541. रचियो पण जचियो नहीं
रचा पर जंचा नहीं
काम हुआ पर अच्छा नहीं हुआ।
542. रतपूतनै रेकारैरी गाळ
राजपूतके लिअे रेाकर गालीके बराबर है
राजपूतको अपमानजनक संबोधन जरा भी सहन नहीं होता।
मि.–तगा, तगाई मत करे बोले मूंह संभाळ।
नहरनै रजपूतनै रेकारैरी गाळ।।
543. राजपूतरी जात जमी, घोड़ैरी जात परात
राजपूतकी जाति उसकी जमीन है, और घोड़ेकी जाति उसकी......
राजपूतके पास जमीन है तो नीच कुलका होनेपर भी वह ऊँचा हो जाता है।
544. राजपूती धोरोंमें रळगी, ऊपर रळगी रेत
राजपूती टीबोंमें मिल गयी और ऊपर रेत फिर गयी
अब राजपूती नहीं रही।
545. रजपूती रैयी नहीं, पूगी समँदां पर
राजपूती नहीं रह गयी, वह तो समुद्र पार पहुंच गई (अलोप गयी)
546. रतन सेठ बेटा–बेटा करतो मरग्यो बेटा रांड़ रा अै मरै
सेठ रामरत्नजी डागा बेटे की लालसा लिअे हुअे ही मरे परन्तु कपूत बेटोंकी कमी नहीं
है।
कुपुत्र होने की अपेक्षा अपुत्र रहना अच्छा
बीकानेर निवासी स्वनामधन्य परम भगद्भक्त सेठ रामरत्नरामजी डागा वर्तमान सुविख्यात
फर्म ‘वंशीलालजी अबीरचंद’ के मालिकों के पुरुखे थे। अपने संतान नहीं थी जिसकी उन्हें
बड़ी लालसा थी। जब किसी कुपुत्र को फटकारता तथा लज्जित करना हो तब उपयुक्त कहावत
प्रयुक्त की जाती है। अर्थात् वे अपुत्र ही मरे तो अच्छा हुआ तुम्हारे जैसा कुपुत्र
उनके उत्पन्न हुआ होता तो वंशको कलंक ही लगता।
547. रमो–खेलो, अेछोरियाँ! लूंदारी डोरी
सब आनन्द करो, कौन टोकनेवाला है (व्यंगसे)
548. रिळयांरा जाया, गिळयांमें रुिळया
जो आनन्दोत्सव में जनमे थे वे गतियों में भटक रहे हैं
दैव–गति पर।
549. रव़ै तो आपसूँ, नहीं तो जाय सगै बापसूं
स्त्री रहती है तो स्वयं ही रहती है नहीं रहती है तो सगे बापको छोड़कर चली जाती है
(भाग जाती है)
550. रस्तै आव़णो, रस्तै जावणो
रास्ते आना, रास्ते जाना
अपने कामसे काम रखना
551. रंगमें भंग
शुभकार्यमें विघ्न वड़ना।
552. रंगरूड़ो गुण–व़ायरो रोहीड़ैरो फूल
रोहीड़ेका फूल सुन्दर रंगका पर गुण रहित अर्थात् निगन्ध होता है
गुणोंसे रहित सुन्दर या धनवान पुरुषके लिअे।
553. राई घटै न तिल व़धै, रह रै, जीव! निसंक
1. भाग्यमें जो कुछ लिखा है वह होगा ही!
2. भाग्यमें जितना मिलना लिखा है ठीक अुतना ही मिल जायगा।
554. राईनै परवत करै, परवत राअी मान
राईको पर्वत कर देता है, और पर्वतको राईके बराबर
ईश्वरकी कुदरत सब कुछ कर सकती है।
555. राखणहार भया भुज च्यार तो क विगडै भुज दो के वि़गाड़े
यदि चार भुजावाला (परमात्मा) रक्षक है तो दो भुजावाला (मनुष्य) क्या बिगाड़ सकता
है?
परमात्मा जिसकी रक्षा करता है उसका मनुष्य कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
मि–जाके रखवाला गोपाल धनी ताको भलभद्र कहा डर रे
556. राखपत रखाव़पत
(दूसरोंकी) पत रखो, (दूसरोंसे अपनी) पत रखाओ
दूसरोंके साथ जैसा बत्र्ताव करोगे वैसा ही बत्र्ताव दूसरे तुम्हारे साथ करेंगे।
557. रागरो घर बैराग
रागका घर वैराग्य
558. रागो हालै रगमग, तीन माथा दस पग
रागा रगमग करता हुआ चलता है, उसके तीन माथे और दस पैर हैं
यह एक पहेली है, बैलगाड़ी के दो बैल और हाकने वाले के मिला कर 3 मस्तक और 10 पैर
होते हैं।
559. राज पोपांबाईरो, लेखो राई–राईरो
पोपांबाअीका राज्य है जिसमें राई–राईका लेखा होता है
अव्यवस्था और कुशासन के लिये।
560. राजरी आस करणी, पण आसंगो नहीं करणो
राज्यकी आशा करनी चाहिअे पर सामना नहीं करना चाहिअे
राज्यसे विरोध करना अच्छा नहीं।
561. राज–रीत आव़ै जठै राज आयो रैव़ै
जहाँ राजोचित व्यवहार आ जाता है वहां राज्य अवश्य आता है।
562. राजरा मारग माथै उपर
राज्यका मार्ग सिरके उपर (होकर भी जाता है)
राजा चाहे जो कुछ कर सकता है।
563. राजा करै सो न्याव़, पांसो पड़ै सो दांव़ (पाठान्तर–हाकम)
राजा करता है वही न्याय, पांसा पड़ता है वही दाव है
564. राजा मानै जकी राणी, और भरो पाणी
जिसे राजा माने वही रानी, बाकी दूसरो पानी भरो
मालिक जिसको चाहता है, उसीका आदर होता है।
576. राजा रूठसी तो आपरौ सुव़ाग लेसी
राजा रूठेगा तो अपना सुहाग लेगा (और क्या बिगाड़ेगा?)
किसी शक्तिशाली व्यक्तिसे न डरनेवाले की उक्ति।
577. राजा रूठसी तो आपरी नगरी लेसी
(ऊपरवाली कहावत देखिये)
578. राजा बिना नगरी सूनी
579. राजारै घरे मोत्यांरौ काळ
राजाके घर मोतियोंका अकाल!
जब किसीके यहां कोओ वस्तु बहुत होनेकी आशा हो पर बिलकुल न दिखायी पड़े, या मांगने
पर न मिले।
580. राड़ आडी बाड़ चोखी
राड़के सामने बाड़ अच्छी
(नीचेवाली कहावत देखिये)
581. राड़ सूं व़ाड़ भली (पाठान्तर–आड़ आछी)
झगड़े के सामने बाड़ देना ही अच्छा
झगड़े को रोकना ही अच्छा है (झगड़े का कारण होने पर भी वचना चाहिये)
582. रांड अर खांडरो जोबन रातरो
रांड़ और खांड़ का यौवन रात को
खांड की उज्ज्वलता रात में चमकती है। रांड़ रात में श्रंगार करती है।
583. रांड़नै रोव़णसूं ही काम
रांड़ को रोने से ही काम
584. रांड! भातो मोड़ो लायी, कै–खोज–गया! हमै ही व़ेगो है
रांड़! भाता देर से लायी? तो कहती है–खोज–गये! अभी भी जल्दी है।
585. रांड, भांड अर अुलड़ो गाडो कैरै सारै थोड़ा ही रैव़ै है?
रांड़, भांड़, और उलटती हुई गाड़ी किसी के वश में थोड़े ही रहते हैं?
586. रांडरी दुराशीससूं टाबर को मरै नी
रांड़ की दुराशीष से बच्चे नहीं मरते
अकारण दुराशीष देने से कोअी अनिष्ट नहीं हो सकता।
मिलाओ–ढेढरी दुराशीससूं किसा दाव मरै!
587. रांड रोव़ै क्वारी रोव़ै, साथ ळगी सतखसमी रोव़ै
आवश्यकता से अधिक सहानुभूति दिखाने पर।
588. रांड, सांड, सीड़ी, सन्यासी, िअणसूं वचै तो सेव़ काशी
काशी बास करना हो तो िअन चारों से बचकर रहें।
589. रांड हुअीरो धोको नहीं, सपनो तो साचो करणो
रांड़ (विधवा) होने का धोखा नहीं, सपना सच्चा करना है।
(रांड चाहे हो जाअूं पर सपना तो सच्चा करना ही चाहिये)
नुकसान सह लेना पर अपना हठ कायम रखना।
590. रांडां तो रंडापो काढै, पण रंडुव़ा काढण को दैनी
विधवाअें तो विधवापन बिता दें पर पुरुष नहीं बिताने देते
पुरुष ही विधवाओं के चरित्र को ज्यादातर विगाड़ते हैं।
591. रांडां रोव़ती ही जाय, पाव़णा जीमता ही जाय
592. रांडां! रोव़ो क्यूंअे? खसमांनै
खतम तो जीवै है नी अे? तो घाटो ही क्यांरो
रांड़ों! रोती क्यों हो? पतियों को?
पति तो जीते हैं न? यदि अैसा होता तो फिर घाटा ही किस बात का?
पौरुषहीन पति या मालिक या किसी अन्य पौरुषहीन व्यक्ति पर
593. रांडा! रोवो क्यूं हो अे? मांटा मरग्या?
जीवां हांनी? जणा ही तो रोवां हां।
प्रश्न पतियों का–रांड़ों? क्याें रोती हो हां।
उत्तर स्त्रियों का–पति मर गये िअस लिअे।
पतियों का कथन–अरी, हम तो जी रहे हैं?
स्त्रियों का प्रत्युत्तर–तभी तो रोती हैं (कि मरे हुअे पति अभी जीवित हैं, इससे तो
अच्छा था कि सचमुच कर जाते)
(ऊपरवाली कहावत देखिये)
594. राणीनै काणी कह दी
रानीको कानी कह दिया?
अपनेको बड़ा समझनेवाला व्यक्ति सच्ची बात कही जाने पर जब नाराज हो जाय तब।
595. राणीनै काणी क्यूं कह दी?
रानी को कानी क्यों कह दिया?
1. ऊपरवाली कहावत देखिये।
2. जब कोई बच्चा अकारण नाराज हो जाय तब।
596. राणोजी थरपै जठे ही अुदैपर
राणाजी स्थापित करें वहीं उदयपुर
एक प्रतापी पुरुष जो बात निश्चित कर दे उसे मानना पड़ता है।
597. राणोजी थापै जकी ही राणी
राणाजी स्थापित करें वही रानी
(देखो ऊपरवाली कहावत)
598. राणोजी रूठसी आपरो अुदैपुर राखसी
राणाजी रूठेंगे तो अपना अुदयपुर रखेगें
बड़े आदमी के रूठनेसे इतनी ही हानि होगी कि वह अपने स्थान आनेसे रोक देगा (और क्या
करेगा)
मिलाओ–फूफोजी रूठसी तो भूवाजी नै राखसी!
599. रात गयी, बात गयी
600. रात थोड़ी, सांग घणा
रात छोटी पर, नाटक खेल बहुत
मिलाओ–रात थोड़ी, कहानी बड़ी
601. रात राणी, बहू काणी
रात रानी बहू कानी
602. रात्यूं रोया पण मरो अेक ही कोनी
रातभर रोये पर मरा अेक भी नहीं
1. बिना कारण के बहुत आडम्बर किया जाय जब
2. बहुत परिश्रम करने पर भी फल प्राप्त न हो तब
603. राबड़ी कै–मनै ही दांतांसूं खाव़ो
रावड़ी, कहती है कि मुझे भी दांतों से खाओ
जब कोओ छोटा व्यक्ति बड़ोंकी बराबरी करने चले।
604. राब ना राबड़ी, ळे अुठै खावड़ी
न कहीं राब, कहीं राबड़ी, फिजूल ही खाबड़ी लेकर अुठ दौड़ता है
605. राम कह दिया, अबै रहीम थोड़ो ही कहसी?
राम कह दिया, अब रहीम थोड़े ही कहेगा?
1. हठी आदमी के लिअे जो अेक से दो नहीं होता।
2. बातपर कायम रहनेवालेके लिअे।
606. राम कै’र रहीम नहीं कैणो
राम कहकर रहीम नहीं कहना
बात पर कायम रहना।
607. रामजीरी नानी! देख टाबरां कानी
रामजीकी नानी, बच्चों की ओर देख
608. रामजीरो आसरो है
रामजीका सहारा है
भगवान का भरोसा है।
609. रामजीरा दीन है
रामजीके दिये हुअे (सब पदार्थ) हैं
अच्छी अवस्था है। आनन्द मंगल है।
घर बालबच्चों से भरा–पूरा है।
610. रामदेव़जीनै मिल्या जका ढेढ–ही–ढेढ
रामदेवजीको जो–जो मिले सो सब ढेढ़ ही ढेढ़
जब नीच–ही–नीच व्यक्तियाें से पाला पड़े।
611. रामनाम जपणा पराया माल अपनणा
कपटी आदमी के लिअे।
612. राम वारै आसी, बंदाको आव़ै नी
केवल राम ही पहुच पायेंगे, वन्दे नहीं
दुष्टोंको भगवान ही दंड दे सकते हैं, मनुष्य नहीं।
613. राम भजो, अे रांडों! खसमांने क्यूं भांड़ो
अरी रांड़ों! राम भजो, खसमों की क्याें निन्दा करती हो?
614. राम–भरोसै अूकळै अींधण अीसरदास
इ्रसरदास कहता है कि रामके भरोसे अदहन उबलता है (रामकी कृपासे अन्न भी कहीं–न कहीं
से आ ही जायगा)
1. साधन न होने पर भी काम आरंभ कर देना।
2. भगवान के भरोसे रहना।
615. राम–भरोसै खेती है–
अब अीश्वर का ही भरोसा है और कोअी अुपाय नहीं।
(ऊपरवाली कहावत देखिये)
616. रामरै घररो आयीजो, पण राजरै घररो मती आयीजो
रामके घरका (बुलावा) भले ही आवे पर राजाके घरका न आवै
मृत्यु भले ही आ जाय पर राजदरबार या अदालत में न जाना पड़े।
617. रात्यूं बाल्यो तेल अधेलो इंयोई गयौ
रातका भर अधेंलेका तेल जलाया पर निरर्थक। की हुई परिश्रम व्यर्थ जाने पर
618. राय मििळया रे! मििळया, हूंता जेहड़ा आय मििळया
राय मिले, रे! राय मिले, जैसे थे वैसे आय मिले
जैसे को तैसा मिल गया! दोनों अेक जैसे आ मिले।
619. रायांरा भाव़ राते गया
राअीके भाव रातको ही गये
वह अवसर चला गया। वह बात अब नहीं रही।
620. राली ओढ जानमें जाव़ै, व़ागो पहर’र अेवड़में जावै़
गुदड़ी ओढ़कर बरातमें जाता है, जामा पहनकर खेड़ में जाता है।
1. असंगत काम करनेवाले पर।
2. मूर्खता का काम करनेवाले पर।
621. रावळैमें िअसी ही पोल कै दो जीम ज्यावै?
राजमहलमें अैसी ही पोल कि दो जीम जायँ?
यहां अैसी पोल नहीं
622. रावळै रोटां पाव़ो हो
राज–दरबार से रोटी पाते हो।
मुफ्तकी रोटी मिलती है (पेट भरने की चिंता नहीं है)
खुद न कमाने से और या गैर–जिम्मेवार व्यक्ति पर। माँ–बाप पर मौज उड़ाने वाले
व्यक्ति पर।
623. रावळैरो तेल पले में ही चोखो
राज–दरबारसे मिलनेवाला तेल (वत्र्तन न हो तो) कपड़े के पल्ले में ही ले लेना अच्छा।
राज्यसे जो लोग मिलती हो अुसे ले ही लेना चाहिअे, कम–से–कम लेनेका नाम तो कर लेना
चाहिअे–ताकि वह वही में दर्ज रहे काटी न जाय और आगे मिलती रहे।
624. रीतरो रायतो करनो पड़ै
रिवाज का रायता करना ही पड़ता है
रिवाजके अनुसार चलना ही पड़ता है।
625. रीस मारां रेसाण अूपजै
क्रोधको दबानेसे रसायन अुत्पन्न होती है
क्रोधको दबा लेना बड़ा हितकारी है।
626. रुत वि़न रायण ना फळै, मांग्या मिळैन मेह
बिना ऋतु पेड़ नहीं फलते, मांगनेसे मेह नही मिलता
सब काम अपने समय पर ही हो सकते हैं।
627. रुपियांरी खीर है
रुपयों की खीर है (रुपया ही तभी खीर बनती है)
धनसे सब काम होते हैं।
मि–पैसोंकी खीर है।
628. रुपिया हुव़ै जद टू चालै
रुपये हों तब टू चलता है।
धन हो तभी अभीष्ट कार्य हो सकता है।
मिलाओ– डवदमल उंामे जीम उंतम हव
629. रुपियै कनै रुपियो आव़ै
रुपयेके पास रुपया आता है।
रुपयेसे रुपया कमाया जाता है।
डवदमल इतपदहे उवदमलण्
630. रुपियो मां, अर रुपियो बाप, रुपियै वि़ना घणो सन्ताप
रुपया मां है और रुपया ही पिता है, रुपये बिना बहुत संताप होता है।
631. रुपियो हाथरो मैल है
रुपया हाथका मैल है (जो आता जाता रहता है)
धन आता जाता रहता है अत: अुसको खर्च करनेमें आगापीछा नहीं सोचना चाहिअे।
632. रूखा सो भूखा
जो रूखा अन्न खाता है वह जल्दी भूखा हो जाता है (जल्दी भूख लग जाती है)
633. रूठोड़ो भूपाळ, तूठोडो व़ाणियो
रूठा हुआ राजा और प्रसन्न हुआ बनिया बराबर है
बनिया तूठकर भी कुछ नहीं देता।
634. रूप–रूड़ो गुण व़ायरो रोहीडैरो फूल (पाठान्तर–रूपाळो)
रूपसे सुन्दर पर गुणोंसे हीन रोहीड़ेका फूल
सुन्दर, पर गुणहीन, पुरुषके लिये।
मि–सभा मध्ये न शोभन्ते निर्गन्धामिव किशुका:।
635. रूप रोवै, भाग खाव़ै
रूप (वाला) रोता है, भाग (वाला) खाता है
रूप रोवै करम खाय
रूप री धिराणी पाणी ने जाय
भाग्य बड़ा है। बिना भाग्यके गुण निरर्थक हैं।
मि–रूपकी रोय करम की खाय।
विधि–करतूत न जानो जाय।।
636. रूपलालजी गुरू, बाकी सब चेला
रुपया गुरु है, बाकी सब चेले हैं
रुपया सबसे बड़ा है।
637. रूपली पल्लै तो रोहीमें चल्लै (पाठान्तर–चारूं खुंट)
रुपल्ली गांठमें हो तो जंगल में चल सकता है
रुपया पास है तो सब जगह आनन्द से रह सकते है।
638. रेखमें मेख मारै
रेखमें मेख मारता है
भाग्य को बदल देता है
639. रैव़णो भायांमें, हुव़ो भलां ही वैर ही
रहना भािअयोंमें, हो चाहे वैर ही
विरोध होने पर भी भीइी–बंधुओंके साथ ही रहना चाहिअे।
640. रोगरो घर धांसी, लड़ाईरो घर हांसी
रोगका घर खांसी, लड़ाअीका घर हंसी
खांसी अनेक रोगोंका मूल हैं, अंसी–मजाक लड़ाअी का कारण।
641. रोज करै आव़–जाव़ जकैरो कोअी न पूछै भाव़
जो रोजाना आना जाना करता है, अुसका कोअी आदर नहीं करता
िअसलिये बिना मतलब आव–जाव नहीं रखना चाहिअे।
मि–अतिपरिख्याद् अवज्ञा भर्वात।
मान घटै नित–ही–नित जाये।
642. रोजा छुड़ाव़णनै गया निवऋाज गळै पड़ी
रोजे छुड़ाने गये, नमाज गले पड़ी
साधारण दु:खसे छूटनेकी कोशिश करते हुअे बड़े दु:खमें पड़ना।
643. रोट खाव़ै मांटीरा, गीत गावै वीरैरा
रोटी खाय पतिकी और गीत गाय भाअीके
लाभ किसीसे पहंुचे तारीफ किसी की की जाय
मि–खावै पीवै खसम रा गीत गावै वीरै रा
644. रोटी खाणी सक्करसूँ, दुनिया ठगणी मक्करसूं
रोटी खाना श्क्करसे, दुनिया ठगना मक्कारीसे
दामो तथा धूर्त पुरुषों की ऐसी कुनीति होती है।
645. रोटी खांव़तां–खांव़तां ने मोत आव़ै
रोटी खाते–खातों को मौत आती है
646. रोटी मोटी बात, जाळा काटै जीव़रा
रोटी बड़ी बात है जो जीवके जाल काट देती है
सबसे बड़ी चीज रोटी है।
647. रोयां किसो राज मिलै?
रोनेसे कौन–सा राज्य मिलता है?
648. रोयां राज को आवें नी
रोनेसे राज्य नहीं आ जाता
1. जब कोअी रोता है तब समझाने के लिये कहते हैं।
2. रोनेसे कुछ नहीं मिलता, परिश्रम करना चाहिअे।
मि–रोनेसे दान नहीं मिलता।
रोनेसे रोजी नहीं बढ़ती।
649. रोयां विना मा ही बोबो को देव़ै नी
रोये बिना मा भी दूध नहीं पिलाती
चुपचाप रहनेसे कोअी ध्यान नहीं देता
मि–बोलै जकीरा बोर बिकै।
650. रोळ में चोळ हुव़ै
651. रोव़तीनै राखाी तो कै सागै ही ले चालो
रोती हुई को आश्वासन देकर रोना बंद करवाया तो कहती है कि साथ ही ले चलो
कोअी थोड़ी–सी सहायता करे तो अुसीके पीछे पड़ जाना
मि–अंगुली पकड़ कर पहुँचा पकड़ना
652. रोव़तो जाव़ै जको मरैरी खबर लाव़ै
जो रोता हुआ जाता है वह मरे की खबर लाता है
1. बिना मनके कोअी काम करे तब कही जाती है
2. बेमन काम करने से असफलता ही मिलती है
3. जो झींखता जाता है उसको सफलता नहीं मिलती
653. राहण वाजै मग तपै, गैला! खेती कंने खपै?
रोहिणी नक्षत्रमें हवा चले ओर मृगशिरमें गर्मी पड़े तो बावले!
किसलिअे खेती ही महनत अुठाते हो?
654. रोहण तपै मिरगला व़ाजै, आदरा अणपूछा गाजै
रोहिणी नक्षत्रमें गर्मी बढ़े और मृगशिर नक्षत्रमें हवा चले तो आद्र्रा
नक्षत्रमें बिना पूछे ही बादल गरजेंगे (और पानी बरसेगा)