235 उछलपांती थारी है।
लाभ वाला हिस्सा तुम्हारा है।
236 उछाल भाठो करम में क्यों लेवणो?
स्वयं पत्थर उछालकर उसे अपने माथे क्यों लेना?
स्वयं अपनी ओर से आफत सिर पर नहीं लेना चाहिअें।
237 उठ बींद फेरा ले, हाय राम मौत दे।
उठ, दूल्हे फेरे ले; तो उत्तर देता है हाय राम! मौत दे।
फेरे लेने के कष्ट से मौत अच्छी समता है– सब तय्यारी लोगों ने
कर दी केवल फेरे लेना बाकी रहा पर आलसी दूल्हा यह भी आप
नहीं करना चाहता
महा आलसी के लिअे।
मि.– सिज़दे से गर बिहिश्त मिले, दूर कीजिये।
दोज़ख ही सही, सर का झुकाना नहीं अच्छा।
238 उठी जवानी मंा ढीला।
उठती जवानी में कमर ढीली।
यौवन आने पर भी जो निर्बल और निरुत्साही हो उसके लिये कही
जाती है।
239 उठाया कुत्ता कितीक सिकार करै।
उठाये हुए अपने–आप न उठे हुए कुत्ते कितना शिकार करते हैं?
जिसके मन में उत्साह नहीं वह दूसरों के जबर्दस्ती खदेड़ने से क्या
काम करेगा।
240 उडी’र फर्र।
उड़ी और फर्र।
गप्प हांकना, उड़ती बात कहना।
241 उड़ो अे चिड्यां, सावण आयो।
उड़ो अे चिडि़या, सावन आया
......................................................
242 उणियारै उणियारै देश भरा है।
समान हुलियों वाले व्यक्तियों से देश भरे हैं।
अेक ही आकार वाले अनेक व्यक्ति हो सकते हैं।
243.उतर भीखा म्हारी बारी।
अे भीखा, उतर, अब अब मेरी बारी आयी।
1 अब मेरा दांव आया।
दुनिया में अेक–दूसरे से काम पड़ता ही रहता है।
244.उतरियो गांव डूमां ने दीजै।
राज्य द्वारा छिना हुआ गांव याचकों को दो डूम अेक गानेवाली
याचक–जाति दमामी
कोई जाने वाली चीज दान करे तब।
मि.–बूढी गाय गुरां बामण ने दीजै
पुण्य नहीं तो आघी कीजै
245 उधार घर री हार।
उधार देना घर की हार है।
उधार देना बुरा है।
246 उधार दियो’र गिरायक गमायो।
उधार दिया और ग्राहक गंवाया।
क्योंकि तगादे के डर से वह ग्राहक फिर उस दुकान की ओर नहींआता।
247 उधार दीजै दुसमण कीजै।
उधार दीजिये और दुश्मन कीजिये।
उधार लेनेवाला बराबर चुका नहीं सकता अत: उससे लड़ाई हो ही
जाती है।
248 उधार देवणों लड़ाई मोल लेवणी है
उधार देना लड़ाई मोल लेना है।
ऊपरवाली कहावत देखो
249 उधार–पुधार घरे सिधार
उधार–पुधार मांगते हैं तो अपने घर जा
उधार नहीं देना चाहिअे।
250 उलटो चोर कोटवाळ नै डंाटै
उलटो चोर कोतवाल को दंड देता है।
अपराधी होकर भी दूसरों को फटकारना।
मि.–उलटा चोर कोतवालको डांटता है।