1120 थारा कांटा तने ही भागैला
तेरे कांटे तुझे ही चुभेंगे।
जैसा करोगे वैसा पाओंगे।
दूसरे की बुराई करने से अपनी ही हानि होती है।

1121 थारा गमाया घर गया अे कांदाखाणी नार
ए पियाज खाने वाली नारी, तेरे गंवाये घर नाश हो गये।
1 किसी बुराई का, खुद मूल कारण होते हुए भी ऊपर से अपने कोऐसा प्रगट करे जैसे उसका उससे कुछ संबंध ही नहीं है, उसके प्रति।
2 बुराई के मूल कारण तुम्हीं हो।

1122 थारा जायोड़ा ही कदे पगां चालसी
तेरे जाये हुए भी कभी पेंरों चलेंगे?
हां, हां, कहकर टरकाने वाले को ऐसा कहा जाता है जिससे अभिप्राययह है कि तुम कब तक काम कर दोगे।

1123 थारी म्हारी बोली में इतरो ही फर
थे कहो फरेस्तार’ म्हे कहां जरक्ख
तुम्हारी और हमारी बोली में इतना ही फर्क है कि तुम उसे फरिस्ताकहते हो और हम जर्ख कहते हैं।
इसकी एक कहानी है जो इस प्रकार है–
एक मियेजी का रिस्तेदार मर गया जिसे कब्र में दफना दिया गया। कुछदिनों बाद उसने देखा तो मालूम हुआ कि कब्र खुदी हुई पड़ी है।मियेंजी ने इसकी चरचा अपने पड़ोसी जाट से की और कहा ‘हमारेरिस्तेदारको ‘फरिस्ता’ बिहिश्त स्वर्ग में ले गया। जाट बोला ‘जरख’उठा ले गई होगी। मिंये ने पूछा जरख क्या होती है? तब जाटने कहाकि जिसे तु ‘फरिस्ता’ कहते हो उसे ही हम ‘जरख’ कहते हैं; शब्द दो हैं अर्थ एक ही है।

1124 थारे जिसा छप्पन सौ देख्या है
तेरे जैसे छप्पन सौ देखे हैं।
तू अपने को क्या समता है?

1125 थारे म्हारे क्या बैंचियोड़ो
तुम तो भाई से भी अधिक हो।

1126 थारो ओजरो भूंडो दीखै। कै म्हारे तो सेर धान अैमें ही खटावै
तेरी यह ओरी पेट भोंडी दिखाती है। कि मेरे तो सेर धान इसी मेंआता है।

1127 थारो सो म्हारो, म्हारो सो हैं हैं.......
तेरा जो कुछ है सो मेरा, और मेरा जो कुछ है सो हैं हैं......
जो दूसरे के धनको अपना समझे और अपने धन को दूसरे का नसमझे।

1128 थाळली फूटां ठीकरो हाथ में आया करै
थाली टूट जाने पर ठीकरा हाथ लगता है।
अच्छी वस्तु के नष्ट हो जाने पर उसके बदले में निकम्मी या कमउपयोगी वस्तु मिलने पर।

1129 थावर कीजै थरपना बुध कीजै व्यापार
शनिवार को स्थापना करनी चाहिए और बुधवार को व्यापार।

1130 थावर रा थावर गांव थोड़ा ही बळै
शनिवार के शनिवार यानी प्रत्येक शनिवार को गांव थोड़े ही जलतेहैं।
एक काम सदा थोड़ा ही होता रहता है।

1131 थूक सूं गांठोड़ा? किता दिन संधै?
थूक रा चेपा किताक दिन चलै पाठांतर?
थूक से चिपकाये हुए कितने दिन संधते हैं?

1132 थे सवाई जैपर रा तो म्हे डोढे चूरू रा
तुम सवाई जयपुर के तो हम डेढे चूरु के।
हम तुमसे किसी बात में कम नहीं हैं बल्कि अधिक हैं।

1133 थोड़ी देर तो वण रतन!
कुछ देर के लिअे तो उदार अथवा दानी बन जा।
नोट–यह सेठ रामरतनदासजी डागा के नाम पर बना है वे बड़े ही दानीऔर उदार थे उनके मुकाबले का दानी व उदार गत शती में कोईबीकानेर में नहीं हुआ। श्री राय सा. सेठ नरसिंहदासजी डागा आपकेदत्तक पुत्र हैं।

1134 थोथो चिणो बाजै घणो–
थोथा चना बहुत बोलता है
जिसमें गुण नहीं होता वह बढ़–बढ़कर बातें बनाता है।
मि.–अधजल गगरी छलकत जाय
ज्ीम म्उचजल अमेेमस उंामे उनबी दवपेम क्ममच तपअमते उवअम पद ेपसमदबमए
ैींससवू इतववो ंतम दवपेलण्