोनों अवस्थाओं में धन जोड़ना व्यर्थ है।
133. पेट थोथो है
पेट थोथा है (क्योंकि चाहे जितना भरो कभी नहीं भरता)
पेटको भरना पड़ता है इसीलिअे मनुष्य विविध प्रकार के कष्ट सहता है और पराधीनता
भोगता है।
134. पेट पापी है
क्योंकि सारे पाप पेट भरनेके लिअे ही किये जाते हैं।
मिलाओ–बुभुक्षि:त किं न करोति पापम्।
135. पेट–भरैरी वातां है
पेट भरेकी बातें हैं
पेट भरनेपर ही सब बातें सूझती हैं, भूखेको कोई बात अच्छी नहीं लगती।
136. पेटमें ऊँदरा कूदै है
पेटमें चूहै कूदते हैं
बहुत भूख लग रही है।
137. पेटमें ऊँदरा लड़ै
पेटमें चूहे लड़ते हैं
(ऊपरवाली कहावत देखो)
138. पेटमें ऊँदरा थडयाँ करै
पेटमें चूहे खेल रहे हैं (थड़ीपैरों पर खड़ा होना)
(ऊपरवाली कहावत देखो)
139. पेटमें मिनक्यां लड़ै
पेटमें बिल्लयां लड़ती हैं
(ऊपरवाली कहावत देखो)
140. पेटमें छुरी–कतरणी है
पेटमें छुरी–कतरनी हैं।
मनमें कपट रखता है; मनमें दुष्टता रखता है।
141. पेटमें वड़’र कणीं को देख्यो नी
पेटमें घुसकर किसीने नहीं देखा है
किसीके हृदय में क्या है यह जानना संभव नहीं।
हृदय के कपट का पता नहीं चल सकता।
142. पैडो कोसरो ही बुरो
मार्ग कीसका भी बुरा
चलना चाहे अेक ही कोसका हो तो भी कष्टदायक होता है।
143. पो खल्लड़ खो (पाठान्तर–पो खालड़ीरो खो)
पौष महीना चमड़ीका क्षयकारी है
जाड़ेमें हाथ–पैर आदि फट जाते हैं । पौषमें शीत बहुत पड़ता है।
144. पोटो पडो जको रेत ले’र ही उठसी
पोटो (गोबर ) गिर गया सो रेत को साथ लेकर ही उठेगा (धूल पर गिरेगा तो उसके धूल लग
ही जायगी जो उठाते समय साथ उठ आयगी)
कुछ–न–कुछ लाभ प्राप्ति करेगा ही ।
145. पोथा सै थोथा
पोथे सब थोथे हैं
1. पोथियों में (या पढ़ने में) कुछ सार नहीं, जब तक उनपर अमल न किया जाय।
2. पढ़ना व्यर्थ है (नहीं पढ़ने वाले की उक्ति)।
मि.– पोथा सब थोथा भया, पंडत भया न कोय।
ढाई आखर प्रेमका, पढै सो पंडत होय।।
146. पोसव़ाळमें कांगसिया जोव़ै
पाठशालामें कंघे ढूंढ़ता है ;कंघों का पाठशाला से क्या संबंध ? )
किसी चीजको अैसी जगह ढूंढ़ना जहांसे उसका कोई संबंध नहीं।
147. पोपांबाई, राम–राम। नांव़ कियां जाण्यो? उणियारो देख’र
कोई व्यक्ति–पोपं बाई, राम–राम
पोपांबाई–तुमने मेरा नाम बिना बताये कैसे जान लिया?
148. प्राणीरै लारै दाणा वीखरग्या
प्राणीके पीछे दाने बिखर गये।
मृतकके पीछे मौसर करने पर।
149. प्रीत छिपायी न छिपै
पे्रम छिपाया नहीं छिपता।