688. वकारो ढेढ सीटी को देव़ैनी
कहने से ढेढ़ सीटी नहीं बजाता (वैसे दिन भर बजाता रहता है)।
नीच आदमी प्रार्थना करने से जिद्दी होता है।
709. वकारो भूत बोलै
पुकारने से भूत बोलता है।
आवाज देते ही कोई तुरन्त बोल उठे तब हंसी में कहा जाता है।
710. बखत जाय परो, वात रह ज्याय
समय चला जाता है, बात रह जाती है।
भली–बुरी बात रह जाती है (समय किसी का एक सा नहीं रहता)
711. वखत–वखतरा रंग जुदा
भिन्न–भिन्न समयों के भिन्न–भिन्न रंग होते हैं।
सब समय अेक–सा नहीं होता।
712. वखत–वखतरा रागण्यां है
समय–समय की अलग–अलग रागिनियां है।
भिन्न–भिन्न समयों पर भिन्न–भिन्न बात होती है।
प्रत्येक बात का अपना समय होता है और वह तभी अच्छी लगती है।
713. वखत देख नहीं विणजै जको वाणियो गँव़ार
जो वक्त का व्यापार नहीं करता वह बनिया गँवार है।
वक्त के अनुसार काम करना चाहिअे। जो नहीं करता वह मूर्ख है।
मि–जैसी चलै वयार पीठ तैसी ही दीजै।
714. बखतरा वाया मोती नीपजै
समय पर बोने से उसमें मोती पैदा होते हैं
1. समय पर खेती बोने से फसल अच्छी होती है
2. समय पर काम करने से बड़ा भारी लाभ होता है।
715. वडा कैव़ै ज्यूं करणो, करै ज्यूं नहीं करणो
बड़े लोग कहे वैसे करना चाहिअे, वे करें वैसे नहीं करना चाहिअे।
बड़ोंके उपदेशोंका अनुसरण करो, आचरणांका नहीं।
बड़ोंके बुरे आचरणोंका अनुसरण मत करो
बड़ोंकी बराबरी मत करो।
716. वडा तो भाठा ही घणा हुव़ै
बड़े तो पत्थर ही बहुत होते हैं
अगर गुण नहीं तो खाली उम्रमें बड.े होनेसे क्या?
बड़ा वहीं है जो गुणों में बड़ा है।
717. वडा वडाई ना करैख् वडा न बोलै बोल
बड़े आदमी अपनी बड़ाई स्वयं नहीं करते और न वे बड़ी बात बनाते हैं
(या और न किसी को बुरा लगनेवाली बात कहते हैं)
बड़े आदमियोंका लक्षण। बड़े आदमी शेखी नहीं मारते।
मि– 1. हीरा मुखसे ना कहै लाख हमारा मोल
2. ैंपजी ं िंसेम कपंउवदकए ष्ूींज ं रमउंद प्ण्ष्
प् कवनइज पजे अंसनम तिवउ पजे इववेजनिस बतलण्
718. वडा लाजरा खातर मरै
बड़े लाजके लिअे मरते हैं।
बड़े आदमी लाज की रक्षा करते हैं
719. वडांरा वडा ही काम
बड़ों के काम भी बड़े ही होते हैं।
1. बड़े आदमी बड़े काम ही हाथमें लेते हैं।
2. कोई बड़ा आदमी नीच काम करे तब भी व्यंगसे कहा जाता है।
720. वडांरी गांडमें वड़नो सोरो, निसरणो दोरो
बड़ों की गांड़में घुसना सहज, पर वापिस निकलना कठिन है
बड़े लोगों से हेलमेल करना आसान है पर हेलमेल होनेके बाद उनसे पीछा छूड़ाना चाहे तो
बहुत कठिन है।
721. वडांरै कान हुव़ै आंख्या को हुव़ैनी
बड़े आदमियों के कान होते है, आंखें नहीं होती
बड़े आदमी निकट रहनेवालोंकी सुनी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, स्वयं छानबीन नहीं
करते।
722. वडी आँख फूटणनै, घणो हेत टूटणनै
बड़ी आंख फूटने के लिअे और अधिक प्रेम टूटनेके लिअे होता है।
723. वडी बहू वडा भाग, छोटो लाडो घणो सुव़ाग
वरसे वधू बड़ी हो तो उसके बड़े भाग हैं क्योंकि छोटा दूल्हा होनेसे सुहाग बहुत दिन
रहेगा।
बड़ी कन्या का छोटे वरसे विवाह करनेवालों की उक्ति
724. वड़ जिसा टेंटा, बाप जिसा बेटा
जैसा वह वैसे उसके टेंटे (फल), और जैसा बाप वैसे उसके बेटे
संतान मा–बापके अनुसार ही होती है
725. वड़ां पहली तेल कदैई पीग्या हा
बड़ोंसे पहले तेल कभी पी गये थे
बातको पहले ही समझ ली थी।
726. वड़ां सूं तेल पहली पीवै
बड़ोंसे भी पहले तेल पीता है
बातको पहले ही समझ लेता है
पहले अपना कार्य सिद्ध कर लेने वाले पर।
727. वड़ीपकोड़ो, वाणियो, तातो लीजै तोड़
बड़ा, पकौड़ा और बनिया–इनको गरमागरम ही तोड़ लेना चाहिअे।
बड़ों और पकौड़ोंको गर्मागर्म खानेमें ही मजा आता है। और बनिया जब काबूमें आ जाय तो
तुरंत उससे काम बना लेना चाहिअे, नहीं तो काबूसे बाहर होते ही अंगूठा दिखा देता है।
728. वणज्या अेक वार तो रतन
अेक बार तो ‘रतन’ बन जा
इस कहावत का निकास इस प्रकार है– स्वनामधन्य एवं परम भगवद्भक्त सेठ रामरत्नजी डागा
वर्तमान सुविख्यात फर्म– ‘बंशीलालजी अबीरचन्द’ के मालिकोंके पुरखे थे। आप जाति के
माहेश्वरी डागा थे। आप महादेव के पूर्ण भक्त थे और दानी तो ऐसे थे कि लोग उनको दूसरा
‘कर्ण’ ही कहा करते थे। उनके जीवन के महत्वपूर्ण संस्मरण विस्तार पूर्वक समय मिलने
पर लिखे जांएगे। उनकी दानशीलता से लोग इतने प्रभावित हो गये कि वे उन्हें ‘रत्न’ ही
कह कर पुकारते थे। उनके द्वार से कभी कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटा। कंजूस व्यक्ति
को लज्जित करने के लिए कहा जाता है कि एक बार के लिए तो सेठ रामरत्न बनजा।
729. वणी वणाव़ै सो वाणियो, वणी वि़गाड़ै जाट
बनिया बनीकी बनाता है, जाट बनीको बिगाड़ता है
1. जातिस्वभाव। बनिया समयानुसार काम करके काम बनाता है और जाट समयानुसार काम न करके
काम बिगाड़ता है।
2. बुद्धिमान काम बनाता है, मूर्ख बिगाड़ता है।
730. व़णी व़णावै सो व़ाणियो
बनीको जो बनाता है वही बनिया
बनिया समयानुकूल काम करता है
731. व़णीरा किसा मोल?
बनीका कौन–सा मोल?
कुसमयमें जो काम सुधर जाय वहीं अच्छा।
732. वणीरा सै सीरी(पाठान्तर–साथी)
काम बनने पर सब साथी बन जाते हैं।
733. वणी–बणीरा सै संगाती, बिगड़ीरा कोई नांय
बने कामके सब साथी हैं, बिगड़ेका कोई नहींं
1. संपत्तिमें सब साथ देते हैं, विपत्तिमें कोई नहीं देता।
734. वध–वध, रे चंदणरा रूँख्! ऊँचो व़ध
बढ़, रे चंदनके रूख और ऊँचा बढ़
बहुत लंबे आदमीके प्रति हँसी में कहा जाता है।
735. वढोरा वढै, नहीं जका कांई वढै!
जो काटे गये हैं वे ही कटते हैं, जो नहीं काटे गये वे क्या काटेंगे
जो दान करते हैं (उदार हैं) वे ही कुछ दे सकते हैं जो दान नहीं करते वे क्या देंगे?
736. वन–वनरा काठ भेळा हुया है
वन–वन के काठ अेकत्र हुअे हैं
जगह–जगह के लोगों का सम्मिलन हुआ है।
737. वहू अे वहू, घर थारो है, ढकेड़ो मती उघाड़यै
बहू रो बहू, घर तेरा है पर ढके हुअे को मत खोलना (बहूके प्रति सासका कथन) जब कोई
दिखावटी अधिकार दे पर वास्तवमें कुछ न दे जब अेक हाथसे अधिकार देकर दूसरे हाथ से
वापिस ले ले।
738. बहू कनांसू चोर मराव़ै चार बहूरा भाई
चोरोंको बहूके द्वारा मरवाती है और बहूके भाई ही चोर है
(बहूके भाई चोरी करते हैं और चोरोंको दंड देने का काम बहूको सौंपा जाता है)
जिनको काम सौंपा जावे वे ही विपक्षियों से मिले हुअे हों तब
739. बहू वछेरा, डीकरा, नींव़डि़यां परव़ाण
1. बहू, बछेरा और संतान को पहले अच्छा नहीं समझना, जब आगे चल कर अच्छे सिद्ध हो तभी
अच्छा समझना।
2. कोई व्यक्ति या अवस्था या काम आगे चल कर अच्छा सिद्ध हो तभी अच्छा समझना चहिअे।
कोई व्यक्ति या बात अच्छी है या बुरी यह पहलेसे नहीं कहा जा सकता। न जाने आगे चल कर
वे कैसे निकले।
740. बहू भोळी घणी जको भूतां भेळी सोव़ै
बहू भेली बहुत है न, जो भूतोंके साथ सोवे! (अर्थात् इतनी भोली नहीं )
किसी का वास्तवमें इतना भोना न होना जितना कि उसे लोग समझे।
741. वहूरा लखण वारणैसूं ओळखीजै
बहूके लक्षण द्वारसे पहचाने जाते हैं (मालूम पड़ते हैं)
प्रथम द्वार–प्रेवशके समय बहूके
मि–पूतरा पग पालणै बहूका वारणै।
742. वाज्या ढोल परणीज्या गोल
ढोल बजे और गोलोंका विवाह हुआ
743. वाजै पर पग उठै
बाजे (की ताल) पर पैर उठते हैं
आदमीके अनुसार ही खर्च किया जा सकता है।
744. वाड़ में मूत्यां किसो व़ैर निकळै?
बाड़में मूतनेसे कौन–सा बैर निकलता है?
सैद्धान्तिक विरोध होते हुअे भी साधारण हे–मेल तथा शिष्टाचार में फर्क नहीं लाना
चाहिअे।
745. वाढी आंगळी पर ही को मूतै नी
कटी हुई उंगलीपर भी नहीं मूतता।
आवश्यकता के वक्त मदद न देने वाले के लिअे।
746. वाणियांरा पखाणिया चाटाड़ांसूं काम को हुव़ै नी
बनियोंकी कटोरियां चाटनेवालोंसे काम नहीं हो सकता।
जिन्होने बनियोंके घर रह कर माल उड़ाये हैं उनसे मेहनत का काम नहीं हो सकता
(विशेषतया बनियोंके यहां रहनेवाले नौकर–चाकरों पर)।
747. व़ाणियैरी बेटीनै मांसरी कांई ठा?
बनियेकी बेटीको मांसके स्वादका क्या पता?
किसी काम से वाकफियत न रखनेवाले के लिअे
मि–बंदर क्या जाने अदरकका स्वाद?
748. वाण्यों मित्र न वेस्या सती, कागो हंस न बुगलो जती
बनिया कभी किसीका मित्र नहीं हो सकता, वेश्या कभी सती नहीं हो सकती, कौवा कभी हंस
नहीं हो सकता, और (अेकाग्र–ध्यानी होने पर भी) बगुला कभी यति नहीं सकता है।
बनियेको कभी अपना न समझो (जाण मारै व़ाणियो, पिछाण मारै चोर)
749. वाण्यो लिखै, पढै करतार
बनिये की लिखावट परमात्मा ही पढ़ सकता है
वाणीका या महाजनी लिपि को पढ़ना बड़ा कठिन होता है
750. वात करणरी गुनैगारी है
बात करने की गुनहगारी (सजा) है।
चर्चा करने पर नुकसान उठाना पड़े तब।
751. वात थोड़ी, वैंदो घणो
(असली) बात थोड़ी विवाद बहुत
ना कुछ बात पर विवाद छिड़ जाने पर।ै
मि–डनबी ंकव ंअवनज दवजीपदहण्
752. वातांसूं किसी पेट भरीजै
बातों से कौनसा पेट भरता है?
1. कोरी बातरों से भूख नहीं मिटती
2. खाली बातों से काम नहीं चत सकता।
मि–भूख मिटे नंहि पेट की थोथी बातां मांय।
753. बादळ में दिन दीसै न फूड़ दळै ना पीसै
दिन उग गया पर बदली के कारण दिखाई नहीं देता। फूहड़ समझती है कि अभी रात है इसलिअे
वह न उठती है न दलने–पीसने का काम शुरू करती है।
फूहड़ और आलसी के अलये जो अपना काम नहीं करते।
754. वारी आयां बूढली ही नाचै
बारी आने पर बुढि़या भी नाचती है
बारी आते ही अशक्त आदमी भी कार्य करने को तैयार हो जावै तब।
755. वासी रहै न कुत्ता खाय
न बासी रहे न कुत्ते खावें
1. बाकी कुछ न बचना।
2. गरीब आदमी के लिअे जिसके पास वचत कुछ नहीं होती है।
3. जब काम थोड़ा सा रहे तो कहा जाता है कि अब इतना क्या छोड़ते हो।
756. वास्ती कनै घी थोड़ो ही खटाव़ै
आग के पास घी थोड़ै ही टिकता है
स्त्रियों के लिये पुरुषों के पास में दोष आ जाता है।
757. वांझ कांई जाणै जिणनरी पीड़?
बांझ प्रसव की पीड़ा को क्या जान सकती है
1. जिसने कभी कोई कष्ट नहीं सहा वह उसकी पीड़ा को क्या जाने?
2. जिस पर बीतता है वही जानता है।
मि–बन्ध्या पीर प्रसुत को कहा बतावै खेद
मि–नहिबन्ध्या विजानाति गुर्वीप्रसव वेदनां।
758. वांट खाय बैकूंठा, जाय
जो बांटकर खाता है वह बैकुंठको जाता है
कोई अच्छी चीज मिले तो उसे दूसरों को बांटकर खाना चाहिअे, अकेले नहीं
759. वांदरी ही’र विच्छू खायग्यो
बंदरी थी ही, फिर ऊपरसे बिच्छू खा गया
बंदरिया पहलेही बहुत चंचल होती है फिर बिच्छू खा जाय तब तो उसके उछलने कूदनेका कहना
ही क्या?
साधन पाक दुगुर्ण अधिक तीव्र हो उठे तब।
760. वांदरैरे गळैमें फूलांरो हार
1. बंदर के गलेमें फूलोंका हार! (अयोग्य है)
2. बंदर के गलेमें फूलोंका हार (बहुत देर नहीं टिकता, वह तुरंत ही तोड़–मरोड़
डालेगा)
जब किसीको अैसी जिनसे मिले जिसकी कदर वह न जानता हो या जो उसके अयोग्य हो
761. विगड़ी खेती’र सुधरी चाकरी बरोबर है
बिगड़ी खेती और सुधरी चाकरी बराबर है
खेतों का बिगड़ जाना और नौकरी का करना ये दोनों एकसी ही बुराई है।
762. विगड़ी ने कांई विरावणो सुधरी ने कांई सराव़णो
बिगड़ी को क्या भूलना और सुधरी हुई की क्या तारीफ करना
बिगड़ी बात को याद रखना चाहिअे और सुधरी बात की सराहना नहीं करनी चाहिअे।
763. विगड़ीरा तीव़ण कदे आगै ही सुधरा हा?
बिगड़ीके तेवर कभी आगे भी सुधरे थे?
बिगड़ी बात फिर नहीं बनती
मि–बिगड़ी तह फिर नहीं बैठती।
764. विगडैगा तो काऊका, सुधरैगा तो नाऊका
किसीका बिगड़ेगा सिर और नाईका बेटा हजामत बनाना सीखेगा।
काम बिगड़ेगा तो दोष दूसरे किसीके सिर, पर सुधरेगा तो नाम नाईका होगा
1. दूसरेकी हानि करके फायदा उठाना।
2. काम बिगड़ जाय तो दोष दूसरेके सिर डालना और सुधर जाय तो यश खुद ले लेना
मि– कटै सिर काऊका, बेटा सुधरै नाऊका।
कटैगा बटाऊका, सीखेगा नाऊका।
कटेगा काऊका, सीखेगा नाऊका।
765. विच्छूरो झाड़ो को आव़ैनी, हाथ घातै सरपनै
झाड़ा (मंत्र) तो बिच्छूका भी नहीं आता और हाथ डालता है सांपको अपनी योग्यतासे बाहर
काम करना।
मि–बिच्छूका मंत्र न जानै सांपके पिटारेमें हाथ दे
766. विचारनै मार है
विचारको मार है
विचारवानको भुगतना पड़ता है।
मूर्खको कोई कुछ नहीं कहता
मि– चार घग्घू मूरख पसु सदा सुखी प्रिथुदास।
चाकर चकव़ो चतर नर निसदिन रहत उदास।।
767. विणज करैला वाणिया, और करैला रीस
बनिज करेगा बानिया और करेंगे रीस
व्यापार बनिया कर सकता है दूसरे नहीं क्योंकि उसमें सहनशीलता आवश्यक है
768. विणज करो रे व़ाणिया म्हे विणज सूं धाया।
अबके टीपणिया विक ज्यावै तो गंगाजी में न्हाया।।
बनिये लोग ही वाणिज्य करें, हमें तो सरा वार टीपणे विक जायं तो गंगा न्हाये जिसका
जो काम है वही उसे सफलता से कर सकता है दूसरा नहीं।
इस पर एक कहानी है– एक ब्राण ने देखा कि पंचांगों को बेच कर बनिये लोग खूब नफा
कमाते हैं मैं भी क्याें न ऐसा करूं? उसने पंचांग स्टाक कर लिये पर उसके पास बिक्री
नहीं होती, वर्ष बीतने पर उसका कोई मूल्य नहीं क्योंकि वह तो वर्ष के आरंभ में
बिकने वाली वस्तु है। इस पर तंग होकर ब्राण की उक्ति।
769. विण पूछो मूरत भलो, क्या तेरस क्या तीज
तरेस और तीज निश्चय ही अच्छे मुहूर्त हैं, किसीको पूछने की जरूरत नहीं।
770. विना आटै रोटी करै
बिना आटेके रोटी करता है
चालाक और चलते पुर्जे व्यक्ति के लिअे
771. विना विचारां जो करै सो पाछै पछताय
पहले अच्छी तरह सोच–समझ कर पीछे कार्य करना चाहिअे।
मि– बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय।
काम बिगारै अपनो जगमें होत हंसाय।।
जगमें होत हंसाय चित्त में चैन न पावै।
खान पान सनमान राग रंग मनहि न भावै।।
772. विलायतमें किसा गधा को हुव़ैनी?
विलायत में कौन–से गधे नहीं होते
1. अच्छे और बुरे सभी स्थानोंमें होते हैं
2. अच्छे स्थानके भी सभी व्यक्ति या पदार्थ अच्छे नहीं होते।
मि–स्मंतदमक विवसे ंतम विनदक मअमतल ूीमतमण्
773. वीती ताहि विसारदे, आगैकी लुध लेय
जो हा गया उसका फिक्र मत करो, भविष्यका ध्यान रखो
मि–स्मज इल हवदमे इल इल हवदमे
774. वीती सो वैद
जिस पर बीती है वही वैद्य है
जिस पर बीतती है उसे उस बातका पूरा–पूरा अनुीाव होता है और उसका उपाय भी उसे मालूम
होता है।
जो बीमार हुआ है उसे बीमारीका उपाय भी मालूम है।
775. वींद, वींदरो भाई, तीजो बामण, चोथो नाई
अेक दूल्हा, दूसरा दूल्हेका भाई, तीसरा ब्राण, और चौथा नाई (केवल चार आदमी बरात में
गये हैं)
बहुत थोड़ी संख्या के लिअे।
776. वींद‘वींदणी जोड़ै–तोड़ै, ले पंसेरी माथो फोड़ै
दूल्हा और दुलहिन दोनों अेकही जोड़–तोड़ के हैं (अेक–से हैं), दोनों पंसेरी लेकर
माता ही फोड़ते हैं।
जब दो दुष्टोंको जोड़ी मिल जाय।
जब दो व्यक्ति अेक–से दुष्ट हों।
मि–दो घर डूबतां एक ही घर डूबो।
777. वींद–वींदणी साव़धान, घरमें नहीं है पाव़ धान
हे दूल्हे और दुलहिन सावधान हो जाओ क्यकि घरमें खानेकी पाव भर धान भी नहीं है।
दुल्हा, दुलहिन दोनों बड़े होशियार बने फिरते हैं पर घरमें खानेको पाव भर धान भी
नहीं।
778. वींद मरो वींदणी मरो, बामणरो टको त्यार
दूल्हा मरो या दुलहिन मरो, पर ब्राण की दक्षिणा तो पक गई।
दूसरे नुकसान की पर्वाह न करके अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाले के लिअे।
779. वींदरे मूढेमें ही लाळां पड़ै जद जानी बापड़ा कांई करै?
दूल्हेके मुंहसे ही लारे टपकें तो बंचारे बराती क्या करें?
1. जब मुखियेमें ही दम न हो तो सहायक क्या कर सकते हैं
2. जिसका काम है वही जब पीछे हटता है तो दूसरे सहायक क्या कर सकते हैं?
780. बूढलीरै कयां खीर कुण रांधै?
बुढि़याके कहने से खीर कौन रांधै?
1. सामान्य आदमीके कहनेसे लोग काम नहीं करते (बादमें चाहे अपने आप या दूसरों के कहे
से वही काम करना पड़े) तब
2. जब अेक आदमी के कहने पर दूसरा व्यक्ति काम करनेसे इनकार कर दे पर बादमें जाकर
वही काम करे तब उस पहले आदमीका कथन।
781. बूढा सा बाळा
बूढ़े सो बालक
बूढे़ बालकवत् हो जाते हैं
782. बूढ़ो बाबो आरड़ै, मानै चटायां टारडै
783. बेच’र पिसतावणो राख’र नहीं पिछतावणो
मालको बेचकर पछाताना अच्छा है पर रख कर के पछाताना अच्छा नहीं
784. वेच’र जगात को भरै नी
बेचकर जकात भी नहीं चुकाता
धूर्त, चालाक और चल्तापुर्जा व्यक्ति।
785. वेलडि़यां वन छाया, जाट बखांमें आया
बेलोंसे जंगल छाया और जाट काबूमेें आये।
786. वेळा–वेळारी छियां है
बक्त वक्तकी छाया है (कभी घटती है, कभी बढ़ती)
मनुष्य की दशा समयानुसार बदलती रहती है।
787. वेळा–वेळारी राग है
(देखो ऊपर कहावत नं. 785)
788. वैकूंठ छोटो’र भगतांरी भीड़
बैकुंठ छोटा और भक्तों की भीड़ (हो गई, सारे कहांसे समावे)
थोड़े स्थानमें बहुत व्यक्ति अेकत्र हों तब।
789. वैण, सगाई, चाकरी राजीपेरो काम
वादा, सगाई, और नौकरी अपनी खुशीसे की जाती है। (जबर्दस्ती नहीं हो सकती)
790. वैंते सौ हाथ, फाड़ै अेक हाथ ही कोनी
नापता है सो हाथ, पर फाड़ता अेक हाथ भर भी नहीं।
जो बड़ी–बड़ी बातें कहता है पर करना कुछ नहीं उसके लिअे
मि–नापै सौ गज, फाडै नौ जग।
791. वैवतां वैवतां (पाठान्तर–वैव़तैरी) आख्यांमें धूड़ थाल दें
चलते–चलते आंखोंमें धूल डाल देता है
चालक आदमी के लिअे जो देखते–देखते धोखा दे दे।
792. वैंवतैरी लकड़ी लांबी हु ज्याय
चलते–चलते की लाठी लंबी हो जाती है
चलते–चलते मार्गमें बढ़ईको बैठा देखा, और कुछ काम नहीं हुआ तो यही कर हदया कि जरा
लाठी को काटकर छोटा कर देना।
जब किसको अनावश्यक सताया जाता है तब।
793. वैरागीरो जाम, कदै न आव़ै काम
वैरागीकी संतान कभी काम नहीं आती
नोट–वैरागी गृहस्थ साधु होते हैं।
794. व्याजनै घोड़ा ही को पूगै नी (पाठान्तर को नाव़ड़ैनी)
व्याजको घोड़ै भी नहीं पा सकते
व्याज बड़ी तेजीसे बढ़ता है
मि–व्याज और भाड़ा दिनरात चलता है
व्याजके आगे घोड़ा नहीं दौड़ सकता।
795. व्याज प्यारो है, मूळ प्यारो कोनी
व्याज प्यारा है, मूल प्यारा नहीं
बेटे से उसकी संतान अधिक प्यारी लगती है,
796. व्याज व्यापार रो गोलो है
व्याज व्यापार का दास है
व्याज की अपेक्षा व्यापार करना अधिक लाभदायक है।
797. व्यांव कह–मनै मांड जोय। घर कह–मनै खोल जोय
विवाह कहता है मुझे आरम्भ करके देखले, घर कहता है मुझे खोल कर (मरम्मत करवाना)
देखले।
798. व्यांव वीगडा, पण घररा तो जीमो
विवाह तो बिगड़ा पर घरके व्यक्ति तो जीमो
काम बिगड़ गया पर जो लाभ उठाया जा सकता है वह तो उठाओ।
799. व्यांव, (पाठान्तर–सीर) सगाई, चाकरी राजापैरों काम
विवाह, सगाई, और नौकरी अपनी खुशीसे हो सकते हैं दबाव से नहीं
(देखो ऊपर कहावत नं. 781)
800. व्यांवरा गीत व्यांव़में गाईजै
विवाह के गीत विवाहमें गाये जाते हैं
प्रत्येक काम अपने स्थान पर हो तभी शोभा देता है।
801. व्योपारे वधते लक्ष्मी
व्यापारसे लक्ष्मी बढ़ती है
व्यापारकी प्रशंसा।
मि–व्यापारे वर्धते लक्ष्मी:
802. व्रा आगे वेद वांचै
ब्राके आगे वेद वांचता है
जानकार आदमीको कोई बात बताना।